असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के 'मिया मुस्लिम' समुदाय को लेकर दिए गए बयान के एक दिन बाद राज्य की राजनीति में जबरदस्त हलचल मच गई. विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार खो दिया है.
जहां कुछ मुस्लिम नेताओं ने कहा कि हिमंत का हमला सिर्फ मिया मुसलमानों पर नहीं, बल्कि गरीबों पर था, वहीं एक विधायक ने ऐसा बयान दिया जिसने सबका ध्यान खींचा. उन्होंने कहा कि अगर मिया समुदाय शिक्षा और मेहनत पर ध्यान दे, तो अगले 15 साल में वह 'सिर्फ असम नहीं, पूरी दुनिया पर राज कर सकता है.'
गौरतलब है कि असम में 'मिया' शब्द बंगाली भाषी मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. पहले यह एक गाली के तौर पर बोला जाता था, लेकिन अब इस समुदाय ने खुद इस शब्द को अपना लिया है. बीजेपी और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा असम के मुस्लिम समुदायों के बीच साफ फर्क करते रहे हैं. जहां वे 'स्थानीय/स्वदेशी मुसलमानों' को साधने की कोशिश करते हैं, वहीं बंगाली भाषी मिया समुदाय पर लगातार हमलावर रहे हैं.
'रिक्शावाला 5 रुपये मांगे, तो उसे 4 रुपये दो'
इसी हफ्ते हिमंत ने एक बयान में कहा था कि जहां भी हो सके, मिया लोगों को परेशान करो. छोटी-छोटी बातें भी, जैसे अगर कोई मिया रिक्शावाला 5 रुपये मांगे, तो उसे 4 रुपये दो. जब तक उन्हें मुश्किल नहीं होगी, वे असम नहीं छोड़ेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि असम में होने वाले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान 'चार से पांच लाख मिया वोटरों' के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाएंगे.
असम में विधानसभा चुनाव 2026 की शुरुआत में होने हैं. हिमंत ने अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ के लिए पिछली कांग्रेस सरकारों को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस मुझे जितना चाहे गाली दे. मेरा काम मिया लोगों को तकलीफ में डालना है. मुख्यमंत्री के ये बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गए और इसके बाद जबरदस्त विरोध शुरू हो गया.
विपक्ष का पलटवार
AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने कहा कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. मैं हाथ जोड़कर उनसे कहता हूं- हिमंत बिस्वा सरमा, अपने शब्द वापस लीजिए, नहीं तो इस बार असम के मिया लोग आपकी नाव डुबो देंगे. उन्होंने कहा कि मिया लोग किसी से डरते नहीं हैं. सत्ता के लिए आप एक पूरे समुदाय का अपमान कर रहे हैं. ऐसा मत कीजिए. अजमल ने यह भी दावा किया कि आने वाले चुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ेगा. अगर हिमंत इस बार चुनाव लड़ते हैं, तो बीजेपी हार जाएगी. लिखकर रख लीजिए.
कांग्रेस ने बताया 'गरीब विरोधी' बयान
असम कांग्रेस के प्रवक्ता जेहेरुल इस्लाम ने कहा कि रिक्शा खींचने वाले से 5 की जगह 4 रुपये देने की बात कर मुख्यमंत्री ने किसी समुदाय का नहीं, बल्कि गरीबों का अपमान किया है. उन्होंने समाज को सबसे गरीब लोगों के साथ अन्याय करने को कहा है. उन्होंने कहा कि मेहनतकश लोगों का शोषण सामान्य बनाना नैतिक रूप से गलत है.
राजनीति से ऊपर उठो- शेरमन अली
2011 से बाघबर सीट के विधायक शेरमन अली अहमद ने मिया समुदाय से राजनीति से आगे देखने की अपील की. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जो चाहे कहें. उनकी बातों को नजरअंदाज करो. मिया लोगों को अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए और अपना काम करना चाहिए. शेरमन अली ने कहा कि मिया समुदाय को संकल्प लेना चाहिए कि अगले 15 साल में हर गांव से 100 IAS अफसर, 100 जज, 1,000 इंजीनियर, डॉक्टर और वैज्ञानिक निकलेंगे. हर विधानसभा से 10 नोबेल पुरस्कार जीतेंगे. तब मिया सिर्फ असम नहीं, पूरी दुनिया पर राज करेंगे. उन्होंने कहा कि हम इस देश के नागरिक हैं. हमारे पिता और दादा सौ साल पहले असम आए थे.
वोटर लिस्ट और SIR पर सवाल
AIUDF के नेता रफीकुल इस्लाम ने कहा कि हिमंत बिस्वा सरमा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का नैतिक अधिकार खो चुके हैं. उन्होंने कहा कि असमिया लोग रिक्शावाले को 5 की जगह 7 रुपये देते हैं. आप मुख्यमंत्री हैं, नागपुर से पढ़े हैं, लेकिन समाज को ऐसा अनैतिक सबक मत दीजिए.
रफीकुल ने आरोप लगाया कि SIR के नाम पर मुस्लिम नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है. बीजेपी कार्यकर्ता फर्जी आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं, लाखों मुसलमानों को सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है. उन्होंने गुवाहाटी हाईकोर्ट से इस मामले में स्वतः संज्ञान लेने की मांग की.
सुप्रीम कोर्ट का हवाला
विवाद बढ़ने के बाद हिमंत बिस्वा सरमा ने सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी का हवाला देते हुए अपने बयान को सही ठहराने की कोशिश की. उन्होंने X (ट्विटर) पर लिखा कि असम में चुपचाप हो रहा जनसांख्यिकीय बदलाव राज्य के भू-राजनीतिक रूप से अहम इलाकों को खतरे में डाल सकता है. अवैध घुसपैठ से ये जिले मुस्लिम बहुल बन रहे हैं और आगे चलकर बांग्लादेश में विलय की मांग उठ सकती है.
असम के 35 में से 11 जिले, खासतौर पर बांग्लादेश सीमा से सटे इलाके, मुस्लिम बहुल बताए जाते हैं. असम में बांग्लादेश से अवैध प्रवासन दशकों से एक बड़ा मुद्दा रहा है. पहले राजनीति भाषा के आधार पर बंटी थी, लेकिन पिछले एक दशक में धार्मिक पहचान ज्यादा हावी हुई है. हिमंत लगातार बांग्लादेशी घुसपैठ की बात करते रहे हैं और असम समेत कई सीमावर्ती राज्यों में कथित अवैध प्रवासियों को वापस भेजने की कोशिशें भी हुई हैं.
दिसंबर में हिमंत ने कहा था कि असम की 40 फीसदी आबादी बांग्लादेशी मूल की है. अगर यह 10 फीसदी और बढ़ी, तो हम अपने आप बांग्लादेश का हिस्सा बन जाएंगे. अवैध प्रवासन असम की एक हकीकत है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके नाम पर पूरे एक समुदाय को अवैध बताना सही है. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक बयानबाजी और तीखी होती जा रही है.