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सुप्रीम फैसले के बाद अब SIR पर आगे की राह क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को संवैधानिक मान्यता दी है और चुनाव आयोग को मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का अधिकार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट से नाम हटना नागरिकता खत्म होने का प्रमाण नहीं है.

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सुप्रीम कोर्ट ने SIR को वैध बताया है
सुप्रीम कोर्ट ने SIR को वैध बताया है

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के बड़े फैसले ने चुनाव आयोग, नागरिकता और वोटर लिस्ट को लेकर नई बहस छेड़ दी है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने साफ कहा है कि चुनाव आयोग (ECI) को मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का संवैधानिक अधिकार है और उसने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर SIR प्रक्रिया चलाई है. अदालत ने यह भी माना कि इस प्रक्रिया में दावा, आपत्ति और अपील जैसे पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं.

लेकिन फैसले की सबसे अहम बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि वोटर लिस्ट से नाम हटना किसी व्यक्ति की नागरिकता खत्म होने का प्रमाण नहीं माना जाएगा. अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग केवल चुनावी उद्देश्यों के लिए यह तय कर सकता है कि कोई व्यक्ति वोटर लिस्ट में शामिल होने की पात्रता रखता है या नहीं. आयोग नागरिकता पर अंतिम फैसला नहीं दे सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'अगर किसी व्यक्ति की ओर से दिए गए दस्तावेज आयोग को संतोषजनक नहीं लगते या संदेह पैदा करते हैं, तो आयोग नामांकन अस्वीकार कर सकता है या कानूनी प्रक्रिया के तहत नाम हटाने की कार्रवाई कर सकता है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होगा कि वह व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है.”

अब हटाए गए लोगों के साथ क्या होगा?

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अदालत ने आदेश दिया है कि जिन लोगों के नाम “संदिग्ध नागरिकता” के आधार पर वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनके मामलों को चुनाव आयोग चार सप्ताह के भीतर 'सक्षम प्राधिकारी' के पास भेजेगा. यही प्राधिकारी नागरिकता की अंतिम जांच करेगा.

कोर्ट ने कहा है कि संबंधित व्यक्ति को नोटिस दिया जाएगा, सुनवाई का अवसर मिलेगा और उसके दस्तावेजों की जांच की जाएगी. अगर जांच में वह भारतीय नागरिक पाया जाता है तो उसका नाम फिर से वोटर लिस्ट में जोड़ा जाएगा.

SIR में पहले से मौजूद है दावा और आपत्ति का प्रावधान

SIR प्रक्रिया में पहले ही दावा और आपत्ति दर्ज कराने की व्यवस्था मौजूद है. जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाए गए थे, उन्हें इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) और जिला प्रशासन के सामने दस्तावेज जमा करने का मौका दिया गया था.

पश्चिम बंगाल में तो सुप्रीम कोर्ट ने खुद रिटायर्ड हाई कोर्ट जजों की निगरानी में अपील प्रक्रिया बनाई थी. वहां 34 लाख से ज्यादा अपीलें दायर हुईं. चुनाव से कुछ घंटे पहले करीब 1600 लोगों के नाम दोबारा वोटर सूची में जोड़े गए, जबकि 14 मई तक 4043 अपीलें ट्रिब्यूनल द्वारा स्वीकार की जा चुकी थीं.

भारत में क्या है नागरिकता का आधार?

भारतीय कानून के तहत नागरिकता तय करने का अधिकार गृह मंत्रालय (MHA) के पास है. भारत में नागरिकता चार आधारों पर दी जाती है- जन्म, वंश, पंजीकरण और प्राकृतिककरण.

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26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति स्वतः भारतीय नागरिक माना जाता है.
1 जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 के बीच जन्मे व्यक्ति को नागरिकता तभी मिलेगी जब उसके माता-पिता में से कम से कम एक भारतीय नागरिक हो.
3 दिसंबर 2004 के बाद जन्मे व्यक्ति के लिए दोनों माता-पिता का भारतीय होना या एक भारतीय और दूसरा अवैध प्रवासी न होना जरूरी है.

विदेश में जन्मे भारतीय मूल के लोग वंश के आधार पर नागरिकता का दावा कर सकते हैं. वहीं विदेशी नागरिक प्राकृतिककरण प्रक्रिया के जरिए नागरिकता हासिल कर सकते हैं.

नागरिकता साबित करने के लिए कौन से दस्तावेज जरूरी होंगे?

गृह मंत्रालय नागरिकता सत्यापन के दौरान जन्म की तारीख, जन्म स्थान और माता-पिता की स्थिति से जुड़े दस्तावेज देखता है.

2004 से पहले जन्मे लोगों के लिए जन्म प्रमाणपत्र, राशन कार्ड, ग्राम पंचायत रिकॉर्ड, नगर निकाय प्रमाणपत्र और पारिवारिक रिकॉर्ड अहम माने जाते हैं. स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट, CBSE या राज्य बोर्ड के प्रमाणपत्र भी महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं क्योंकि इनमें जन्मतिथि और माता-पिता का नाम दर्ज होता है.

पासपोर्ट को नागरिकता का सबसे मजबूत प्रमाण माना जाता है. नागरिकता अधिनियम की धारा 13 के तहत गृह मंत्रालय के पास “संदिग्ध नागरिकता” मामलों की जांच कर प्रमाणपत्र जारी करने की भी व्यवस्था है. यह प्रमाणपत्र गृह मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी स्तर के अधिकारी द्वारा जारी किया जाता है और इसे नागरिकता के प्रमाण के रूप में माना जाता है.

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क्या यह 'बैकडोर NRC' है?

SIR प्रक्रिया के दौरान याचिकाकर्ताओं और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि यह “पिछले दरवाजे से NRC” लागू करने की कोशिश है. अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा हटाए गए नामों को गृह मंत्रालय और सक्षम प्राधिकारी के पास भेजने के निर्देश के बाद यह बहस और तेज हो सकती है.

हालांकि अदालत ने स्पष्ट कहा है कि वोटर लिस्ट से नाम हटना किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने के बराबर नहीं है. नागरिकता की अंतिम जांच सक्षम प्राधिकारी ही करेगा.

फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल की भूमिका क्या होगी?

भारत में संदिग्ध अवैध प्रवासियों के मामलों की सुनवाई आमतौर पर फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में होती है. यदि ट्रिब्यूनल किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित कर देता है, तो वह देश में रहने के कानूनी अधिकार खो सकता है. सरकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा लाभों पर भी असर पड़ सकता है.

फिलहाल असम में NRC प्रक्रिया के दौरान बनाए गए 100 से ज्यादा फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल काम कर रहे हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर 2020 तक इनके पास 1.40 लाख से ज्यादा मामले लंबित थे. कई NGOs का दावा है कि 2025 तक भी 85 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं.

ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि लाखों लोगों की नागरिकता जांच के लिए गृह मंत्रालय क्या प्रक्रिया अपनाएगा और क्या नए फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल बनाए जाएंगे. आने वाले दिनों में देश की राजनीति और प्रशासन दोनों का फोकस इसी मुद्दे पर रहने वाला है.

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