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जस्टिस यशवंत वर्मा केस: महाभियोग प्रस्ताव पर SC में बड़ी बहस, क्या है पूरा कानूनी पेंच?

जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने की संसदीय कार्यवाही के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. कोर्ट इस अहम कानूनी सवाल को सुलझा रहा है कि संसद में प्रस्ताव लाना ज्यादा प्राथमिकता वाला काम है या सदन में उसे चर्चा के लिए स्वीकार करना. लोकसभा महासचिव ने इस मामले में हलफनामा दाखिल कर जस्टिस वर्मा की याचिका को गलत बताया है.

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जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई. (PTI Photo)
जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई. (PTI Photo)

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई.

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने अहम सवाल उठाया कि क्या राज्यसभा द्वारा प्रस्ताव खारिज होने पर लोकसभा अकेले महाभियोग प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है? साथ ही कोर्ट ने लोकसभा महासचिव के जवाब पर भी चर्चा की. कोर्ट अब ये तय करेगा कि संसद में प्रस्ताव लाने को प्राथमिकता दी जाए या उसके सदन में स्वीकार होने को.

जस्टिस वर्मा की ओर से कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत में जजेज इंक्वायरी एक्ट के प्रावधानों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि लोकसभा और राज्यसभा में प्रस्ताव एक साथ ही लाए गए थे. उनके अनुसार, कानून की भाषा प्रस्ताव पेश करने पर जोर देती है, उसे चर्चा के लिए स्वीकार करने की अनिवार्यता पर नहीं.

रोहतगी का तर्क है कि जब दोनों सदनों में प्रस्ताव पेश हो जाए, तो साझा समिति बनाने की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि सांसदों के हस्ताक्षर के साथ प्रस्ताव मिलने पर जांच शुरू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता.

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लोकसभा का जवाब

लोकसभा महासचिव ने कोर्ट में हलफनामा दायर कर जस्टिस वर्मा की याचिका का विरोध किया है. सचिव ने कहा कि समिति गठित करने का अध्यक्ष का फैसला संसद की कार्यवाही का हिस्सा है और इसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती.

क्या कहता है कानून

हलफनामे के मुताबिक, जजेज इंक्वायरी एक्ट की धारा 3 तभी लागू होती है जब दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाए. सचिवालय ने उन आरोपों को भी खारिज कर दिया कि अध्यक्ष किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित थे, जवाब में कहा गया है कि याचिका गलत तथ्यों पर आधारित है.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान ये भी बात सामने आई कि राज्यसभा के 62 सांसदों का प्रस्ताव कभी स्वीकार ही नहीं हुआ. उपसभापति ने 11 अगस्त 2025 को एक लिखित आदेश के जरिए इसे खारिज कर दिया था, जिससे केवल लोकसभा का प्रस्ताव ही वैध रह गया.

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गौर किया कि अगर राज्यसभा में प्रस्ताव स्वीकार हो जाता, तो जस्टिस वर्मा को संयुक्त समिति का लाभ मिलता. अभी वे इस संवैधानिक लाभ से वंचित हैं, क्योंकि राज्यसभा में प्रस्ताव तकनीकी तौर पर रिजेक्ट हो गया है.

सॉलिसिटर जनरल का तर्क

उधर, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि संसद में कार्यों को करने का एक निश्चित अनुक्रम होता है. उन्होंने कहा कि प्रस्ताव को पेश करना, उसे स्वीकार करना और फिर उसे अपनाना, ये तीनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं.

मेहता ने बताया कि डिप्टी चेयरमैन के आदेशों का सीधा अर्थ था कि उन्हें प्रस्ताव प्राप्त हुआ है, जिसकी जांच करनी होगी. वहीं, मुकुल रोहतगी ने इस बात से असहमति जताते हुए कहा कि प्रस्ताव पेश करने का मतलब ही उसे कार्यवाही का हिस्सा बनाना है.

कल फिर होगी सुनवाई

जस्टिस यशवंत वर्मा का ये मामला अब एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मोड़ पर पहुंच गया है. गुरुवार को होने वाली सुनवाई में कोर्ट अब ये तय कर सकता है कि क्या संसद की आंतरिक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश है.

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