भारत में पेट्रोल के विकल्प के तौर पर इथेनॉल को जिस तरह 'क्रांति' बताया जा रहा है, वह दरअसल ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर एक बड़ा 'नीतिगत धोखा' और आने वाले जल संकट की भयावह आहट है. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस धान की खेती को 'पानी का दुश्मन' बताकर पंजाब-हरियाणा के किसानों को विलेन की तरह पेश किया गया, आज उसी अनाज को 'ग्रीन फ्यूल' की भट्टी में झोंका जा रहा है.
एक तरफ नीति आयोग 2030 तक देश के कई बड़े शहरों में जल संकट की चेतावनी दे रहा है तो दूसरी तरफ सरकार मात्र 1 लीटर चावल-आधारित इथेनॉल के लिए करीब 10,790 लीटर बेशकीमती पानी स्वाहा कर 95 लाख टन अनाज बर्बाद करने की तैयारी में है. ग्रीन फ्यूल का यह मुखौटा दरअसल आम आदमी की थाली और आने वाली नस्लों के पानी की बलि पर टिका है, जो एक गंभीर पर्यावरण संकट को व्यापारिक मुनाफे में बदलने का सोची-समझी साजिश जैसा दिखता है.
यह एक गंभीर नीतिगत विडंबना है कि जिन किसानों को कभी धान की खेती के लिए कटघरे में खड़ा किया गया, आज उन्हीं के उगाए चावल को 'ग्रीन फ्यूल' के नाम पर कंपनियों को कौड़ियों के दाम देकर बर्बाद किया जा रहा है, जो न केवल जल संकट को खुला आमंत्रण है बल्कि टैक्सपेयर्स के पैसे का भी साफ-साफ दुरुपयोग है.
नीति आयोग की 'समग्र जल प्रबंधन सूचकांक' (CWMI) रिपोर्ट जब यह डरावनी चेतावनी दे रही हो कि 2030 तक दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे 21 बड़े शहरों का भूजल 'शून्य' होकर दम तोड़ देगा, तब चावल से इथेनॉल बनाने की यह सरकारी जिद सीधे तौर पर 'आत्मघाती' कदम जान पड़ती है. ऊर्जा सुरक्षा के छलावे में अन्न और जल की यह बर्बादी दरअसल भविष्य की पीढ़ियों की प्यास और उनके अस्तित्व का एक क्रूर नीतिगत सौदा है, जो आने वाले समय में एक जल त्रासदी का आधार तैयार कर रहा है.
डरावनी तस्वीर
खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने 27 सितंबर 2024 को नई दिल्ली में ISMA (इंडियन शुगर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन) द्वारा आयोजित एक वैश्विक सम्मेलन के दौरान बताया था कि चावल से 1 लीटर इथेनॉल बनाने के लिए 10,790 लीटर, मक्के से 4,670 लीटर और गन्ने से 3,630 लीटर पानी की आवश्यकता होती है. इसमें धान की खेती के दौरान सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाला पानी भी शामिल है. सामान्य तौर पर, 1 किलो चावल उगाने के लिए लगभग 3,000 लीटर पानी खर्च होता है. चूंकि 1 टन (1000 किलो) चावल से लगभग 470 लीटर इथेनॉल बनता है, इसलिए केवल फसल उगाने के अनुपात में ही प्रति लीटर इथेनॉल पर हजारों लीटर पानी का भार आता है.
चावल का क्या है चक्कर
तर्क यह कहता है कि यदि ऊर्जा सुरक्षा अनिवार्य है, तो सरकार को गन्ना और मक्का आधारित इथेनॉल को बढ़ावा देना चाहिए, न कि चावल को. लेकिन हकीकत में एक गहरा नीतिगत विरोधाभास दिखाई देता है. जहां एक तरफ जल संकट की चेतावनी है, वहीं दूसरी ओर सरकार ने इथेनॉल आपूर्ति वर्ष (ESY) 2024-25 के लिए चावल का आवंटन बढ़ाकर 52 लाख टन कर दिया है और इसे ESY 2025-26 में 90 लाख टन तक ले जाने की तैयारी है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अब एक नया 'नीतिगत पैंतरा' चला गया है.
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत गरीबों को दिए जाने वाले अनाज में 'टूटे चावल' की हिस्सेदारी को 25 से घटाकर 10 फीसदी करने की योजना है. इस कटौती का सीधा मकसद सालाना लगभग 90 लाख टन टूटा चावल बचाकर उसे इथेनॉल उद्योग की भट्टी में झोंकना है. डरावनी बात यह है कि 'ग्रीन फ्यूल' के इस जुनून में हम उस अरबों-खरबों लीटर भूजल को 'जला' रहे हैं, जिसे रिचार्ज होने में प्रकृति को लंबा समय लगता है. यह ऊर्जा सुरक्षा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जल-अधिकार पर डकैती भी है.
