सोनम वांगचुक की हिरासत को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए दस्तावेजी सबूतों पर असंतोष जताया है. जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने सरकार से वांगचुक के बयानों का वास्तविक और सटीक ट्रांसक्रिप्ट मांगा है.
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत में दलील दी कि सरकार ने वांगचुक के नाम पर ऐसे शब्द जोड़े हैं जो उन्होंने कभी कहे ही नहीं. इस पर पीठ ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज से कहा, "आपका अनुवाद 7 से 8 मिनट का है जबकि मूल भाषण केवल 3 मिनट का है. हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के युग में हैं, जहां अनुवाद की सटीकता कम से कम 98 प्रतिशत होनी चाहिए. हमें वास्तविक भाषण का सही अनुवाद चाहिए."
'जो अस्तित्व में नहीं, उस पर हिरासत क्यों?'
कपिल सिब्बल ने सरकार के दावों को चुनौती देते हुए पूछा कि नेपाल का संदर्भ लेकर युवाओं को उकसाने वाली लाइनें कहां से आईं? उन्होंने कहा कि यह एक अजीब हिरासत आदेश है जो ऐसी बातों पर आधारित है जो कभी कही ही नहीं गईं.
सरकार की तरफ से कोर्ट को बताया गया उन्होंने वांगचुक की 24 बार मेडिकल जांच की है और वह पूरी तरह स्वस्थ हैं. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेंच को बताया कि जिन आधारों पर वांगचुक का डिटेंशन ऑर्डर पास किया गया था, वे अभी भी मौजूद हैं और उन्हें हेल्थ के आधार पर रिहा करना मुमकिन नहीं होगा.
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क्या है पूरा मामला?
सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंग्मो ने नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत उनकी हिरासत को 'अवैध' घोषित करने के लिए 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' याचिका दायर की है जिसमें उनकी डिटेंशन को गैर-कानूनी घोषित करने की मांग की गई है. सरकार का तर्क है कि लेह में हुई हिंसा और सुरक्षा कारणों से वांगचुक की हिरासत जरूरी है, जबकि वांगचुक ने खुद हिंसा की निंदा की थी. इस मामले की अगली सुनवाई अब गुरुवार को होगी.
NSA केंद्र और राज्यों को लोगों को डिटेन करने का अधिकार देता है ताकि उन्हें "भारत की रक्षा के लिए नुकसानदायक" तरीके से काम करने से रोका जा सके. डिटेंशन का ज़्यादा से अधिक से अधिक समय 12 महीने है, हालांकि इसे पहले भी रद्द किया जा सकता है.