एक इंटरनेशनल कोर्ट ने शुक्रवार को सिंधु नदी के पानी के मामले में एक और फैसला सुनाया. इस फैसले में यह तय करने की कोशिश की गई कि भारत अपने बांधों में कितना पानी रोक सकता है. लेकिन भारत ने इस कोर्ट को और इसके फैसले को सीधे ठुकरा दिया. विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह कोर्ट ही गैरकानूनी है, इसलिए इसका कोई भी फैसला हमें मंजूर नहीं.
1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक बड़ा समझौता हुआ था जिसे 'सिंधु जल संधि' कहते हैं. इसमें यह तय हुआ था कि सिंधु नदी और उससे जुड़ी नदियों का पानी दोनों देश कैसे बांटेंगे. तीन नदियां (रावी, ब्यास, सतलज) भारत को मिलीं और तीन नदियां (सिंधु, झेलम, चिनाब) पाकिस्तान को. इस समझौते में वर्ल्ड बैंक भी गवाह के तौर पर शामिल था. लेकिन, पुलवामा हमले के बाद ही भारत सरकार ने इस संधि पर विराम लगा दिया था. इस फैसले से पाकिस्तान में हाहाकार मच गया.
भारत ने कश्मीर में दो बड़े बांध बनाने शुरू किए. एक किशनगंगा (झेलम नदी पर) और दूसरा रातले (चिनाब नदी पर). पाकिस्तान ने इन दोनों बांधों के डिजाइन पर आपत्ति जताई और कहा कि ये संधि के नियमों के खिलाफ हैं.
पाकिस्तान ने क्या किया?
पाकिस्तान ने 2016 में वर्ल्ड बैंक के पास जाकर मांग की कि एक आर्बिट्रेशन कोर्ट (मध्यस्थता अदालत) बनाई जाए. भारत चाहता था कि यह मामला एक 'न्यूट्रल एक्सपर्ट' के जरिए सुलझाया जाए, जैसा कि संधि में लिखा था. लेकिन 2022 में वर्ल्ड बैंक ने दोनों, यानी न्यूट्रल एक्सपर्ट भी नियुक्त किया और आर्बिट्रेशन कोर्ट भी बना दी.
भारत का रुख क्या रहा?
भारत ने शुरू से कहा कि यह आर्बिट्रेशन कोर्ट गैरकानूनी तरीके से बनाई गई है. मंत्रालय ने कहा कि इस कोर्ट का बनाया जाना ही संधि का उल्लंघन है, इसलिए इसकी किसी भी कार्यवाही या फैसले की कोई कानूनी हैसियत नहीं है. भारत ने इस कोर्ट की किसी भी बैठक में हिस्सा नहीं लिया.
पहलगाम हमले के बाद बड़ा कदम
अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को रोक दिया. यानि भारत ने कहा कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद बंद नहीं करता, यह संधि अभी के लिए ठंडे बस्ते में है. पाकिस्तान ने इसे 'युद्ध जैसा कदम' बताया.
इसके बाद कोर्ट के एक के बाद एक फैसले
इस साल पहले भी इस कोर्ट ने कई फैसले सुनाए थे, जिनमें कहा गया कि भारत को पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के लिए बहने देना होगा, बिजली बनाने की कुछ छूट के साथ. कोर्ट के फैसले दोनों देशों पर बाध्यकारी हैं और आगे की किसी भी अदालत पर भी लागू होंगे. भारत ने वो सब फैसले भी ठुकरा दिए.
15 मई का नया फैसला और भारत की प्रतिक्रिया
15 मई को इस कोर्ट ने एक और फैसला सुनाया, जिसमें यह तय करने की कोशिश की गई कि भारत अपने बांधों में अधिकतम कितना पानी रोक सकता है.
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत इस फैसले को साफ तौर पर ठुकराता है, जैसे पहले के सभी फैसले ठुकराए गए. भारत ने कभी इस कोर्ट को कानूनी नहीं माना. इसका कोई भी फैसला, कार्यवाही या निर्णय हमारे लिए शून्य और अमान्य है. सिंधु जल संधि को रोक में रखने का भारत का फैसला अभी भी लागू है.