ऐडिशनल सेशन जज विनोद यादव ने दिल्ली की एक विशेष अदालत में, एक 18 वर्षीय लड़के को बरी कर दिया. जिस पर एक 15 साल की नाबालिग लड़की के साथ प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट(POCSO) के तहत जबरन शादी, बलात्कार और अपहरण का मामला दर्ज किया गया था.
अगर एक मुस्लिम युवक किसी नाबालिग लड़की को लेकर भाग जाता है और उससे मुस्लिम लॉ के अनुसार शादी कर लेता है, तो क्या उसे प्रोटेक्शन ऑफ POCSO के तहत अपराधी माना जा सकता है? इस सवाल का हवाला देते हुए दिल्ली में एक विशेष अदालत ने पिछले हफ्ते पाया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ और POCSO के प्रावधानों के बीच 'स्पष्ट मतभेद' हैं.
क्या है मामला?
ऐडिशनल सेशन के न्यायाधीश विनोद यादव ने 18 साल एक युवक को बरी कर दिया. उसने 15 वर्षीय नाबालिग मुस्लिम लड़की से शादी की थी. युवक पर अपहरण, रेप और POCSO एक्ट की धाराओं के तहत आरोप लगाया गया था. न्यायाधीश ने कहा कि POCSO एक्ट के तहत नाबालिग लड़की इतनी सक्षम नहीं थी कि वह शादी के लिए सहमति दे, लेकिन पर्सनल लॉ लड़की को इस उम्र में शादी करने का अधिकार देता है.
POCSO और मुस्लिम पर्सनल लॉ में मतभेद
जज विनोद यादव का मानना है कि ऐसे मुद्दों पर मुस्लिम पर्सनल लॉ और POCSO कानून, दोनों के प्रावधानों के बीच स्पष्ट मतभेद है. POCSO उसे एक बच्ची मानता है, जो अभी अपनी शादी के लिए सहमति देने में सक्षम नहीं है. जबकि पर्सनल लॉ स्पष्ट रूप से उस इस उम्र में शादी करने का अधिकार देता है.
बच्ची की मां ने लगाया था बेटी को बहलाकर कर भगाने का आरोप
इस मामले में बच्ची की मां ने POCSO ऐक्ट के तहत युवक के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी. मां ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए कहा था कि लड़का उसकी बेटी को बहलाकर कर भगा ले गया था. जिसके बाद पुलिस ने लड़के पर POCSO अधिनियम के तहत बलात्कार, अपहरण और यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज किया था. मजिस्ट्रेट के समक्ष अपना बयान दर्ज करने के बाद, पीड़ित अपने माता-पिता के साथ नहीं गई. जिसके बाजाए उसे दिल्ली के एक चिल्ड्रेन होम 'निर्मल छाया' भेज दिया गया.
कोर्ट ने कहा कि यहां युवक ने लड़की के साथ किसी भी तरह की जबरदस्ती नहीं की है. लड़की खुद की मर्जी से लड़के के साथ गई थी और उससे शादी की थी. ऐसे में इस केस में लड़के के खिलाफ 'बहलाकर कर भगा ले गया' जैसा मुकदमा नहीं बनता.