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विचार: लोगों के बेडरूम में मत घुसिए सरकार!

दो वयस्क लोग आपसी सहमति से किस तरह के शारीरिक संबंधों में यकीन करते हैं, यह तय करने का काम इस देश की सरकार, संसद और न्यायपालिकाएं न ही करें तो बेहतर. उनके पास करने के लिए ढेर सारे ठोस काम हैं.

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दो वयस्क लोग आपसी सहमति से किस तरह के शारीरिक संबंधों में यकीन करते हैं, यह तय करने का काम इस देश की सरकार, संसद और न्यायपालिकाएं न ही करें तो बेहतर. उनके पास करने के लिए ढेर सारे ठोस काम हैं. अपराध रोकने, देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, ट्रांसपोर्ट सुविधाओं और रोजगार का विस्तार करने से लेकर भारत को एक विकसित देश बनाने की गंभीर चुनौतियों के रहते सरकार और न्यायपालिकाएं लोगों के बेड-रूम में सहमति से होने वाली घटनाओं में ताक-झांक करे, यह गैरजरूरी है और इसमें कोई राष्ट्रीय हित नहीं है.

समलैंगिकता को अपराध मानना भारत के कानून में एक औपनिवेशिक विरासत है, जिसकी संसद को तत्काल समीक्षा करनी चाहिए. अगर संसद इस बारे में चले आ रहे कानून को नहीं बदलेगी तो अदालतें इस आधार पर फैसला सुनाने के लिए बाध्य होंगी. भारत में पहली बार मैकाले के बनाए इंडियन पीनल कोड में कई प्रगतिशील और अच्छी बातें थीं. कानून की नजर में हर किसी को जाति और धर्म से परे बराबरी का दर्जा इस पीनल कोड की वजह से मिला था. लेकिन बच्चा पैदा करने के अलावा हर तरह के यौन संबंधों को आपराधिक कृत्य मानना उस कानूनी व्यवस्था की ऐसी खामी थी, जिससे छुटकारा पा लेना चाहिए था. जिन पश्चिमी देशों की नकल से यह कानूनी व्यवस्था भारत में आई है, वे खुद इससे छुटकारा पा चुके हैं और समलैंगिकता को अलग अलग स्तरों पर ज्यादातर आधुनिक देशों में मान्यता मिल चुकी है.

बच्चा पैदा करने के अलावा तमाम किस्म के सेक्स संबंधों को अपराध बताने वाली सांस्कृतिक विरासत गर्भपात को जीव हत्या, अनैतिक और आपराधिक कृत्य मानती थी. लेकिन समय बदलने के साथ लगभग पूरे विश्व में गर्भपात को मान्यता मिल चुकी है. भारत भी उन देशों में शामिल है, जहां गर्भपात कानूनी तौर पर वैध है. कानून आखिरकार लोगों के लिए हैं और इस मान्यता का विस्तार अगर समलैंगिकता तक करें तो इसे सामान्य यौन गतिविधि माना जाना चाहिए.

अगर समलैंगिकता किसी की नजर में अनैतिक या अधार्मिक है, तो ऐसा मानना उसका अधिकार है और उसकी भावना का आदर होना चाहिए. लेकिन अनैतिक होना और गैर-कानूनी होना दो अलग स्थितियां हैं और इस विभाजन रेखा को बनाए रखा जाना चाहिए. मिसाल के तौर पर, अपने माता-पिता का आदर करना नैतिकता है, लेकिन ऐसा न करना अपराध नहीं है. कानून किसी को इस बात के लिए बाध्य नहीं करता कि वह अपने माता-पिता का आदर करे. कुछ काम समाज और उसकी संस्थाओं के जिम्मे छोड़े जाने चाहिए. नैतिक और अनैतिक की व्याख्या करने का दायित्व समाज पर छोड़ा जाना चाहिए. इस काम को करने के लिए संसद और न्यायपालिकाएं सक्षम नहीं है.

आपके पास करने के लिए बेशुमार जरूरी काम हैं सरकार. आप लोगों के बेड-रूम को छोड़ भी दें, तो देश पर आफत नहीं आ जाएगी.

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