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सरकार ने न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधित विधेयक वापस लिया

कांग्रेस के विरोध की अनदेखी करते हुए सरकार ने सोमवार को राज्यसभा में न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा लाये गये विधेयक को वापस ले लिया तथा वादा किया कि वह इसकी जगह एक नया व्यापक विधेयक लायेगी. अन्य विपक्षी दलों ने सरकार के इस कदम का समर्थन किया.

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कांग्रेस के विरोध की अनदेखी करते हुए सरकार ने सोमवार को राज्यसभा में न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा लाये गये विधेयक को वापस ले लिया तथा वादा किया कि वह इसकी जगह एक नया व्यापक विधेयक लायेगी. अन्य विपक्षी दलों ने सरकार के इस कदम का समर्थन किया.

उच्च सदन में इस मुद्दे पर कांग्रेस अलग थलग पड़ गयी क्योंकि सपा, बीएसपी, अन्नाद्रमुक एवं द्रमुख सहित विभिन्न दलों ने न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार के सरकार के प्रयास का समर्थन किया तथा कांग्रेस से इस कदम का विरोध महज विरोध के लिए नहीं करने को कहा.

राज्यसभा में 69 सदस्यों वाली सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने पूर्ववर्ती शासनकाल में लाये गये विधेयक को वापस लेने का विरोध करते हुए कहा कि इसके बजाय पूर्व विधेयक में ही संशोधन किये जाने चाहिए.

इससे पूर्व न्यायिक नियुक्तियां आयोग विधेयक 2013 को वापस लेने का प्रस्ताव करते हुए कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि पूर्ववर्ती सरकार इस सिलसिले में दो विधेयक लायी थी जिसमें संविधान संशोधन विधेयक शामिल था और जिसकी अवधि खत्म हो चुकी है. प्रसाद ने कहा कि सरकार अब नया विधेयक लाना चाहती है क्योंकि वापस लिये जा रहे विधेयक को स्थायी समिति के पास भेजा गया था. समिति ने इस बारे में कुछ सिफारिशें की हैं तथा उन सभी सुझावों को नये विधेयक में शामिल किया जायेगा जिसमें न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन को संविधान के अंग के रूप में रखे जाने का प्रावधान शामिल है. कानून मंत्री ने कहा कि जब तक पुराने विधेयक को वापस नहीं लिया जाता नया व्यापक विधेयक पेश नहीं किया जा सकता. प्रसाद ने कहा कि मौजूदा सरकार दो नये विधेयक लाना चाहती है जिसमें संविधान संशोधन विधेयक और एक अन्य विधेयक शामिल होगा. इसमें स्थायी समिति की सिफारिशों को शामिल किया जायेगा.

कानून मंत्री की स्थायी समिति द्वारा विधेयक को खारिज करने की टिप्पणी का कांग्रेस सदस्यों विशेषकर संबंधित स्थायी समिति के अध्यक्ष शांताराम नाइक ने कड़ा विरोध किया. बाद में प्रसाद ने अपनी इस टिप्पणी को वापस ले लिया. विधेयक वापस लेने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए सदन में कांग्रेस के उप नेता आनंद शर्मा ने कहा कि आम तौर पर यही चलन रहा है कि एक बार विधेयक पेश होने के बाद वह सदन की संपत्ति बन जाता है तथा उसमें संशोधन किये जाते हैं, उसे वापस नहीं लिया जाता. उन्होंने कहा कि हमें इस विधेयक को वापस लेने पर आपत्ति है.

बहरहाल विधेयक को वापस लेने के प्रस्ताव को सदन की ध्वनिमत से मंजूरी मिल गयी क्योंकि सपा, बीएसपी, अन्नाद्रमुक एवं द्रमुक ने इसका समर्थन किया जबकि वाम एवं जदयू भी इसके पक्ष में प्रतीत हुए. बीएसपी नेता सतीशचन्द्र मिश्रा ने विधेयक को वापस लेने का समर्थन करते हुए कहा कि कानून मंत्री ने विभिन्न दलों के नेताओं को पत्र लिखकर इस बारे में अवगत कराया था. उन्होंने इस विधेयक को वापस लेने की आवश्यकता पर बल दिया.

सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने भी कानून मंत्री का पत्र उनकी पार्टी को मिलने की बात स्वीकार करते हुए कहा कि सीपीएम राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन के पक्ष में है. तृणमूल कांग्रेस के सुखेन्दु शेखर राय ने कहा कि उनकी पार्टी शुरू से ही चुनाव एवं न्यायपालिका में सुधार की बात कर रही है. उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस इस विधेयक को वापस लेने के बारे में अपनी सहमति लिखकर जता चुकी है.

जेडीयू के अली अनवर ने कहा कि उनकी पार्टी न्यायिक सुधार का समर्थन करती है. इस बारे में सरकार जो भी विधेयक लायेगी, उसका गुण दोष के आधार पर समर्थन किया जायेगा. सीपीआई के डी राजा ने मौजूदा सत्र में अब केवल तीन दिन शेष रह जाने की ओर ध्यान दिलाते हुए सरकार से जानना चाहा कि आप न्यायिक सुधार से संबंधित विधेयक कब ला रहे हैं. अन्नाद्रमुक के वी मैत्रेयन और द्रमुक की कानिमोई ने सरकार के विधेयक वापस लेने का समर्थन किया.

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