केंद्र सरकार को बेवजह मुकदमों में उलझने के लिए फटकार लगाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उस पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया. यह जुर्माना पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने के लिए लगाया गया, जिसमें CISF के एक कर्मचारी की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया गया था.
हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कर्मचारी को पिछली बकाया सैलरी भी देने का आदेश दिया, क्योंकि उन्हें दी गई सज़ा ज़रूरत से ज़्यादा लगी.
जस्टिस नागरत्ना ने कहा, "हमारी समझ में यह नहीं आ रहा कि भारत सरकार ने हाई कोर्ट की डिवीज़न बेंच के आदेश को चुनौती क्यों दी है. हम हमेशा मुकदमों के पेंडिंग होने की बात सुनते रहते हैं. आखिर सबसे ज़्यादा मुकदमे कौन लड़ रहा है? ऐसे मामलों में जुर्माना लगाया जाना चाहिए."
'बैकलॉग के लिए सरकार ज़िम्मेदार...'
कोर्ट ने कहा, "ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि अगर हाई कोर्ट ने इसे असंगत पाया और सभी आदेशों को रद्द करते हुए राहत दी, तो हम सुप्रीम कोर्ट न जाएं? उन्होंने मेडिकल छुट्टी ली थी, लेकिन उन्हें अपने परिवार में किसी के भाग जाने की समस्या से भी निपटना पड़ा."
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में अपने हालिया बयान का ज़िक्र करते हुए, जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कोर्ट ने SCBA कॉन्फ्रेंस को बहुत गंभीरता से लिया था. हाल ही में उन्होंने कहा था कि मामलों के बैकलॉग के लिए सरकार ज़िम्मेदार है.
उन्होंने आगे कहा कि यह सिर्फ़ किसी रिसॉर्ट में जाकर वापस आने के लिए नहीं था. हमने तैयारियां कीं, हमने होमवर्क किया. हमने बात की. इसे भूलना नहीं चाहिए.
यह भी पढ़ें: नेपाल के पूर्व PM केपी ओली को बड़ा झटका! सुप्रीम कोर्ट से जमानत याचिका खारिज
CISF कर्मचारी पर दो आरोप लगाए गए थे, पहला- 11 दिनों तक ड्यूटी से गैर-हाज़िर रहने का, दूसरा- यह कि उन्होंने एक महिला (जो CISF कांस्टेबल की बेटी थी) के साथ मिलकर मुंबई से भागने और अपने छोटे भाई की शादी में शामिल होने की साज़िश रचकर अनुशासनहीनता की थी.
हाई कोर्ट ने यह बात नोट की थी कि 11 दिनों की गैर-हाज़िरी के बारे में स्पष्टीकरण दिया गया था, क्योंकि उस दौरान कर्मचारी स्वीकृत मेडिकल छुट्टी पर थे.
जहां तक उस महिला के प्रतिवादी-याचिकाकर्ता के भाई के साथ भाग जाने के दूसरे आरोप का सवाल है, तो रिकॉर्ड पर यह बात सामने आई है कि वह महिला खुद ही अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान पेश हुई थी और उसने कहा था कि उसे प्रतिवादी-याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई शिकायत नहीं है.
हाई कोर्ट ने कहा, "इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि प्रतिवादी-याचिकाकर्ता के भाई ने ही उस संबंधित महिला से शादी की थी. इसलिए, यह पाया गया है कि वास्तव में प्रतिवादी की तरफ से ऐसा कोई कदाचार नहीं हुआ था, जिसके लिए उसे सेवा से हटाया जा सके."