हरियाणा के सरसब्ज हिसार शहर से 32 किमी उत्तर में बसे बरवाला कस्बे में जिंदगी ढर्रे पर लौट आई है. हफ्तेभर से चली आ रही समाचार चैनल, पुलिस और तमाशबीनों की धूल उड़ाती गाड़ियों की धमाचौकड़ी खत्म हो चुकी है. एक शख्स को, जो खुद को भक्तिकाल के महान निर्गुण संत कबीरदास का अवतार कहता था और जिसके चमचे उसे देश के कानून और संविधान से ऊपर बता रहे थे, एक चूहे की तरह गिरफ्तार कर पुलिस की वैन में बिठाकर कालकोठरी में भेज दिया गया. लेकिन काले कपड़े वाले बंदूकधारी गार्डों की सुरक्षा में 12 एकड़ के किलेनुमा सतलोक आश्रम में चले इस तमाशे ने हरियाणा पुलिस की इज्जत और नींद, दोनों उड़ा दी, साथ ही बाबा रामपाल के हठ ने एक मासूम बच्चे सहित छह लोगों की जान ले ली. दर्जनों गाड़ियों में आग लगी और पत्रकारों की बर्बर पिटाई हुई, सो अलग. राहत यही है कि आश्रम में फंसे 15,000 लोग बिना किसी बड़े शक्ति प्रयोग के सुरक्षित निकाल लिए गए.
अदालत सख्त, सरकार सुस्त
जाट समुदाय के रामपाल के रिश्ते भी कभी जाट नेता और तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के साथ मधुर थे. लेकिन जब अक्टूबर 2006 में रामपाल ने आर्य समाज के सर्वोच्च ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश के बारे में अनर्गल टिप्पणी की तो रोहतक के ज्यादातर आर्यसमाजी जाट उसके खिलाफ हो गए और खुद आर्यसमाजी परिवार के हुड्डा को रामपाल को रोहतक से भगाने पर मजबूर होना पड़ा. इसके लिए आश्रम के छह लोग हुड्डा के दिल्ली स्थित आवास पर उनसे मिले भी थे. हालांकि केस हटे नहीं. डेरों का रसूख सरकार की खामोशी की ठोस वजह है. इसकी एक मिसाल यह है कि जब पूरे देश की निगाहें सरसों के खेतों के बीच बसे बरवाला के सतलोक आश्रम पर थीं, तब सत्ताधारी बीजेपी के कई मंत्री और विधायक हरियाणा में पार्टी के चुनाव प्रभारी रहे कैलाश विजयवर्गीय औैर विधानसभा अध्यक्ष कंवरपाल गुर्जर के नेतृत्व में सिरसा के डेरा सच्चा सौदा में संत गुरमीत राम रहीम इंसा को धन्यवाद ज्ञापित करने पहुंचे.
माना जाता है कि इस सबसे प्रभावशाली डेरे के हरियाणा में 50 लाख भक्त हैं. हत्या, यौन शोषण और हाल ही में अपने 150 सेवकों को जबरन नपुंसक बनाने के आरोपों का हरियाणा और पंजाब की अलग-अलग अदालतों में सामना कर रहे जेड प्लस सुरक्षाधारी बाबा ने पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी का खुलकर समर्थन किया था. चुनाव से पहले भी बीजेपी की लिस्ट जारी होते ही उसके 45 प्रत्याशी बाबा के पास पहुंचे थे. बरवाला कांड के बीच बीजेपी नेताओं का थोक में डेरा सच्चा सौदा पहुंचना, उसी एहसान का शुक्राना अदा करना था. डेरे के प्रवक्ता पवन इंसा सफाई देते हैं, ‘एक बाबा के विवाद में आने से सब को एक तराजू में तौलना गलत है. गुरुजी गरीबों के लिए मकान बनाने से लेकर वेश्याओं के घर बसाने तक 104 प्रमुख सामाजिक कार्यों से जुड़े हैं. ये सारे आरोप निराधार हैं. हम अदालत में इनका जवाब दे रहे हैं.’
...और बाबा भी हैं नजर में
उधर, सिरसा के डेरा भूमणशाह संगरसाधा का अति पिछड़े कंबोज समुदाय में खासा असर है. सिरसा में डेरा सच्चा सौदा जगमालीवाली है. ये डेरे अगर दलितों के आसरे के लिए हैं, तो नामधारी संप्रदाय से सिख धर्म के लोग जुड़े हैं. डेरे का राग शुरुआत से ही कांग्रेस के साथ रहा है. इन डेरों के अलावा कुरुक्षेत्र जिले के पहोवा में बाबा मान सिंह का डेरा ने चुनाव में आइएनएलडी का समर्थन किया. करोड़ा का संत रामपाल आश्रम, अंबाला के स्वामी ज्ञानानंद का आश्रम, मांडीवाला बाबा का डेरा और उसके बाद इस्कॉन और श्री श्री रविशंकर का आर्ट ऑफ लिविंग भी चुनावी भूमिका में पीछे नहीं रहे. बारूद के ढेर पर ऐसे में यह सवाल अपनी जगह कायम रहेगा कि क्या मनोहरलाल खट्टïर सरकार को आगे बरवाला जैसे मामलों से दो-चार नहीं होना पड़ेगा. 2006 में संत रामपाल के रोहतक आश्रम में हुआ इसी तरह का बवाल और 2008 में गुरु गोविंद सिंह जैसी वेशभूषा पहनने के कारण संत राम रहीम के भक्तों और सिखों के बीच हरियाणा की सडक़ों पर हुआ खूनी संघर्ष बताता है कि कई बार डेरे अपने आप को समांतर सत्ता समझने लगते हैं.
राम-रहीम पर गंभीर मामलों के अब भी पांच से अधिक मुकदमे चल रहे हैं, बाकी डेरे भी कुछ नहीं तो संपत्ति के विवाद से तो जूझ ही रहे हैं. हरियाणा के ज्यादातर आश्रम और डेरों के मुखिया अत्याधुनिक हथियारों से लैस निजी गार्डों के साथ चलना पसंद करते हैं. इन संवेदनशील हालात में सरकार अगर वोट के लिए बाबाओं को बवाल के रास्ते पर आगे बढ़ने देती है तो देर-सवेर आंच एक बार फिर उसकी चौखट पर होगी क्योंकि अदालतें किसी से मुरव्वत बरतने वाली नहीं हैं.