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नीतीश के 'रामचंद्र' का सियासी वनवास, अब ये 4 विकल्प, आरसीपी सिंह आगे क्या राह चुनेंगे?

मोदी कैबिनेट में मंत्री रहे आरसीपी सिंह ने इस्तीफा दे दिया है. एक समय आरसीपी सिंह बिहार के सीएम नीतीश कुमार के राइटहैंड माने जाते थे, लेकिन मोदी कैबिनेट में शामिल होने के बाद जेडीयू में उनकी सियासी पकड़ कमजोर हुई तो ललन सिंह और उपेंद्र कुशवाहा मजबूत हुए. ऐसे में आरसीपी के लिए अब बहुत ज्यादा सियासी विकल्प नहीं बच रहे हैं?

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नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह
स्टोरी हाइलाइट्स
  • आरसीपी सिंह ने आखिरकार मोदी कैबिनेट छोड़ा
  • जेडीयू में भी आरसीपी के लिए बहुत ज्यादा जगह नहीं
  • आरसीपी सिंह अब आगे क्या बीजेपी का दामन थामेंगे

JDU कोटे से मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे आरसीपी सिंह ने बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल से अपना इस्तीफा दे दिया, क्योंकि उनके राज्यसभा का कार्यकाल गुरुवार को समाप्त हो रहा है. जेडीयू ने इस बार आरसीपी सिंह के राज्यसभा नहीं भेजा है. ऐसे में अब उनकी नई भूमिका को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, क्योंकि न ही केंद्र में मंत्री रहे और न ही जेडीयू में कोई खास जगह उनके लिए बची है. ऐसे में आरसीपी सिंह आगे क्या सियासी राह चुनेंगे? 

आरसीपी कैसे जेडीयू में नंबर दो की हैसियत

नौकरशाह से सियासत में आए रामचंद्र प्रसाद सिंह (आरसीपी सिंह) ने बिहार के सीएम नीतीश कुमार की उंगली पकड़कर सियासत में आगे बढ़े. आरसीपी और नीतीश कुमार एक ही जिले नालंदा और एक ही जाती कुर्मी समुदाय से आते हैं. ऐसे में दोनों ही नेताओं की दोस्ती गहरी होती गई और आरसीपी देखते ही देखते नीतीश के आंख-नाक-कान बन गए. वो एक समय नीतीश के बाद जेडीयू में नंबर दो की हैसियत रखते थे. जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं, लेकिन फिर भी तीसरी बार उन्हें राज्यसभा का मौका नहीं मिला, जिसके चलते मोदी कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया. 

नीतीश कुमार की मनमर्जी पर आरसीपी का सियासी भविष्य संवरता गया. नीतीश ने जेडीयू की कमान छोड़ी तो आरसीपी सिंह ने ही पार्टी की बागडोर थामी, लेकिन जैसे ही मोदी कैबिनेट में शामिल होकर दिल्ली की सियासत में खुद को आरसीपी ने स्थापित करने की कोशिश की, वैसे ही नीतीश कुमार ने सबक सिखाने का ठान लिया. यही वजह थी कि आरसीपी सिंह को तीसरी बार राज्यसभा पहुंचने का मौका नहीं मिल सका.  

नीतीश-आरसीपी के रिश्तें में क्यों आई खटास? 

बता दें कि नीतीश-आरसीपी की दो दशक की दोस्ती में खटास उस समय आई जब जेडीयू ने केंद्रीय मंत्रिपरिषद में दो सीटों की मांग रखी थी, लेकिन आरसीपी कैबिनेट शामिल होने की जल्दबाजी में एक ही मंत्री पद से मान गए. हालांकि, आरसीपी सिंह यह दावा करते रहे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सहमति से उन्होंने केंद्र में मंत्री पद की शपथ ली थी, लेकिन इतना साफ है कि उनके केंद्र में मंत्री और ललन सिंह के पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद से जेडीयू में उनकी जगह सिकुड़ती गई.  

आरसीपी सिंह ने कभी भी पार्टी या फिर नेतृत्व के खिलाफ न प्रत्यक्ष रूप से कोई काम किया और न ही किसी तरह का कोई बयान दिया. राज्यसभा का टिकट कटने के बाद भी उन्होंने पार्टी आलाकमान में अपनी आस्था जताई पर कहीं न कहीं वह ऐसी चूक पहले कर चुके थे, जिससे पार्टी नेतृत्व के रवैए में उनके प्रति कोई नरमी नजर नहीं आई. केंद्र में मंत्री रहते दिल्ली की राजनीति में आरसीपी सिंह ने अपनी अलग छवि बनाने की कवायद करते रहे तो जेडीयू में उनकी विरोधी लाबी मजबूत होती गई. 

