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भगवंत मान सरकार क्यों लेकर आई विश्वास प्रस्ताव? समझें- क्या है AAP की रणनीति

पंजाब में AAP सरकार ने विधायकों के टूटने की अफवाहों और राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने के बाद विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव लाकर अपनी एकजुटता और बहुमत का शक्ति प्रदर्शन किया.

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पंजाब में विश्वास प्रस्ताव के पीछ की इनसाइड स्टोरी (File Photo: ITG)
पंजाब में विश्वास प्रस्ताव के पीछ की इनसाइड स्टोरी (File Photo: ITG)

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने शुक्रवार को पंजाब विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव पेश किया, जिसे बाद में विशेष सत्र के दौरान सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया. हालांकि, 117 सीटों वाले सदन में आम आदमी पार्टी (AAP) के पास 94 सीटें हैं और वह बेहद मज़बूत स्थिति में है, फिर भी उसने विश्वास प्रस्ताव पेश करने का फ़ैसला किया.

विपक्ष ने कभी इसकी मांग नहीं की थी, लेकिन कुछ विधायकों के पाला बदलने की अफ़वाहों और दावों को देखते हुए, AAP सरकार ने आज यानी 1 मई को विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव पेश करने का फ़ैसला किया. पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने विश्वास प्रस्ताव पेश करते हुए कहा, "कोई संदेह नहीं है, लेकिन ऐसी अफवाहें और दावे चल रहे हैं कि AAP एकजुट नहीं है या कुछ विधायक पाला बदल सकते हैं. इसलिए इन सभी बातों को खारिज करने के लिए हमने यह विश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला किया है."

इसके बाद कई कैबिनेट मंत्रियों और विधायकों ने बात की और उन्होंने एकजुट होकर विपक्ष पर झूठे दावे करने के लिए निशाना साधा. हालांकि, जब विश्वास प्रस्ताव आया, तब SAD, कांग्रेस और बीजेपी नेता सदन में मौजूद नहीं थे और कुछ वक्त बाद विश्वास प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया. AAP के 94 विधायकों में से 88 सदन में मौजूद थे.

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'मुझ पर यकीन जताने के लिए धन्यवाद'

विश्वास प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित होने के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा, "AAP विधायकों के बारे में कुछ अफवाहें चल रही थीं. दावे किए जा रहे थे कि 65 विधायक दूसरों के संपर्क में हैं. आज यह विश्वास प्रस्ताव पेश किया गया और यह सर्वसम्मति से पारित हो गया. मैं सभी विधायकों और मंत्रियों का मुझ पर यकीन जताने के लिए धन्यवाद करता हूं."

उन्होंने आगे कहा कि 2027 में भी लोगों का ऐसा ही विश्वास बना रहेगा. कांग्रेस ही सारी अफवाहें फैला रही थी और आज जब विश्वास प्रस्ताव आया, तो वे सदन में मौजूद नहीं थे. उन्होंने यह भी कहा कि वे इस विश्वास प्रस्ताव की एक प्रति भारत के राष्ट्रपति को सौंपेंगे. 5 मई को राष्ट्रपति के साथ भगवंत मान की बैठक शेड्यूल है.

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AAP क्यों लाई विश्वास प्रस्ताव? 

7 राज्यसभा सदस्यों के AAP छोड़कर बीजेपी में शामिल होने के बाद, जब पार्टी को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था, तो सबकी नज़रें पंजाब में AAP की यूनिट पर थीं. सांसद राघव चड्ढा ने यह दावा भी किया था कि वह AAP के कुछ विधायकों के संपर्क में हैं और ऐसा भी महसूस किया जा रहा था कि अब AAP के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों को एकजुट रखना है. इसलिए, अपनी ताकत और एकता दिखाने के लिए AAP ने यह विश्वास प्रस्ताव पेश किया.

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विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने कहा, "यह सब बस एक नाटक है. वे मज़दूर दिवस के लिए बुलाए गए विशेष सत्र की आड़ में यह सब करना चाहते थे. वे यह विश्वास प्रस्ताव इसलिए लाए हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि लोगों का उन पर अब कोई विश्वास नहीं रहा."

पंजाब BJP के विधायक और कार्यकारी अध्यक्ष अश्विनी शर्मा ने भी कहा, "वे तो पहले से ही एक मज़बूत स्थिति में हैं, तो फिर इस विश्वास प्रस्ताव की आखिर क्या ज़रूरत थी?"

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क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

गुरु नानक यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान विभाग के रिटायर्ड प्रोफेसर कुलदीप सिंह ने आजतक के साथ बातचीत में कहते हैं, "सदन बुलाने की रणनीति का मकसद राज्यसभा के 10 में से 7 सांसदों के जाने के असर को कम करना है. ऊपरी तौर पर उन्होंने इसे 'लेबर डे' (कार्य दिवस) का नाम दिया है. किसी भी तरह का प्रस्ताव पास होना सरकार में विश्वास का प्रतीक माना जाता है. इससे यह साबित होता है कि उनके पास ज़रूरी संख्या बल है. या फिर, किसी भी बिल का पास होना बहुमत का संकेत माना जाता है."

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प्रोफेसर कुलदीप आगे कहते हैं, "इसका मकसद राज्यसभा सांसदों के जाने से पड़ने वाले असर को बेअसर या खत्म करना है. अगर कोई नई राजनीतिक घटनाक्रम सामने आता है, तो सरकार से सदन का सत्र बुलाने की मांग की जा सकती है. इसलिए, हो सकता है कि आज आप बहुमत में हों, लेकिन कल स्थिति बदल जाए. आमतौर पर इसके लिए छह महीने की समय-सीमा तय होती है, लेकिन मान लीजिए कि पार्टी में कोई टूट हो जाती है और अगर विधायक दल राज्यपाल के पास चला जाता है, तो स्थिति बदल सकती है."

वे आगे कहते हैं कि यह एक अस्थायी राहत है. सरकार इस पूरे कार्यकाल को पूरा कर पाएगी या नहीं, यह पूरी तरह से वक्त की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा. छह महीने की परंपरा एक अलग बात है, लेकिन किसी को भी राज्यपाल के संवैधानिक दायित्वों के बारे में पता होना चाहिए. अगर सरकार अपना बहुमत खो देती है, तो इसका सीधा सा मतलब है कि उसे अब सत्ता में बने रहने का कोई अधिकार नहीं है. सदन की मौजूदा स्थिति को देखते हुए, राज्यपाल के पास यह अधिकार होता है कि वे मुख्यमंत्री से सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए कह सकते हैं."

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