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बंगाल समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों में छुपे हैं ये 10 सियासी संदेश

असम में बीजेपी अपनी सत्ता को बचाए रखने के साथ-साथ बंगाल में मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी है. ममता बनर्जी ने खुद हारने के बावजूद बंगाल की सत्ता में बीजेपी के अरमानों पर पानी फेर दिया है. वहीं, दक्षिण भारत के तमिलनाडु में डीएमके के हाथ सत्ता लगी तो केरल में पिनराई विजयन का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अपनी हार के सिलसिले को तोड़ने में नाकाम साबित हो रही है. पांच राज्यों के चुनावी नतीजों में 10 बड़े सियासी संदेश छिपे हुए हैं.

विधानसभा चुनाव के नतीजों के सियासी मायने विधानसभा चुनाव के नतीजों के सियासी मायने
स्टोरी हाइलाइट्स
  • छत्रप अपना दुर्ग बचाने में कामयाब रहे
  • केंद्र के प्रति डगमगाता लोगों का विश्वास
  • कांग्रेस के लिए क्षेत्रीय दल बनेंगे बड़ी चुनौती

कोरोना संकट के बीच रविवार को पश्चिम बंगाल, केरल, असम सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आए. इनमें असम में बीजेपी अपनी सत्ता को बचाए रखने के साथ-साथ बंगाल में मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी है. ममता बनर्जी ने खुद हारने के बावजूद बंगाल की सत्ता में बीजेपी के अरमानों पर पानी फेर दिया है. वहीं, दक्षिण भारत के तमिलनाडु में डीएमके के हाथ सत्ता लगी तो केरल में पिनराई विजयन का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अपनी हार के सिलसिले को तोड़ने में नाकाम साबित हो रही है. पांच राज्यों के चुनावी नतीजों में 10 बड़े सियासी संदेश छिपे हुए हैं.

1. विपक्षी राजनीति के नए समीकरण
पश्चिम बंगाल में अगर टीएमसी जीती और कांग्रेस को असम और केरल में सफलता नहीं मिली तो इससे विपक्ष की राजनीति में नए समीकरण पैदा होंगे. विपक्ष में चुनाव से पहले ही एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के नेतृत्व में एक मंच पर आने की मुहिम शुरू हुई है. इससे पहले शिवसेना ने सार्वजनिक तौर पर पवार के नेतृत्व की वकालत की है. कांग्रेस की मुश्किल यह है कि पार्टी में गांधी परिवार पहले से अपनों के निशाने पर हैं और अब पांच राज्यों में मिली चुनाव हार से और निशाने पर होगी. ऐसे में गैरकांग्रेसी चेहरे की अगुवाई में विपक्ष को एक मंच पर लाने की मुहिम शुरू होगी. ऐसे में ममता बनर्जी विपक्ष की ओर से पीएम मोदी के खिलाफ एक बड़ा चेहरा साबित हो सकती हैं.

2. छत्रपों का वर्चस्व बरकरार
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में जिस तरह से छत्रप अपने सियासी किले को बचाए रखने में कामयाब रहे हैं. बंगाल में ममता बनर्जी और केरल में पिनराई विजयन अपनी-अपनी सत्ता को बचाए रखने में कामयाब रहे हैं. तमिलनाडु में एमके स्टालिन की अगुवाई में डीएमके गठबंधन की दस साल के बाद सत्ता में वापसी हो पाई है. इन तीन ही राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने जीत दर्ज की है और बीजेपी का बंगाल में 80 सीटों के नीचे सिमट जाना एक बड़ा राजनीतिक संदेश दे रहा है. इससे साफ जाहिर होता है कि मोदी का जादू छत्रपों के सामने नहीं चल सका. 

