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घरेलू कामगारों के शोषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ट्रेड यूनियनों और एजेंसियों पर उठाए सवाल

घरेलू कामगारों की दुर्दशा पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से नियम व न्यूनतम वेतन नीति बनाने को कहा है. कोर्ट ने एजेंसियों और ट्रेड यूनियनों पर शोषण बढ़ाने के आरोप लगाए.

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घरेलू कामगारों की स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट में  सुनवाई (File Photo: PTI)
घरेलू कामगारों की स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई (File Photo: PTI)

घरेलू कामगारों की दुर्दशा पर दाखिल जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से घेरलू कामगारों के हित में नियम बनाने और न्याय न्यूनतम वेतन तय करने की नीति बनाने और लागू करने की गुजारिश की है. कोर्ट ने इस सिलसिले में श्रमिक यूनियनों पर भी कटाक्ष करते हुए कहा कि उन झंडा यूनियनों की वजह से घरेलू कामगारों को मिलने वाले रोजगार पर असर होता है क्योंकि इन कामगारों को एजेंट के जरिए घरों में रखवाया जाता है. वो उनका जमकर शोषण करते हैं.

जनहित याचिका में कहा गया है कि नए श्रम कानूनों में घरेलू कामगारों को संरक्षण नहीं मिला है. याचिकाकर्ताओं की पैरवी करने वाले सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन ने कहा कि इस कोर्ट ने पहले भी घरेलू कामगारों के मुद्दे को चिन्हित किया है, लेकिन 1970 के दशक से अब तक कोई ठोस बदलाव नहीं हुआ.

कोर्ट का पिछला फैसला भी घरेलू कामगारों के संरक्षण हेतु दिए गए फैसलों और विधायी प्रयासों की श्रृंखला की अंतिम कड़ी मात्र साबित हुआ, बात उससे आगे नहीं बढ़ी.

'अगर हम न्यूनतम वेतन तय करते हैं...'

साल 2009 में श्रम मंत्रालय ने टास्क फोर्स बनाई थी, उस पर 15 राज्यों ने अधिसूचना भी जारी की थी. बाकी राज्यों ने तो वो भी नहीं किया. सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉय माल्य बागची की बेंच के समक्ष सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा, "हर परिवार इससे प्रभावित होगा. हालांकि, हमने विधायी क्षेत्र में प्रवेश न करने की कोशिश की है. अब इसे आप लोगों से बेहतर कौन जानता है. कभी-कभी सुधार लाने और आम जन के लाभ के लिए कुछ करने की कोशिश में अधिक नुकसान हो जाता है."

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उन्होंने आगे कहा कि अगर हम न्यूनतम वेतन तय करते हैं, तो मांग और आपूर्ति का सवाल खड़ा हो जाता है. बेरोज़गारों की उपलब्धता ज्यादा हो तो लोगों का अत्यधिक शोषण हो जाता है. न्यूनतम वेतन तय करने पर भी लोग उस वेतन पर काम पर रखने से मना कर देंगे.

इस पर वकील रामचंद्रन ने कहा कि 15 राज्यों ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन तय किया है. याचिकाकर्ता ट्रेड यूनियन अधिनियम के तहत पंजीकृत 10 श्रमिक संघ हैं. CJI ने कहा कि यूनियनों के कारण कितने उद्योग बंद हो गए हैं? मैंने इसे बचपन में देखा है. वे काम नहीं करना चाहते. ट्रेड यूनियन नेता बड़े पैमाने पर प्रतिगामी उद्योग नीति के लिए जिम्मेदार हैं. देश में औद्योगिक विकास को रोकने के लिए. 

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सुरक्षा पर क्या बोला कोर्ट?

राजू रामचंद्रन ने कहा, "हां, शोषण है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उद्योगों को ही बंद कर दिया जाए. लोगों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए. घरेलू कामगार समाज में सबसे ज्यादा शोषित वर्ग है."

जस्टिस बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा, "ऐसा नहीं है कि कोई सुरक्षा जाल नहीं है. आप समान कानूनी व्यवहार और ढांचे की मांग कर रहे हैं. घरेलू कामगारों को औद्योगिक श्रमिकों के समान संरक्षण और मूल्य मिलना चाहिए, लेकिन आपकी याचिका ही कहती है कि असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम उन्हें चिकित्सा बीमा आदि संरक्षण देता है. लेकिन सिर्फ इस वजह से कि कोई घरेलू कामगार है, उसे संरक्षण से वंचित नहीं किया जाना चाहिए."

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वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने दलील देते हुए कहा कि यह न्यूनतम वेतन के संदर्भ में है. अगर भुगतान नहीं किया गया तो कोर्ट ने इसे “बेगार” माना है. यह कम समावेशन यानी अंडर-इन्क्लूजन का नहीं, बल्कि जानबूझकर अनदेखी करने का सवाल है, जिससे अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है. 

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कोर्ट ने कहा कि संविधान की अनुसूची में जोड़ने या घटाने की ताकत सरकार को दी गई है. यह प्रशासनिक शक्ति है, विधायी नहीं. राजू रामचंद्रन ने कहा कि न्यायालय के पास यह कहने की शक्ति है कि न्यूनतम वेतन का भुगतान न होना उल्लंघन होगा, लेकिन सिर्फ इसकी घोषणा करना खोखलापन होगा. इसे लागू कैसे करेंगे? ये भी स्पष्ट होना चाहिए.

15 राज्यों ने परिभाषा में घरेलू कामगारों को शामिल किया है. अदालत कम से कम अन्य राज्यों से यह पूछ सकता है कि उन्होंने क्यों शामिल नहीं किया? जबकि केंद्र सरकार की टास्क फोर्स ने शामिल करने को कहा है. हम कोर्ट से कानून बनाने को बाध्य करने को नहीं कह रहे. सिर्फ पूछताछ की मांग है. पीड़ितों में करीब 8 करोड़ लोग हैं. इनमें ज्यादातर महिलाएं हैं.

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चीफ जस्टिस ने कहा, "अनुच्छेद 21, 23, 14, 15, 16 के उल्लंघन का तर्क दिलचस्प तो है लेकिन इसके नतीजों पर भी विचार करें. ये ट्रेड यूनियन नेता लोगों को असहाय छोड़ देंगे. लोग कामगार रखना बंद कर देंगे. महानगरों में सेवा प्रदाता एजेंसियां हावी हो गई हैं. ड्राइवर या घरेलू सहायक या सहायिका सीधे नहीं रखते. आप एजेंसियों के जरिए लेते हैं. वो एजेंसियां इन कामगारों का शोषण करती हैं.

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सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत क्यों?

कोर्ट ने कहा कि हमने देखा है कि ये एजेंसियां कैसे शोषण करती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने एक स्पेशल कैटेगरी के कर्मचारियों की भर्ती के लिए एक एजेंसी हायर की. उन्होंने हमसे 54,000 लिए और उस गरीब लड़की को केवल 19,000 रुपए दिए. घरेलू मदद के लिए सीधे नियुक्ति होनी चाहिए. उन्हें परिवार का हिस्सा बनाकर रखा जाना चाहिए. एजेंसियों के जरिए रखने पर कोई सहायता या बंधन नहीं होता. ये एजेंसियां शोषण करती हैं. अगर हम न्यूनतम वेतन तय करेंगे, तो यही ट्रेड यूनियन नेता सुनिश्चित करेंगे कि हर घर मुकदमेबाज़ी में घसीटा जाए. अगर राज्यों ने कानून पास कर दिए हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत क्यों है?

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