रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मौत से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद बने UGC के नए नियम अब विवाद के केंद्र में आ गए हैं. इन नियमों को लेकर जहां एक ओर आपत्तियां दाखिल की गई हैं, वहीं सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह का कहना है कि ये गाइडलाइंस अदालत के सीधे निर्देशों का नतीजा हैं और कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकने की दिशा में एक जरूरी कदम हैं.
बता दें कि जनवरी 2025 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने UGC को आदेश दिया था कि वो देश की सभी केंद्रीय, राज्य, निजी और डीम्ड यूनिवर्सिटीज से जानकारी जुटाए. कोर्ट ने पूछा था कि क्या इन संस्थानों में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेल बनाए गए हैं या नहीं.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि UGC एक हलफनामा दाखिल करे जिसमें बताया जाए कि 2012 के नियमों के तहत कितनी शिकायतें मिलीं और उन पर क्या कार्रवाई की गई. यह आदेश इसलिए दिया गया था क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि 2012 में बने एंटी-रैगिंग और एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नियमों का सही तरह से पालन नहीं हो रहा है. कई विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में न तो ग्रिवांस सेल हैं और न ही इक्वल ऑपर्च्युनिटी कमेटी, जो पिछड़े वर्गों के छात्रों की मदद कर सकें.
एक एक्सपर्ट कमेटी ने भी कहा था कि नियमों को ठीक से लागू नहीं किया जा रहा है और भेदभाव झेल रहे छात्रों को जरूरी मदद नहीं मिल पा रही है. 15 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि UGC के नए नियम नोटिफाई कर दिए गए हैं. इस दौरान सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने कुछ आपत्तियां जताईं और कहा कि नए नियमों को लागू करने में दिक्कतें आ सकती हैं.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि इन नियमों को लागू करने के तरीके पर नजर रखने की ज़रूरत होगी. कोर्ट ने इंदिरा जयसिंह से कहा कि वह नियमों को सही तरीके से लागू करने के लिए अपने सुझाव दें. अब जब इन नियमों को लेकर विरोध हो रहा है तो इंदिरा जयसिंह ने इंडिया टुडे से कहा कि इस तरह की आपत्तियां हैरान करने वाली हैं.
उन्होंने कहा कि यह मामला दो साल से ज्यादा समय से सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है और नए नियम कोर्ट के आदेश पर ही लाए गए हैं. हालांकि उन्होंने यह भी माना कि कमजोर छात्रों की सही सुरक्षा के लिए अभी और काम करने की ज़रूरत है, खासकर नियमों को जमीन पर ठीक से लागू करने के मामले में.