डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी का कई देशों ने स्वागत किया, लेकिन अब वे आर्थिक अस्थिरता के लिए तैयार हो रहे हैं. भारत के लिए सबसे बड़ा मुद्दा टैरिफ (आयातित वस्तुओं पर कर) है. ट्रंप एक नई "पारस्परिक" टैरिफ नीति लागू करना चाहते हैं, जिसमें उन देशों को निशाना बनाया जाएगा, जो अमेरिकी निर्यात पर हाई टैरिफ लगाते हैं. अरबों डॉलर के व्यापारिक हित दांव पर हैं, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के निर्यात को बनाए रखने और व्यापार युद्ध को टालने के लिए वाशिंगटन रवाना हुए हैं.
भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला?
डोनाल्ड ट्रंप ने एक आदेश पर हस्ताक्षर करने की योजना बनाई है, जिसके तहत अमेरिकी टैरिफ को दूसरे देशों के करों के बराबर किया जाएगा. सोमवार को उन्होंने कहा, "अब वक्त आ गया है कि हम भी बराबरी करें." इस नीति का असर उन देशों पर ज्यादा होगा, जो अमेरिकी उत्पादों पर अधिक शुल्क लगाते हैं, जिनमें भारत भी शामिल है.

ट्रंप का पहला कार्यकाल और भारत
अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने भारत का विशेष व्यापारिक साझेदार (GSP) दर्जा समाप्त कर दिया और स्टील व एल्युमिनियम पर टैरिफ बढ़ा दिया था. उन्होंने वैश्विक स्तर पर स्टील पर 25% और एल्युमिनियम पर 10% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव दिया था. इससे भारत के लगभग 2 अरब डॉलर के स्टील निर्यात और 270 मिलियन डॉलर के एल्युमिनियम निर्यात पर असर पड़ा था. अब कार, केमिकल और अन्य वस्तुओं पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने पर चर्चा हो रही है.
भारत पहले ही Harley-Davidson मोटरसाइकिलों पर आयात शुल्क कम कर चुका है, जो ट्रंप की एक पुरानी मांग थी. इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल उपकरण और केमिकल्स पर शुल्क में और कटौती पर विचार किया जा रहा है. हालांकि, टैरिफ में कटौती से भारत की मंदी की ओर बढ़ती अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है. ऐसे में मोदी को अमेरिकी व्यापार संबंधों को बनाए रखते हुए घरेलू उद्योगों की रक्षा करने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा.

क्या व्यापार युद्ध की आहट?
2024 में अमेरिका ने अधिकांश वस्तुएं मेक्सिको, चीन और कनाडा से आयात कीं, जिनका कुल मूल्य 400 अरब डॉलर से अधिक था. अमेरिका अब भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टील आयातक है और इसके लिए मुख्य रूप से कनाडा, ब्राजील और मेक्सिको पर निर्भर है.
यूरोप, जो अमेरिका का प्रमुख सहयोगी है, पहले ही संकेत दे चुका है कि अगर नए टैरिफ लागू होते हैं तो वह भी जवाबी कदम उठाएगा. ट्रंप की वापसी से वैश्विक समीकरण भी बदल रहे हैं. 11 यूरोपीय देशों, यूक्रेन, स्विट्जरलैंड और ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि अब अमेरिका को एक "जरूरी साझेदार" के रूप में देखा जा रहा है, न कि एक घनिष्ठ सहयोगी के रूप में.
ट्रंप के टैरिफ बढ़ाने की वजह क्या है?
2017 से अमेरिका का व्यापार घाटा 500 अरब डॉलर से अधिक रहा है, यानी वह जितना निर्यात करता है, उससे ज्यादा आयात करता है. ट्रंप इसे अपनी आक्रामक व्यापार नीति को सही ठहराने का आधार मानते हैं. साथ ही, 2017 में लागू किया गया कर सुधार कानून इस साल समाप्त हो रहा है. अगर नया कानून नहीं लाया गया, तो अमेरिकी टैक्स दरें बढ़ जाएंगी, जिससे अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा.
भारत के लिए आगे क्या?
मोदी की यह यात्रा रिश्तों को सुधार सकती है, लेकिन कोई स्थायी समाधान मिलना अभी भी अनिश्चित है. अरबों डॉलर के व्यापार पर संकट मंडरा रहा है और आने वाले महीने भारत-अमेरिका के रिश्तों की सबसे बड़ी परीक्षा साबित हो सकते हैं.
खास तथ्य
2024 में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था, लेकिन भारत अमेरिका के लिए दसवें स्थान पर था.
2020 में 24 अरब डॉलर का व्यापार घाटा 2024 तक बढ़कर 46 अरब डॉलर हो गया.
हाल ही में भारत ने कुछ वस्तुओं पर टैरिफ कम किए, लेकिन ट्रंप प्रशासन टैरिफ को बराबर करने पर जोर दे रहा है.
भारत अमेरिकी आपूर्तिकर्ताओं से अधिक लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) खरीदने पर बातचीत कर रहा है.
भारत का औसत टैरिफ 1990 में 80% था, जो अब घटकर 13-14% पर आ गया है.