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तमिलनाडु के कर्ज पर कांग्रेस नेता की ‘Alarming’ पोस्ट से हड़कंप, क्या है आंकड़ों के पीछे की सियासत

कांग्रेस के भीतर कई नेता मानते हैं कि ये बयान आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि तमिलनाडु में कांग्रेस लंबे समय से डीएमके की जूनियर पार्टनर बनी हुई है और पार्टी का संगठनात्मक आधार लगातार कमजोर हुआ है. 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ये बेचैनी और बढ़ गई है.

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TN बनाम UP कर्ज: आंकड़ों के पीछे की सियासत और अर्थशास्त्र की असली गणित
TN बनाम UP कर्ज: आंकड़ों के पीछे की सियासत और अर्थशास्त्र की असली गणित

तमिलनाडु की आर्थिक हालत को लेकर कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता की सोशल मीडिया पोस्ट ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है. कांग्रेस की डेटा एनालिटिक्स विंग के प्रमुख प्रवीण चक्रवर्ती ने 28 दिसंबर को X (पूर्व में ट्विटर) पर तमिलनाडु के बढ़ते कर्ज को 'अलार्म‍िंग' बताया. उन्होंने राज्य के कुल कर्ज, ब्याज के बोझ और कर्ज-से-GSDP अनुपात का हवाला दिया.

लेकिन ये बहस सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रही. सवाल इस बात पर भी उठे कि ये टिप्पणी किसने की, और ऐसे समय पर क्यों की गई जब कांग्रेस तमिलनाडु में अपनी सहयोगी डीएमके के साथ आगामी चुनावों को लेकर बातचीत की तैयारी कर रही है.

क्या सच में तमिलनाडु की आर्थिक स्थिति चिंताजनक?

चक्रवर्ती ने अपनी पोस्ट में कहा कि तमिलनाडु इस समय देश में सबसे ज्यादा बकाया कर्ज वाला राज्य है. उन्होंने ये भी तुलना की कि 2010 में उत्तर प्रदेश पर तमिलनाडु से दोगुना कर्ज था, लेकिन अब तमिलनाडु का कुल कर्ज यूपी से भी ज्यादा हो गया है.

हालांकि अर्थशास्त्रियों का एक बड़ा वर्ग इस आकलन से सहमत नहीं है. उनका कहना है कि सिर्फ कुल कर्ज के आंकड़े देखकर किसी राज्य की आर्थिक हालत तय करना भ्रामक हो सकता है.

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मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज के निदेशक एम. सुरेश बाबू ने इंड‍ियन एक्सप्रेस से कहा कि तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, उसका मैन्युफैक्चरिंग बेस मजबूत है और सेवा क्षेत्र भी विविध है. ऐसे में कर्ज को हमेशा विकास की क्षमता और आय के अनुपात में देखना चाहिए.

उनका कहना है कि 'मसला ये नहीं है कि कर्ज कितना है, बल्कि ये है कि उस कर्ज से क्या उत्पादक काम हो रहा है और उसे चुकाने की क्षमता कितनी है.' उन्होंने ये भी कहा कि तमिलनाडु हाल के वर्षों में देश के सबसे तेजी से बढ़ने वाले राज्यों में शामिल रहा है और FRBM नियमों के भीतर ही रहा है.

आंकड़ों से ज्यादा राजनीति की चर्चा

असल विवाद यहीं से शुरू होता है. कांग्रेस के भीतर कई नेता मानते हैं कि ये बयान आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि तमिलनाडु में कांग्रेस लंबे समय से डीएमके की जूनियर पार्टनर बनी हुई है और पार्टी का संगठनात्मक आधार लगातार कमजोर हुआ है.

2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ये बेचैनी और बढ़ गई है. पार्टी के कुछ नेता मानते हैं कि डीएमके के साथ रहने से कांग्रेस को कोई खास फायदा नहीं मिल रहा और पार्टी की पहचान सिमटती जा रही है.

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इसी पृष्ठभूमि में प्रवीण चक्रवर्ती की टिप्पणी और अभिनेता-राजनेता विजय से उनकी मुलाकात को सिर्फ निजी राय नहीं माना गया. पार्टी के भीतर इसे संभावित वैकल्पिक गठबंधन की जमीन तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

कांग्रेस के भीतर बढ़ती खींचतान

तमिलनाडु कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि चक्रवर्ती की टिप्पणियों से पार्टी और डीएमके के रिश्तों में भ्रम पैदा हुआ है. एक नेता ने यहां तक कहा कि अगर ये किसी और पार्टी में हुआ होता तो संबंधित नेता पर कार्रवाई हो जाती.

हालात तब और बिगड़ते दिखे जब पार्टी के पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम को सामने आना पड़ा. उन्होंने सार्वजनिक रूप से डीएमके के साथ कांग्रेस की प्रतिबद्धता दोहराई और साफ किया कि किसी एक व्यक्ति की टिप्पणी से पार्टी की रणनीति तय नहीं होती.

चिदंबरम ने ये भी कहा कि केंद्र सरकार के हालिया आंकड़ों के मुताबिक तमिलनाडु देश में सबसे तेज नाममात्र वृद्धि दर्ज करने वाला राज्य है.

चौराहे पर खड़ी पार्टी

कांग्रेस के भीतर अब साफ तौर पर दो धाराएं दिख रही हैं. एक धड़ा डीएमके के साथ गठबंधन बनाए रखने के पक्ष में है, तो दूसरा मानता है कि पार्टी को नया राजनीतिक रास्ता तलाशना चाहिए, जिसमें अभिनेता विजय की पार्टी TVK भी एक विकल्प हो सकती है.

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पार्टी सूत्रों के मुताबिक इस धड़े का मानना है कि विजय के साथ गठबंधन से तमिलनाडु ही नहीं, बल्कि केरल और पुडुचेरी में भी कांग्रेस को फायदा हो सकता है. हालांकि, डीएमके खेमे में इस पूरी कवायद को शक की निगाह से देखा जा रहा है. एक वरिष्ठ डीएमके नेता का कहना है कि कांग्रेस नेतृत्व दिल्ली में भले ही सतर्क हो, लेकिन जमीनी स्तर पर संदेश गलत जा रहा है.

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