आरसीपी सिंह ने जातीय जनगणना के मुद्दे पर पार्टी के स्टैंड से दूरी बनाए रखी जबकि नीतीश कुमार दशकों से इसके प्रबल समर्थक रहे. इस तरह आरसीपी का सियासी ग्राफ नीतीश की नजर में डाउन हुआ, जिसके चलते उन्हें 'सियासी वनवास' का सामना करना पड़ रहा है. माना जाता है कि नीतीश इस तरह से आरसीपी सिंह को बताना चाहते हैं कि उनको नजरअंदाज कर दिल्ली की सियासत में घुलना मिलना कितना सियासी रूप से आत्मघाती साबित हो सकता है. 

12 ंमहीने ही केंद्र में मंत्री रहे आरसीपी

वहीं, आरसीपी सिंह को खुद और उनके समर्थकों को भरोसा था कि राज्यसभा का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी वह केंद्र में मंत्री बने रहेंगे और आगे कोई न कोई रास्ता निकल आएगा. माना जाता है इसी उम्मीद से उन्होंने मोदी कैबिनेट नहीं छोड़ा जबकि जेडीयू संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा बार-बार यह कहते रहे कि नैतिकता के आधार पर आरसीपी सिंह को इस्तीफा दे देना चाहिए, लेकिन आरसीपी ने कहा कि पीएम मोदी से मिलकर ही कोई फैसला लेंगे. 

केंद्र में मंत्री बनने से पहले तक जेडीयू में नंबर दो की हैसियत रखने वाले आरसीपी सिंह महज 12 महीने ही मोदी कैबिनेट में रह सके, लेकिन पार्टी में अपने लिए जगह कम कर ली. जेडीयू में जिस तरह से ललन सिंह और उपेंद्र कुशवाहा का कद बढ़ा है, उससे आरसीपी सिंह और उनके करीबियों को लिए कोई खास जगह नहीं है. ऐसे में सियासत में बने रहने के लिए आरसीपी सिंह के सामने अब दो ही विकल्प बचे हैं. 

आरसीपी सिंह के सामने सियासी विकल्प

आरसीपी सिंह के सामने पहला विकल्प यह है कि जेडीयू में बने रहे और फिर से अपनी सियासी जगह बनाने के लिए नीतीश कुमार का विश्वास जीते. इससे पहले भी जेडीयू में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की एंट्री हुई थी तो उस समय आरसीपी सिंह पार्टी में साइड लाइन हो गए थे, लेकिन पार्टी नहीं छोड़ी. उन्होंने वक्त का इंतजार किया और मजबूती के साथ उभरकर आए कि जेडीयू के अध्यक्ष बन गए. इसी तरह से उन्हें फिलहाल जेडीयू में साइलेंट तौर पर जमे रहे, क्योंकि उन्होंने अभी तक सार्वजनिक रूप से  पार्टी के खिलाफ न तो कोई काम किया है और ऐसी न कोई प्रतिक्रिया कभी दी है. 

वहीं, आरसीपी सिंह के लिए दूसरा विकल्प जेडीयू छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने का है. ऐसे में बीजेपी उनकी पहली पसंद हो सकती है, लेकिन फिलहाल मोदी की हरी झंडी के बगैर उनके लिए रास्त खुलता नजर नहीं आ रहा है. आरसीपी सिंह अभी हाल में ऐसे समय हैदराबाद पहुंचे थे जब वहां पर बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी चल रही थी. इसके चलते उनके बीजेपी में जाने की चर्चा तेज हो गई थी. 

हालांकि, बीजेपी नेतृत्व किसी भी तरह से बिहार में जेडीयू से अपने रिश्ते नहीं खराब चाहती है. यही वजह थी कि आरसीपी सिंह का कार्यकाल पूरा होने से एक दिन पहले ही मोदी कैबिनेट से इस्तीफा हो गया. इस तरह आरसीपी के फिलहाल बीजेपी में शामिल होने का विकल्प कम ही दिखता है. ऐसे में अब उनके सामने आरजेडी और कांग्रेस ही सियासी विकल्प के रूप में दिख रहे हैं, लेकिन क्या आरसीपी सिंह उस दिशा में अपने कदम बढ़ाएंगे. अब देखना है कि आरसीपी सिंह किस सियासी राह की तरफ अपने कदम बढ़ाते हैं? 

 

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