बीते कुछ समय से ऐसी चर्चाएं चल रही हैं कि सांसद शशि थरूर का कांग्रेस नेतृत्व के साथ कुछ मतभेद चल रहा है. केरल लिटरेचर फेस्टिवल में अब उन्होंने इन चर्चाओं पर विराम लगाते हुए सभी बातों को दुनिया के सामने रखा है. अपना पक्ष साफ़ करते हुए उन्होंने बताया कि कभी भी संसद में उन्होंने पार्टी की आधिकारिक लाइन का उल्लंघन नहीं किया है.
शशि थरूर ने एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि मैं यहां संविधान पर चर्चा करने आया था, राजनीति पर नहीं. लेकिन मैं यह बहुत साफ़ शब्दों में कहना चाहता हूं कि अगर आप मेरे सार्वजनिक बयानों और रिकॉर्ड को देखें, तो मैंने कभी भी संसद में अपनी पार्टी के किसी भी आधिकारिक रुख का उल्लंघन नहीं किया है.
सिर्फ एक विषय ऐसा रहा है, जिस पर सिद्धांत के आधार पर पब्लिक स्पेस में मतभेद सामने आया और वह था ऑपरेशन सिंदूर. इस पर मेरा जो स्टैंड था वो बेहद साफ़ था. मैं सभी को बता देना चाहता हूं कि मैं बिनी किसी खेद के आज भी अपने बयान पर क़ायम हूं.
पहलगाम की दुखद घटना के बाद, मैंने एक पर्यवेक्षक और टिप्पणीकार के रूप में अपनी बात रखी. जैसा कि हम जानते हैं, संसद में अलग-अलग क्षेत्र से आए लोग होते हैं - वकील, डॉक्टर, कारोबारी और लेखक. मैं खुद एक लेखक हूं. अपने उस हैसियत से मैंने एक अखबार में “Hit Hard, Hit Smart” शीर्षक से एक कॉलम लिखा था.
उस लेख में मैंने साफ़ तौर से कहा था कि इस हमले को सज़ा से मुक्त नहीं छोड़ा जा सकता. इसका जवाब ज़रूरी और निर्णायक होना चाहिए, यानी प्रत्यक्ष कार्रवाई. हमें स्पष्ट रूप से आतंकवादियों पर जवाबी कार्रवाई करनी होगी.
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हालांकि, मैंने यह भी कहा कि भारत विकास की राह पर अग्रसर है और हम पाकिस्तान के साथ किसी लंबी लड़ाई में उलझना नहीं चाहते. भारत की अर्थव्यवस्था निवेश पर निर्भर है और युद्धग्रस्त क्षेत्रों में निवेशक नहीं आते. इसलिए, हमें ऐसा कदम उठाना चाहिए जिससे भारत को युद्ध क्षेत्र न बनना पड़े.
मैंने सुझाव दिया था कि केवल आतंकवादी ठिकानों को ही निशाना बनाया जाए, सीमित और नियंत्रित मात्रा में, ताकि एक साफ संदेश जाए कि भारत आतंकवाद पर कार्रवाई कर रहा है, पाकिस्तान पर नहीं. यह साफ करना आवश्यक है कि यह कदम पाकिस्तान की आतंकवाद की रोकथाम में असमर्थता और अनिच्छा के कारण उठाया गया है. साथ ही, मैंने कहा था कि पाकिस्तान को किसी तरह का उकसावा या तनाव बढ़ाने का मौका नहीं देना चाहिए.
यह सब मैंने साफ तौर पर लिखा था और आज भी यह सार्वजनिक रिकॉर्ड में मौजूद है. लगभग दस दिन बाद भारत सरकार ने ठीक वही कदम उठाए, जिनकी मैंने सिफारिश की थी. ऐसे में आप मुझसे इस कार्रवाई की आलोचना की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? मैंने ऑपरेशन सिंदूर का न केवल समर्थन किया, बल्कि विदेशी यात्रा के दौरान भी सरकार के इस फैसले के पीछे खड़ा रहा.
आख़िर में, मैं दोहराना चाहता हूं कि जब भारत के राष्ट्रीय हित दांव पर हों, तो राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर हमारा फोकस केवल देश पर होना चाहिए. जैसा जवाहरलाल नेहरू ने पूछा था, “अगर भारत मरता है, तो कौन जिएगा?” यही मेरा संदेश है.