भारत ने चीन की यह दलील खारिज कर दी कि उसे परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता हासिल करने के लिए एनपीटी पर हस्ताक्षर जरूरी है. भारत ने कहा कि फ्रांस को परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर किए बगैर ही इस संगठन में शामिल कर लिया गया था.
NSG सदस्य को लेकर भारत की दावेदारी मजबूत
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कहा कि 'मैं समझता हूं कि यहां कुछ भ्रम हैं, यहां तक कि एनपीटी भी गैर एनपीटी देशों के साथ की इजाजत देता है, यदि कोई संबंध है तो यह एनएसजी और आईएईए सुरक्षामानकों और निर्यात नियंत्रणों के साथ है'. स्वरूप के मुताबिक 'एनएसजी सदस्यों को सुरक्षामानकों और निर्यात नियंत्रणों का सम्मान करना है, एनएसजी दिशानिर्देश के अनुरूप हो, एनएसजी एक तदर्थ निर्यात नियंत्रण व्यवस्था है और फ्रांस जो कुछ समय से एनपीटी सदस्य नहीं था, एनएसजी का सदस्य था, क्योंकि वह एनएसजी के उद्देश्यों का सम्मान करता था'.
चीन का दांव उलटा पड़ा
दरअसल चीन ने भारत की एनएसजी सदस्यता की कोशिश का इस आधार पर विरोध किया है कि उसने अबतक एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किया है. उसके विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लू कांग ने कहा था कि एनएसजी समेत सभी बहुपक्षीय परमाणु अप्रसार और निर्यात नियंत्रण व्यवस्था ने एनपीजी के विस्तार के लिए को एक महत्वपूर्ण मापदंड माना है. उन्होंने कहा कि भारत के अलावा ढेर सारे अन्य देशों ने जुड़ने की इच्छा प्रकट की है.
चीन ने कहा- भारत के खिलाफ कोई गलत भावना नहीं
लू कांग ने कहा कि चीन का रूख किसी खास देश के विरूद्ध नहीं है बल्कि यह सभी गैर-एनपीटी सदस्यों पर लागू होता है. यही नहीं, चीन के विदेश उपमंत्री लिउ झेनमिन ने बाद में इस बात का खंडन किया कि उनका देश भारत द्वारा एनएसजी का सदस्य बनने के लिए की जा रही कोशिश में टांग अड़ा रहा है और कहा कि चीन 48 राष्ट्रों के इस के सदस्यों और भारत के साथ मिलकर इसका हल ढूंढने के लिए काम करेगा. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी अगले हफ्ते अपनी चीन यात्रा के दौरान यह मुद्दा उठा सकते हैं.