3. कांग्रेस में मचा सियासी घमासन
कांग्रेस बीते करीब एक दशक में अर्श से फर्श पर आ गई है. गांधी परिवार पहले ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के निशाने पर हैं और अब पांच राज्यों के चुनाव में पार्टी के लचर प्रदर्शन के चलते गांधी परिवार के प्रति सवाल खड़े हो सकते हैं. बंगाल में कांग्रेस का खाता न खुलना, असम-केरल में करारी मात और पुडुचेरी में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी में एक बार फिर उठापटक के आसार बढ़ गए हैं, क्योंकि पार्टी के असंतुष्ट समूह (जी-23) के नेताओं की ओर से कांग्रेस के लगातार सिकुड़ते आधार को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे. ऐसे में पार्टी का यह विद्रोही ग्रुप एक बार फिर से मोर्चा खोल सकता है. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए पार्टी के मौजूदा हालात को लेकर उठाए गए सवालों का जवाब देना भी इन नतीजों के बाद आसान नहीं होगा. 

4. क्षेत्रीय दलों के प्रभाव से कांग्रेस की चुनौती
कांग्रेस के सामने अपनी अंदरूनी सियासी चुनौती में भारी इजाफे के साथ ही अब राज्यों में ज्यादा मजबूत होकर उभरे क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक प्रभाव को थामने की दोहरी चुनौती होगी. बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन के मजबूत होने से साफ हो गया है कि एक ओर जहां सूबों में कांग्रेस का सियासी आधार लगातार घट रहा है, तो दूसरी ओर क्षेत्रीय पार्टियां व उनके नेता राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्षी राजनीति में उसकी जगह के लिए बड़ा खतरा बनते नजर आ रहे हैं.

5. दक्षिण में अभी भी बीजेपी का असर नहीं
दक्षिण भारत के तीन राज्यों में केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव हुए हैं. केरल में भाजपा अपना खाता भी नहीं खोल सकी है जबकि तमिलनाडु में AIADMK के साथ मिलकर भी कोई बड़ा सियासी करिश्मा दिखाने में सफल नहीं हुई. बीजेपी तमिलनाडु में 20 सीटों पर चुनावी मैदान में उतरी थी, जिनमें से वह 4 सीट जीतने में ही कामयाब रही है. हालांकि, पुडुचेरी में जरूर बीजेपी सफल रही है, लेकिन बाकी दक्षिण के राज्यों में जिस तरह से पार्टी का खाता नहीं खुला है. इससे साफ जाहिर होता है कि दक्षिण में बीजेपी के लिए अभी भी सियासी जमीन बनाना आसान नहीं है? 

6. दलबदलुओं पर जनता का भरोसा नहीं
देश के पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा दलबदलू नेताओं को बीजेपी ने बंगाल के सियासी रण में उतारा था. एक दर्जन से ज्यादा विधायकों सहित कुल 30 टीएमसी से आए नेताओं को बीजेपी ने चुनावी मैदान में उतारा था, जिनमें से तमाम नेताओं को जनता ने पूरी तरह से नकार दिया है. टीएमसी से आए सिर्फ छह नेता ही बीजेपी के टिकट पर जीत सके हैं और बाकी सभी नेताओं को करारी मात खानी पड़ी है. वहीं, केरल में बीजेपी ने मेट्रोमैन के नाम से मशहूर श्रीधरन से लेकर तमाम नेताओं के चुनावी मैदान में उतारा था, लेकिन पार्टी एक भी सीट जीत नहीं सकी. ऐसे ही तमिलनाडु में डीएमके से आई खुशबू को बीजेपी ने प्रत्याशी बनाया था, लेकिन उन्हें भी जीत नसीब नहीं हुई. 