टैक्सपेयर का मजाक
यह आर्थिक और नीतिगत खेल जल संकट से भी आगे जाकर टैक्सपेयर की जेब पर सीधी डकैती जैसा भी है. सरकार डिस्टिलरीज को महज 2,320 रुपये प्रति क्विंटल पर चावल दे रही है, जबकि इसकी वास्तविक आर्थिक लागत 4,173 रुपये आती है. यानी कंपनियों को सीधे जनता के पैसे से भारी सब्सिडी दी जा रही है. विडंबना देखिए कि पहले टैक्सपेयर के पैसे से खाद, बिजली और पानी पर सब्सिडी देकर धान उगाया गया, फिर उसे MSP पर खरीदा गया और अब उसी अनाज को दोबारा घाटा सहकर कंपनियों को कौड़ियों के भाव लुटाया जा रहा है.
यह बर्बादी को 'क्रांति' बताकर जनता को दोबारा लूटने जैसा है. इस नीति का सबसे बुरा असर मक्का किसानों पर पड़ा है, जिन्हें सरकार ने 'ऊर्जादाता' बनने का सपना दिखाकर मक्का उगाने को प्रेरित किया, लेकिन अब चावल का कोटा बढ़ने से बाजार में मक्के की कीमतें गिर गई हैं और वे अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर हैं. पिछले एक साल से मक्का किसानों को 2400 रुपये प्रति क्विंटल की एमएसपी की बजाय औसतन 1600 रुपये ही मिले हैं.
किसान 'विलेन', कंपनियां 'हीरो क्यों?
इस पूरी नीति का सबसे क्रूर पहलू वह 'नैरेटिव' है, जो पंजाब और हरियाणा के किसानों के खिलाफ बुना गया है. वर्षों से इन किसानों को यह कहकर कटघरे में खड़ा किया गया कि वे धान (चावल) उगाकर देश का भूजल 'पी' रहे हैं. उन्हें जल-स्तर गिरने का मुख्य अपराधी घोषित किया गया. किसानों को पानी की अधिक खपत के लिए अपमानित किया गया, तो दूसरी ओर सरकार उसी 'पानी-खोर' चावल को इथेनॉल की भट्टियों में स्वाहा करने का मेगा-प्लान बना रही है. अब इन इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों को जल संकट का विलेन क्यों नहीं घोषित किया जा रहा है? उल्टे इथेनॉल बनाने वालों को हीरो की तरह पेश किया जा रहा है. सवाल सीधा है कि अगर किसान के खेत में धान उगाना 'जल-अपराध' है, तो सरकार द्वारा उसी धान को 10,790 लीटर पानी की बर्बादी वाले ईंधन में बदलना 'राष्ट्रीय उपलब्धि' कैसे हो गई?
जल संकट को आमंत्रण
चिंता करने वाली बात यह है कि देश की कुल 1,822 करोड़ लीटर की इथेनॉल क्षमता में सबसे अधिक उन्हीं राज्यों में है जो बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं. महाराष्ट्र में 396 करोड़ लीटर की क्षमता वाले प्लांट हैं. जबकि यहां विदर्भ और मराठवाड़ा में किसान पानी के लिए जंग लड़ते हैं. लेकिन इथेनॉल प्लांट निर्बाध चल रहे हैं. इसी तरह उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में गन्ने और अनाज आधारित इथेनॉल प्लांट उस भूजल को 'निचोड़' रहे हैं जिसे नीति आयोग 'शून्य' होने की कगार पर बता रहा है.
यह सोचने वाली बात है कि जब 2030 में नल सूखेंगे, तब कार की टंकी में भरा 'इथेनॉल' किसी की प्यास बुझा पाएगा क्या? हकीकत तो यह है कि तेल बाजार से खरीदा जा सकता है, लेकिन लुप्त हो चुका भूजल वापस नहीं लाया जा सकता. समय आ गया है कि हम ऊर्जा सुरक्षा की परिभाषा को 'जल सुरक्षा' के चश्मे से देखें, वरना इतिहास हमें एक ऐसे देश के रूप में याद रखेगा जिसने गाड़ियां चलाने के लिए बेशकीमती भू-जल को बर्बाद किया.