इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर धार्मिक नाम और प्रतीक चिह्नों वाली राजनीतिक पार्टियों पर पाबंदी लगाने की किसी भी मुहिम या पहल का विरोध किया है. आईयूएमएल ने छह सूत्री हलफनामे में अपने 75 साल के इतिहास का हवाला देते हुए इस याचिका को खारिज करने की दुहाई दी है.
आईयूएमएल ने इस याचिका में स्वाभाविक पक्षकारों के अभाव की बात कही है. यह भी कहा है कि समान मुद्दे और प्रार्थना वाली अश्विनी उपाध्याय की याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में 2019 से ही लंबित है.
की नीयत और विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगाते हुए लीग ने कहा है कि इस मुद्दे पर सीधे सुप्रीम कोर्ट वालों के हाथ साफ नहीं हैं. वो गंदे हाथों से यहां आए हैं. क्योंकि खुद याचिकाकर्ताओं के खिलाफ हेट स्पीच के मामले अदालतों में लंबित हैं.
आईयूएमएल ने दावा किया है कि उसका पीढ़ीगत और पुश्तैनी धर्म निरपेक्षता का इतिहास है. देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक सद्भाव के लिए कई काम किए हैं. इसलिए याचिका में जो कानूनी कार्रवाई करने की बात कही गई है उसकी कोई जरूरत नहीं है. इसके साथ हलफनामे में निर्वाचन आयोग के अधिकारों की भी दुहाई देते हुए कहा गया है कि आयोग को किसी भी पार्टी पर पाबंदी लगाने और निबंधन रद्द करने का कोई अख्तियार नहीं है. ऐसे में याचिकाकर्ता की ये गुहार अनुचित है कि कोर्ट आयोग को निर्देश दें कि वो मुस्लिम लीग का नाम और निशान रद्द करे क्योंकि दोनों धार्मिक हैं. ऐसी मांग वाली अर्जी को खारिज करना ही बेहतर है.
उन्होंने अदालत में दलील दी है कि पिछले 75 सालों में उसने मुस्लिमों की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखते हुए सामाजिक सद्भाव में योगदान किया है.
IUML ने हलफनामे में कहा कि केरल की लोकल बॉडीज में हमारे 100 से ज़्यादा सदस्य हिन्दू और सिख भी हैं. केरल के पूर्व मंत्री ET मोहम्मद बशीर की वजह से राज्य में संस्कृत विश्वविद्यालय खुला है. सुप्रीम कोर्ट में IUML के जनरल सेक्रेटरी PK कुंहलीकुट्टी हलफनामा दाखिल किया..
दरअसल जितेंद्र नारायण त्यागी उर्फ वसीम रिज़वी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर ऐसे राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने की मांग की है, जो पार्टी के नाम में धार्मिक नाम या धार्मिक चिन्हों का इस्तेमाल करते हैं.