7. बीजेपी के खिलाफ मुस्लिम एकजुट
पश्चिम बंगाल से लेकर केरल और तमिलनाडु तक मुस्लिम मतदाता बीजेपी के खिलाफ एकजुट नजर आए. बंगाल में बीजेपी हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करने की तमाम कोशिशें करती रही, लेकिन कामयाब नहीं हो सकी. इसका उल्टा यह हुआ कि मुस्लिम मतदाता एकजुट हो गए और उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी, अब्बास पीरजादा सहित कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन के बजाय ममता के पक्ष में वोटिंग करना बेहतर समझा. ऐसे ही केरल में मुस्लिम मतदाताओं ने एलडीएफ और यूडीएफ को वोट किया. वहीं, असम में मुस्लिम मतदाता कांग्रेस-गठबंधन के साथ एकजुट रहा. बंगाल में मुस्लिमों की रणनीति कामयाब रही, लेकिन असम में सफल नहीं हो सकी. 

8. कांग्रेस-लेफ्ट को सियासी वजूद का खतरा
बंगाल के सियासी इतिहास में पहली बार कांग्रेस और लेफ्ट का खाता न खुलना एक बड़ा राजनीतिक संदेश है. कांग्रेस और लेफ्ट को न तो मुस्लिम वोट मिले और न ही सत्ताविरोधी वोट मिले. वो भी तब जब लेफ्ट ने साढ़े तीन दशक और कांग्रेस ने ढाई दशक तक बंगाल में राज किया है. कांग्रेस और लेफ्ट का मुस्लिम वोट टीएमसी में शिफ्ट हो गया तो गैर-मुस्लिम वोट बीजेपी में चला गया. कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन का वोट शेयर 37 फीसदी से घटकर 10 फीसदी पर आ गया है. ऐसे में कांग्रेस और लेफ्ट के लिए बंगाल में आने वाला वक्त और भी कठिन होगा. 

9. केंद्र सरकार से डगमगाता भरोसा

पांच राज्य के विधानसभा चुनाव नतीजे से यह साफ है कि केंद्र की मोदी सरकार के प्रति लोगों का भरोसा उसी तरह से डगमगा रहा है, जैसे यूपीए-2 में मनमनोहन सिंह सरकार के प्रति हुआ था. बीजेपी ने पांच राज्यों में मोदी सरकार के नाम पर और काम वोट मांगा था. बंगाल छोड़कर किसी भी राज्य में बीजेपी को राजनीतिक तौर पर फायदा नहीं मिला है. बंगाल में बीजेपी की सीटें बढ़ी हैं, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को जितनी बढ़त मिली थी. वो इन चुनावों में नहीं दिखाई दी. ऐसे ही असम में बीजेपी के अगुवाई वाला गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब तो रहा, लेकिन उसकी सीटें पिछली बार से कम आई हैं. केरल में पार्टी ने अपनी जीती हुई सीट भी गंवा दी है. हालांकि, पुडुचेरी में उसे सफलता मिली है. 

10. ममता-विजयन की विश्वसनीयता बरकरार
पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी और केरल में पिनराई विजयन की विश्वसनीयता पूरी तरह से बरकरार है. बंगाल में टीएमसी ममता के चेहरे पर चुनाव लड़कर पिछली बार से ज्यादा सीटें लाई है तो केरल में लेफ्ट पिनराई विजयन के चेहरे और काम पर चुनाव लड़कर एलडीएफ ने 40 साल के इतिहास को तोड़कर नया रिकॉर्ड कायम किया है. इससे जाहिर है कि बंगाल में ममता बनर्जी और केरल में पिनराई विश्वसनीयता पूरी तरह से बरकरार है. इंडिया टुडे के कंसल्टिंग एडिटर प्रभु चावला ने कहा कि तीसरे टर्म में जो एंटी इनकम्बेंसी होनी चाहिए थी, वो इनके खिलाफ नहीं दिखी और लोगों ने इन्हें पहले से ज्यादा सीटें देकर अपना सत्ता सौंपी है. वहीं, असम में बीजेपी के पांच साल में किए गए विकास कार्य को तरजीह लोगों ने दी है और सीएए जैसे मुद्दे को पूरी तरह से नकार दया है जबकि असम में इसके लिए ही सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन हुए थे. 

 

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