राजस्थान की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिए सचिन पायलट सिरदर्द बने हुए हैं. इस संकट को गहलोत ने समय रहते भांप तो लिया, लेकिन इसे खत्म करने में वे सफल नहीं हो पा रहे हैं. सियासी जीवन में ऐसी कई मुश्किलों से पार पा चुके गहलोत ने इस बार स्पीकर से लेकर कोर्ट और राजभवन तक दस्तक दी, लेकिन उन्हें मनमुताबिक नतीजे मिलते नहीं दिख रहे हैं. ऐसे में गहलोत-पायलट के बीच एक दूसरे के खेमे में सेंधमारी लगाने की कवायद हो रही है, इस तरह अब सत्ता की लड़ाई आखिरकार सड़क पर लड़ी जाएगी?
अशोक गहलोत के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकने वाले सचिन पायलट के साथ कांग्रेस के 18 विधायक मजबूती के साथ खड़े हैं. ऐसे में गहलोत की ओर से पायलट के खिलाफ बहुत मजबूत रिपोर्ट और फीडबैक पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को भेजा गया था. इसी के चलते सचिन के खिलाफ पार्टी ने उन्हें सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष पद और डिप्टी सीएम पद से हटाया है, लेकिन अभी भी पार्टी में बने हुए हैं. पायलट ने यह भी साफ कर दिया है कि वो बीजेपी में शामिल नहीं होंगे. इसके बाद अब एक दूसरे को मात देने के लिए सियासी बिसात बिछा रहे हैं.
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अदालत से पालयट को राहत
गहलोत खेमा पायलट को मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने में जरूर सफल रहा है, लेकिन कानूनी तौर पर मात नहीं दे सका. कांग्रेस की शिकायत पर स्पीकर ने पायलट और उनके समर्थक विधायकों को नोटिस भेजकर जवाब मांगा था, लेकिन पायलट खेमें ने कोर्ट में चुनौती दे दी. पायलट समर्थक विधायकों पर अयोग्यता की तलवार लटकाने का मामला कोर्ट में जाकर फंस गया. हाई कोर्ट से यथास्थिति बनाए रखने का फैसला पायलट के पक्ष में गया, जिसे लेकर कांग्रेस खेमा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. हालांकि, कांग्रेस ने एक दिन की सुनवाई के बाद ही सुप्रीम कोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली है.
राजभवन से गहलोत निराशा
अशोक गहलोत विधानसभा सत्र के जरिए पायलट खेमे को सियासी मात देना चाहते थे. गहलोत अपनी सरकार के लिए विश्वासमत हासिल करने की रणनीति के तहत विधानसभा सत्र बुलाने के लिए राज्यपाल कलराज मिश्र से गुहार लगाई, लेकिन राज्यपाल ने पहले तो मना कर दिया. इसके बाद राजभवन के घेराव की चेतावनी और यहां धरना देकर गहलोत ने राजभवन से ही टकराव मोल ले लिया.
इसके बाद गहलोत ने कैबिनेट से सत्र बुलाने का प्रस्ताव पास कर राजभवन को भेजा, जिस पर राज्यपाल ने सत्र बुलाने पर शर्तों के साथ सहमति दी है. संवैधानिक तौर तरीकों के अनुसार विधानसभा का सत्र बुलाया जाना चाहिए. राज्यपाल ने कहा कि सरकार सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाना चाहती है, लेकिन इसका जिक्र नहीं किया गया है. ऐसे में गहलोत सरकार मंगलवार को फिर से कैबिनेट की बैठक कर रही है और माना जा रहा है कि इस बार अविश्वास प्रस्वात का सदन में लाने का जिक्र वो कर सकते हैं.
दोनों खेमे में बढ़ रही मुश्किल
गहलोत ने फिलहाल समर्थक विधायकों को टूट से बचाने के लिए जयपुर के होटल में रोक रखा है. वहीं, सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ हरियाणा के मानेसर के एक होटल में ठहरे हुए हैं. ऐसे में पायलट और गहलोत के लिए विधायकों को लंबे समय तक होटल में रखना भी कठिन होता जा रहा है. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने सोमवार को बयान दिया कि पायलट खेमे के तीन विधायक उनके संपर्क में हैं और वो 48 घंटे के अंदर वापस आ जाएंगे. ऐसे में पायलट खेमे की ओर से दावा किया गया कि गहलोत खेमे के 13 विधायक उनके संपर्क में हैं.
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शह-मात के बीच राजस्थान में कोरोना संक्रमण की स्थिति बिगड़ती जा रही है और सरकार के बाकी कामकाज भी इससे प्रभावित हो रहे हैं. ऐसे में गहलोत सरकार के प्रति जनता के बीच संदेश अच्छा नहीं जा रहा है. इस तरह से गहलोत को एक तरफ सरकार बचाने की चुनौती है तो दूसरी तरफ जनता के बीच अपनी छवि को भी बेहतर बनाए रखने का चैलेंज हैं. इसीलिए अब पूरी तरह से धारणा की राजनीति है. ऐसे में गहलोत और पायलट दोनों खेमे अपनी-अपनी सियासी आजमाइश कर रहे हैं.
राजस्थान की सियासत में गहलोत उन लोगों में माने जाते हैं, जो राजनीति को बहुत अच्छी तरह समझते हैं. उनके अब तक के राजनीतिक जीवन में भी ऐसी चुनौती पहले कभी नहीं मिली और न ही उनके मुख्यमंत्री रहते कभी इतना लंबा राजनीतिक संकट रहा है. गहलोत के 1998 से 2003 के बीच तो राजस्थान में कांग्रेस के दिग्गजों में शामिल परसराम मदेरणा, चंदनमल बैद, नवलकिशोर शर्मा, शिवचरण माथुर, गुलाब सिंह शक्तावत, खेत सिंह राठौड़ जैसे नेताओं की मौजूदगी के बावजूद आसानी से पांच साल निकाल गए थे.
वहीं, इसके बाद 2008 से 2013 के बीच दूसरे कार्यकाल में उन्हें तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी से कुछ हद तक चुनौती मिली और करीब ढाई साल तक सत्ता व संगठन के बीच टकराव नजर आता रहा, लेकिन तब भी गहलोत के लिए बहुत ज्यादा मुश्किलें नहीं दिखी. हालांकि, इस बार सचिन पायलट ने उनके खिलाफ बगावत का झंडा उठाकर नई मुश्किल खड़ी कर दी है. ऐसे में देखना है कि इस सियासी संग्राम में कौन बाजी मारता है.