सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आईएसआईएस आतंकी फंडिंग मामले में आरोपी एक इंजीनियर की याचिका पर सुनवाई की, जिसमें मुकदमों में होने वाली अत्यधिक देरी का मुद्दा उठाया गया. केंद्र सरकार के एएसजी (ASG) ने अदालत को सूचित किया कि एनआईए (NIA) मामलों में तेजी लाने के लिए एक समर्पित अदालत (Dedicated Court) नामित करने का फैसला लिया गया है. इस मामले में न्यायिक अधिकारी की सर्जरी के कारण कुछ महीनों की देरी हुई थी.
चीफ जस्टिस ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब तक सरकार अपना खजाना नहीं खोलती और अतिरिक्त विशेष अदालतों और बुनियादी ढांचे के लिए बजट मंजूर नहीं करती, तब तक स्थिति नहीं बदलेगी.
सरकार ने आश्वासन दिया कि यूएपीए (UAPA) और एनआईए के लिए समर्पित अदालतें स्थापित होने के बाद एक साल के अंदर मुकदमे पूरे कर लिए जाएंगे. कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 10 फरवरी के लिए तय की है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश ने एएसजी से कहा कि अदालतें सिर्फ इसलिए सक्रिय न हों क्योंकि मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने है. उन्होंने उन 'अदृश्य और बेजुबान' पीड़ितों का मुद्दा उठाया, जिनके मुकदमे कई साल से लंबित हैं. कोर्ट ने जोर दिया कि जब तक पर्याप्त अदालतें और न्यायिक अधिकारी नहीं होंगे, तब तक एक मजबूत तंत्र विकसित नहीं हो पाएगा. कोर्ट ने कहा कि भवन निर्माण में समय लगता है, लेकिन बजट की मंजूरी से बड़ा फर्क पड़ता है.
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सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया कि वे एनआईए और यूएपीए मामलों के लिए समर्पित अदालतों को मजबूत करना चाहते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि जब तक नए अधिकारियों की भर्ती चल रही है, तब तक उच्च न्यायालयों से मौजूदा अधिकारियों को इन समर्पित अदालतों के लिए तैनात करने का अनुरोध किया जा सकता है. कोर्ट का अहम मकसद यह है कि ऐसी व्यवस्था बने, जिससे लोगों को बार-बार सुप्रीम कोर्ट न आना पड़े.