30 जुलाई 2012 को जब देश भर में पावर ग्रिड फेल हुई थी, तो ज्यादातर लोगों ने इसे तकनीकी समस्या बताकर खारिज कर दिया था. लेकिन अगले ही दिन जब दोबारा बिजली की ग्रिड बैठ गई तो पूरे देश की नींद हराम हो गई.
भारतीय इतिहास के सबसे बड़े पावर फेलियर ने देश में बिजली के वितरण की खामियां उजागर कर दीं. अब बिजली विभाग की एक स्टैंडिंग कमेटी ने कहा है कि 'ग्रिड अनुशासन' की कमी, असामान्य वितरण और बिजली का कोई ऑडिट न होने की वजह से यह स्थिति पैदा हुई और 48,000 मेगावॉट का नुकसान हो गया. इससे उत्तर, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत अंधेरे में डूब गया.
क्या हुआ था जब 21 राज्यों में छा गया था अंधेरा
कमेटी ने कहा है कि दो दिनों तक हुए पावर फेलियर की कोई एक वजह नहीं थी. इसने संसद को बताया है कि इसके लिए कमजोर इंटर-रीजनल कॉरिडोर, बिना ग्वालियर आगरा लिंक पर 400 केवी बिजली का नुकसान और राज्य के लोड डिस्पैच सेंटर का नाकाफी रिस्पॉन्स दोषी था.
जांच में पाया गया कि पावर फेलियर के समय सिर्फ चार सब-स्टेशन काम कर रहे थे. समिति के सदस्यों का कहना है कि अगर सारे डिवाइस काम रहे होते, तो ब्लैकआउट टाला जा सकता था. ग्रिड नेटवर्क के सुरक्षा इंतजाम देखकर कमेटी के लोग हैरान रह गए. उन्होंने नियमित अंतराल पर इसकी समीक्षा की कड़ी सिफारिश की है.
कमेटी का मानना है कि बिजली के क्षेत्रीय असंतुलन का हल नेशनल ग्रिड नहीं है. बल्कि कमेटी का मानना है कि अगर निष्पक्ष नीति से ग्रिड को नियमित नहीं किया गया तो आगे चलकर हालात और बिगड़ सकते हैं.