दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई मंत्री चाहे तो किसी पानवाले को भी सचिव नियुक्त कर सकता है. अदालत ने साथ ही एनडीए सरकार के मंत्रियों द्वारा सचिवों की नियुक्ति से जुड़े सरकार के मेमोरेंडम को चुनौती देने वाली याचिका को जनहित याचिका मानने से इनकार कर दिया है.
न्यायमूर्ति बी डी अहमद और न्यायमूर्ति एस मृदुल की बेंच ने एनजीओ वॉइस ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की. कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर को तय की है.
बेंच ने मंगलवार को कहा, 'कोई मंत्री किसी पानवाले को भी अपना सचिव नियुक्त कर सकता है. यह वो पद नहीं है जिसका विज्ञापन दिया जाता है. वह हो है सकता किसी को भी सचिव नहीं रखे. विचार का अधिकार कहां आता है.'
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कोई सार्वजनिक नुकसान नहीं हुआ, इसलिए इसे जनहित याचिका नहीं माना जा सकता है. यह सेवा का मामला है. पहली नजर में यह मामला कैट अधिनियम के तहत आता है. इस पर अधिकरण को विचार करना है.'
कोर्ट ने यह भी कहा कि जो कोई भी प्रभावित होगा, वह याचिका दायर कर सकता है. बेंच ने कहा, 'आप बेहद संकीर्ण तरीके से मेमोरेंडम को देख रहे हैं. कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो प्रभावित हो. उसे आने दें. क्यों आप कैट का दरवाजा खटखटाने से बच रहे हैं.'
एनजीओ के वकील ने कहा, 'यह नौकरशाही का राजनीतिकरण करने का प्रयास है.' नरेंद्र मोदी सरकार ने 19 जून को एक मेमोरेंडम जारी किया कि पिछले 10 साल से किसी केंद्रीय मंत्री के निजी कर्मचारी के तौर पर संबद्ध व्यक्ति को केंद्र सरकार का मंत्री नियुक्त नहीं करें. बाद में डीओपीटी ने सफाई दी कि यह ओएसडी और सचिवों पर लागू होगा और जूनियर कर्मचारियों पर लागू नहीं होगा.