'हमें नहीं पता था कि हम टोलोलिंग की पहाड़ियों से बचकर वापस आएंगे या नहीं, इसलिए हम खाने की जगह ढेर सारी गोलियां, हथगोले और बारूद लेकर पहाड़ी पर चढ़े थे. हमारी कई टुकड़ियों को उस पहाड़ पर नुकसान पहुंचा था तो बस हमारे अंदर एक ही भावना थी कि उन पाकिस्तानी घुसपैठियों और गद्दारों को ऐसा जवाब देंगे कि पता चले भारतीय सेना में कितना दम है.'
ये शब्द हैं सेना में लांस नायक रहे सतवीर बाउजी के जिन्होंने करगिल विजय दिवस के मौक पर आजतक से भारतीय सेना के विजय की शौर्य गाथा को साझा किया. हिन्दुस्तान की सबसे पुरानी सैन्य यूनिटों में से एक (2) राष्ट्रीय राजपूताना रायफल्स का हिस्सा रहे सतवीर बाउजी ने बताया कि टोलोलिंग जैसी विषम पहाड़ी पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने में सबसे आगे रहकर कैसे उनकी टुकड़ी ने घुसपैठिए के रूप में छिपी पाकिस्तानी सेना को सबक सिखाने में अहम भूमिका निभाई थी.
उन्होंने कहा कि हम खाने के सामान की जगह ज्यादा से ज्यादा हथियार अपने साथ ले गए और दुश्मनों पर ऐसे टूटे कि उनके अंदर भारतीय सेना का खौफ समा गया. युद्ध के दौरान उन्हें कई गोलियां छू कर निकल गईं जबकि एक गोली एड़ी के आरपार हो गई. सुनिए करगिल जंग में भारत के विजय की कहानी पूर्व लॉन्स नायक सतवीर बाउजी की जुबानी.
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सवाल - जंग के समय आप की पोस्टिंग कहां थी और कब पता चला करगिल की लड़ाई में जाना है.
जवाब - जब युद्ध शुरू हुआ उस वक्त मेरी पोस्टिंग कुपवाड़ा इलाके में थी और हमें एक महीने पहले ही बता दिया गया था कि जरूरत पड़ने पर हमें वहां भेजा जा सकता है. इसलिए हम पूरी तरह तैयार थे. जब युद्ध शुरू हुआ तो हमारी यूनिट को सबसे दुर्गम और सबसे महत्वपूर्ण टोलोलिंग पहाड़ी को जीतने का काम सौंपा गया जिसपर दुश्मनों ने कब्जा कर लिया था.
सवाल- टोलोलिंग की पहाड़ी को आपकी यूनिट ने कैसे जीता ?
जवाब- टोलोलिंग की पहाड़ी पर भारतीय सेना की कई टुकड़ियों ने हमला किया था लेकिन कामयाबी नहीं मिली. इसके बाद हमारे कमांडर ने एक तरीका अपनाया और वैसी ही दूसरी जगह पर हमारा अभ्यास शुरू कराया. 12 दिनों तक हमने सुबह से लेकर रात तक वैसी ही एक पहाड़ी पर हमले की ट्रेनिंग की. 11 जून को हमने टोलोलिंग की पहाड़ी पर चढ़ना शुरू कर दिया. 12 जून की रात को हम दुश्मन के आमने-सामने थे और मैं सबसे आगे वाला सिपाही था.
टोलोलिंग की पहाड़ियों पर सबसे पहली मुठभेड़ दुश्मनों से मेरी ही हुई. अगर हम उसे नहीं जीत पाते तो करगिल तक पहुंचना मुश्किल था..एक ही रात में खतरनाक संघर्ष के बाद हमने उनसे टोलोलिंग की पहाड़ी छीन ली.
सवाल - टोलोलिंग की पहाड़ियों पर सिर्फ घुसपैठियों का कब्जा था ?
जवाब - नहीं सर ये सिर्फ पाकिस्तान की हरकत नहीं थी, इसमें चीन का भी हाथ था. चीनी हथियारों की बदौलत उन्होंने ऐसी जगह चुनकर हथियार तैनात किए थे कि हिन्दुस्तान उस इलाके पर फिर से अपना कब्जा ना कर सके.
सवाल- टोलोलिंग पर दुश्मनों से आमने-सामने की टक्कर कैसे हुई ?
जवाब - हमें नहीं पता था कि हम टोलोलिंग की पहाड़ियों से बचकर वापस आएंगे या नहीं, इसलिए हम खाने की जगह ढेर सारी गोलियां, हथगोले और बारूद लेकर पहाड़ी पर चढ़े थे. क्योंकि हमारी कई टुकड़ियों को उस पहाड़ पर नुकसान पहुंचा था तो बस हमारे अंदर एक ही भावना थी कि उन पाकिस्तानी घुसपैठियों और गद्दारों को ऐसा जवाब देंगे कि उन्हें पता चले भारतीय सेना में कितना दम है. वहां लड़ते-लड़ते हमारे सात जवान शहीद हो गए. हमारी टीम में 24 सैनिक थे जिन्हें तीन टुकड़ों (9 सैनिक, 9 सैनिक, 6 सैनिक) में बांट कर रखा गया था.
सवाल - युद्ध पर जाने से पहले घरवालों से बात की थी ?
जवाब- करगिल में तनाव शुरू होने के बाद करीब 6 महीने से घर पर किसी से बात नहीं हुई थी क्योंकि उस वक्त न वहां फोन हुआ करता था और न ही घर पर फोन था. लेकिन युद्ध में जाने से पहले अपने बड़े भाई से आशीर्वाद लेने के लिए उन्हें चिट्ठी लिखी थी.
सवाल - युद्ध पर जाने के दौरान मन में डर या घबराहट भी हुई?
जवाब - बिल्कुल नहीं सर, सड़कों से जब सेना की गाड़ियां गुजरती थीं तो 'भारत माता की जय', 'जय हिंद' के लोग नारे लगाते थे. खाने-पीने की चीजें दिया करते थे. लोगों को दिया हुआ प्यार और हौसले की वजह से डर तो हमारे आसपास भी नहीं था. हमारा मनोबल इतना ऊंचा हुआ कि हमने कसम खा ली थी पाकिस्तानियों को सबक सिखाएंगे. अगर डर जाते तो इतनी बड़ी जीत हासिल नहीं कर पाते. इतना उत्साह था कि शहीद भी हो जाते तो कोई फर्क नहीं पड़ता कम से कम देश की नजरों में तो हम आ जाते.
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हालांकि उन्होंने घायल सैनिकों को होने वाली दिक्कतों और सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठाया. पूर्व लांस नायक सतवीर बाउजी ने कहा कि जो युद्ध में घायल सैनिक बच जाते हैं उन्हें तो सरकार रुला-रुला कर मार देती है क्योंकि उनका कोई भी काम नहीं होता है. न तो बच्चों को कोई नौकरी दी जाती है और न ही घायलों के लिए कुछ किया जाता है जिससे वो अपना घर चला सकें. बच्चों की जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं, उनकी स्कूल फीस नहीं दे पाते हैं जिससे वो भी नाराज रहते हैं. बता दें कि करगिल लड़ाई के 21 साल पूरे होने पर आज पूरा देश करगिल विजय दिवस मना रहा है.