अलगाववादी नेता यासीन मलिक की सजा को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में 22 अप्रैल को अहम सुनवाई होगी. राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने उसके लिए मौत की सजा की मांग की है, जबकि वह पहले से उम्रकैद काट रहे हैं. यह अपील एक टेरर फंडिंग केस से जुड़ी है, जिसमें यासीन मलिक पहले ही दोषी करार दिए जा चुके हैं.
इससे पहले 28 जनवरी को जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने NIA को यासीन मलिक के विस्तृत जवाब पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया था. कोर्ट ने इसे एजेंसी के लिए आखिरी मौका भी बताया. सुनवाई के दौरान यासीन मलिक तिहाड़ जेल से वर्चुअल पेश हुए.
उन्होंने NIA पर जानबूझकर कार्यवाही में देरी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि साल 2023 में अपील दायर होने के बाद से बार-बार सुनवाई टलने से उन्हें मानसिक आघात पहुंचा है. हालांकि, कोर्ट ने उनकी इस दलील को खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि उन्होंने जवाब दाखिल करने में एक साल का समय लिया.
इसके साथ यह भी कहा गया कि किसी ऐसे व्यक्ति की सजा बढ़ाने से जुड़े मामलों में जल्दबाजी की कोई तत्काल जरूरत नहीं होती, जो पहले से ही उम्रकैद की सजा काट रहा हो. यह पूरा मामला मई 2022 का है, जब एक ट्रायल कोर्ट ने प्रतिबंधित संगठन जम्मू और कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के प्रमुख को दोषी ठहराया था.
उन पर गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप तय किए गए थे. गंभीर आतंकी अपराधों में दोषी पाए जाने के बावजूद ट्रायल कोर्ट ने उन्हें मौत की सजा नहीं दी थी. अदालत ने कहा था कि यह मामला दुर्लभतम से दुर्लभ की श्रेणी में नहीं आता.
इसके बाद NIA ने साल 2023 में इस फैसले को चुनौती दी. जांच एजेंसी का कहना है कि ट्रायल कोर्ट का तर्क कानूनी रूप से गलत था. NIA का दावा है कि आतंकवादियों को सिर्फ अपराध स्वीकार करने के आधार पर मौत की सजा से बचने देना कानून को कमजोर करता है. यह एक खतरनाक मिसाल बन सकता है.
जांच एजेंसी के मुताबिक, यासीन मलिक के अपराध बेहद गंभीर हैं. इनमें भारत के खिलाफ युद्ध और अलगाववादी हिंसा को बढ़ावा देना शामिल है. इसके चलते सुरक्षाकर्मियों समेत कई लोगों की जान गई. इसलिए उन्हें अधिकतम सजा मिलनी चाहिए. वहीं, अपने 85 पन्नों के जवाबी हलफनामे में यासीन ने गंभीर दावे किए हैं.
उनका कहना है कि उन्होंने करीब तीन दशक तक राज्य द्वारा अधिकृत एक वार्ता तंत्र के तहत काम किया. जम्मू-कश्मीर में शांति स्थापित करने के लिए कई प्रधानमंत्रियों, खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों और व्यापारिक नेताओं से बातचीत की थी. उन्होंने आरोप लगाया कि अब सरकार इतिहास मिटाने की कोशिश कर रही है.