राजधानी दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में गुरुवार को भगवान स्वामीनारायण के किशोर योगी स्वरूप की प्रतिमा की स्थापना की गई. धार्मिक अनुष्ठान और वेदमंत्रों के बीच 108 फीट ऊंची इस प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई, जो अक्षरधाम मंदिर फ्लाइओवर से आते-जाते लोगों के आकर्षण का केंद्र बन रही है. सुनहरी चमक वाली, दोनों हाथों को ऊपर उठाए और एक पांव पर खड़ी ये प्रतिमा दूर से ही भव्यता के साथ नजर आती है.
'स्वामिनारायण अक्षरधाम, नई दिल्ली में स्थापित यह प्रतिमा श्रीनीलकंठ वर्णी की है. श्रीनीलकंठ वर्णी भगवन स्वामीनारायण का ही एक नाम है. जब वह किशोर उम्र में तपस्या कर रहे थे, तब उन्हें यह नाम मिला था. प्रतिमा में उनकी कठिन तपस्या की स्थिति को दिखाया गया है. यह दिव्य मूर्ति तप, त्याग और आध्यात्मिक अनुशासन का प्रतीक है.
नेपाल के 'मुक्तिनाथ' में की थी तपस्या
श्रीनीलकंठ वर्णी की यह प्रतिमा उसी योग-मुद्रा है, जिसमें वह नेपाल के 'मुक्तिनाथ' में लंबी तपस्या के दौरान स्थिर रहे थे. यह प्रतिमा उनकी उस पवित्र तीर्थयात्रा और कठोर साधना की याद दिलाती है. भगवान स्वामिनारायण का जन्म '1781 ईस्वी' में उत्तर प्रदेश में गोंडा जिले के पास स्थित 'छपिया' गांव में हुआ. उनका बचपन छपिया और अयोध्या में बीता. यहां उनके माता-पिता ने उनका नाम घनश्याम रखा था.
'29 जून 1792' को मात्र '11 वर्ष' की आयु में उन्होंने घर छोड़ दिया और वैराग्य की ओर बढ़ गए. इसी दौरान उन्होंने ‘नीलकंठ वर्णी’ नाम धारण किया. इसके बाद वह लंबी पदयात्रा पर निकल पड़े. सात साल की पैदल यात्रा में उन्होंने सभी तीर्थों के दर्शन करते हुए लगभग '12,000 किलोमीटर' की दूरी तय की. इस दौरान उन्होंने भारत समेत नेपाल, तिब्बत, भूटान और बांग्लादेश की भी यात्रा की थी.
नंगे पांव सात साल तक की तीर्थयात्राएं
नंगे पांव, केवल एक साधारण लंगोट धारण किए, बिना धन और किसी सांसारिक संपत्ति के नीलकंठ वर्णी अदम्य साहस के साथ आगे बढ़ते रहे. उन्होंने हिमालय की बर्फीली और दुर्गम चोटियों को पार किया, पूर्वी भारत के घने जंगलों से गुजरे, दक्षिण भारत के फैले हुए समुद्री तटों की यात्रा किया और पश्चिम भारत के विशाल भूभाग को भी नापा.

अपनी इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान उन्होंने अनेक प्रमुख तीर्थस्थलों, उत्तर में 'बद्रीनाथ और केदारनाथ', दक्षिण में 'तिरुपति और रामेश्वरम', तथा पश्चिम में 'पंढरपुर और सोमनाथ' का दर्शन किया. सभी जगहों पर श्रीनीलकंठ वर्णी ने विभिन्न मतों और पृष्ठभूमियों के लोगों से अध्यात्म पर गहराई से बातचीत की. उन्होंने जीवन और अध्यात्म के मूल तत्वों पर प्रकाश डाला और असंख्य लोगों को 'मोक्ष' के मार्ग की दिशा दिखाई.
कई मौकों पर वह कई-कई दिनों तक बिना अन्न और जल के रहे. 'मानसरोवर' और 'जगन्नाथ पुरी' जैसे पवित्र स्थलों पर उन्होंने कठोर तपस्याया की. इसी क्रम में जब वह नेपाल के 'मुक्तिनाथ' तीर्थ पहुंचे तब वहां उन्होंने अपनी सबसे कठिन साधना की जहां वे महीनों तक एक पैर पर खड़े होकर, दोनों हाथ ऊपर उठाए, गहरे ध्यान में लीन रहे. यह भव्य प्रतिमा उसी असाधारण तप, धैर्य और भक्ति की यादगार है.
श्रीनीलकंठ वर्णी की यह यात्रा, संकल्प और सभी लोगों के हित चाहने की भावना से प्रेरित थी. उनकी यह यात्रा '21 अगस्त 1799' को गुजरात में पूरी हुई. '21 वर्ष' की आयु में वे एक महान आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे. उन्होंने 'सनातन हिंदू धर्म' के सिद्धांतों और परंपराओं को फिर से जीवित किया और समाज के उत्थान कई सामाजिक और आध्यात्मिक पहल कीं. इस तरह वह बचपन में घनश्याम, कठिन तपस्या में नीलकंठ वर्णी और फिर अपने दिव्य गुणों और तपस्या के फल के कारण अनगिनत श्रद्धालुओं के हृदय में 'परब्रह्म भगवान श्रीस्वामिनारायण' के रूप में स्थापित हुए और पहचाने गए.
देश ही नहीं विदेशों में भी स्थापित हैं नीलकंठ वर्णी की भव्य प्रतिमाएं
श्रीनीलकंठ वर्णी की भव्य प्रतिमाएं देश ही नहीं विदेशों में भी स्थापित हैं. दुनिया भर में बोचासनवासी अक्षरपुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (BAPS) द्वारा स्थापित स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिरों में स्वामी नारायण के तप मुद्रा में किशोर अवस्था की प्रतिमाएं समय-समय पर स्थापित की गई हैं. गांधीनगर, गुजरात के अक्षरधाम परिसर में 49 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित हैं.
वहीं न्यूजर्सी के रॉबिंसविले में स्थित अक्षरधाम में भी यह तपोमूर्ति स्थापित है. ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में भी उनकी एक ऊंची प्रतिमा लगाई गई है जो आकर्षण का केंद्र है.जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में भी नीलकंठ वर्णी की 42 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है, जो अफ्रीकी महाद्वीप की ऊंची कांस्य प्रतिमाओं में से एक है.