scorecardresearch
 

क्या जनरल नरवणे ने सही काम किया?

ऑपरेशन पराक्रम से लेकर लद्दाख संकट तक, भारत के राजनीतिक नेतृत्व और सेना के बीच फैसलों की भूमिका पर बहस जारी है. संसद हमले के बाद सीमा पर तैनाती हो या एलएसी पर चीन से टकराव, कई अहम मौकों पर संयम और रणनीतिक निर्णय लिए गए, जिन्हें विशेषज्ञ अलग-अलग नजरिए से देखते हैं.

Advertisement
X
पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवणे. (File Photo)
पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवणे. (File Photo)

11 दिसंबर 2001 को पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा भारतीय संसद पर हुए हमले के चार दिन बाद भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने ऑपरेशन पराक्रम शुरू किया था. यह शांति काल में पाकिस्तान सीमा पर भारतीय सेना की सबसे बड़ी तैनाती थी. तैनाती के दौरान एक बैठक में सेना प्रमुख जनरल एस पद्मनाभन ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से पूछा कि उनके आदेश क्या हैं. बातचीत से जुड़े एक अधिकारी के मुताबिक जवाब मिला, "आप चलिए, हम बताएंगे."

लेकिन पाकिस्तान को सीमा पार आतंकवाद के लिए सजा देने का आदेश कभी नहीं आया. इसके पीछे कई कारण थे, जैसे अमेरिका का दबाव और भारत-पाक परमाणु युद्ध का खतरा. सेना लगभग 10 महीने तक सीमा पर तैनात रही और बाद में उसे वापस बुला लिया गया.

अब 2020 के लद्दाख की बात करें तो पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने अपनी अप्रकाशित किताब में लिखा कि उन्हें एलएसी पर बेहद कठिन स्थिति का सामना करना पड़ा. अगस्त 2020 में जब चीनी टैंक भारतीय पोस्ट की ओर बढ़ रहे थे, उन्होंने आदेश का इंतजार किया. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, "जो उचित समझो, वो करो."

यह भी पढ़ें: नरवणे की किताब ‘Four Stars of Destiny’ क्यों अप्रकाशित रह गई, राहुल गांधी की सुई उसी पर क्यों अटकी?

भारतीय सेना ने पैंगोंग त्सो झील के दक्षिण में कैलाश रेंज पर कब्जा कर चीन को चौंका दिया था, जिससे नाराज होकर पीएलए ने टैंक आगे बढ़ाए. यह बेहद तनावपूर्ण पल था क्योंकि पहली बार भारी तोपखाने के इस्तेमाल पर विचार हुआ. छह बोफोर्स तोपों की एक साथ फायरिंग बड़े इलाके को तबाह कर टैंकों को रोक सकती थी.

Advertisement

विपक्ष ने सरकार पर हिचकिचाने का आरोप लगाया लेकिन पिछले 78 वर्षों का अनुभव बताता है कि भारत का राजनीतिक नेतृत्व आमतौर पर सिर्फ दिशा देता है और युद्ध संचालन सेना पर छोड़ देता है.

1947 में नेहरू ने कश्मीर में सेना भेजी, लेकिन 1949 में युद्धविराम मान लिया जिससे कुछ इलाके पाकिस्तान के पास रहे. 1971 में इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश मुक्ति का आदेश दिया और युद्ध संचालन सेना पर छोड़ा. 1999 में वाजपेयी ने कारगिल में कार्रवाई की अनुमति दी, लेकिन एलओसी पार न करने का निर्देश दिया. 1962 का चीन युद्ध एक अपवाद था, जहां राजनीतिक दखल के कारण गंभीर गलतियां हुईं और भारत को नुकसान उठाना पड़ा.

2020 में भारत ने लद्दाख में 50 हजार से ज्यादा सैनिक, टैंक और विमान तैनात किए. इस बार नेतृत्व ने सैन्य कमांडरों पर भरोसा किया. विशेषज्ञों का कहना है कि नेता रणनीति की रूपरेखा देते हैं और विकल्प सेना तय करती है.

कभी-कभी फील्ड कमांडर भी आदेशों से अलग फैसला लेते हैं. 1971 में लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह ने मेघना नदी पार कर सैनिकों को आगे बढ़ाया, जिससे ढाका की ओर तेजी से बढ़त मिली.

यह भी पढ़ें: 'एक इंच जमीन भी नहीं गई...', राहुल गांधी के बयान के बाद BJP ने जारी किया पूर्व आर्मी चीफ नरवणे का पुराना वीडियो

Advertisement

अगर नरवणे ने हमला कर दिया होता, तो चीन जवाबी कार्रवाई कर सकता था और युद्ध बढ़ सकता था. लेकिन उन्होंने आकलन किया कि टैंक डराने के लिए आए थे. उन्होंने भारतीय टैंक आगे बढ़ाकर ताकत दिखाई और चीनी टैंक रुक गए. उन्होंने लिखा कि यह मनोवैज्ञानिक मुकाबला था और चीन पीछे हट गया.

ऑपरेशन पराक्रम के समय भी राजनीतिक नेतृत्व ने कई सैन्य विकल्पों को परमाणु युद्ध के डर से ठुकरा दिया, जिसमें हवाई हमले और नौसेना कार्रवाई शामिल थी.

विशेषज्ञ मानते हैं कि नरवणे का राजनीतिक सलाह लेना सही था, क्योंकि भारत-चीन समझौते बल प्रयोग को रोकते हैं. भारतीय सेना ने सावधानी बरती. भारत पहले से टी-90 टैंक तैनात कर चुका था और उनकी रणनीति तैयार थी. इससे चीन को पता चला कि भारत मजबूत जवाब दे सकता है. आखिरकार अक्टूबर 2024 में तनाव कम हुआ. विशेषज्ञों के अनुसार लद्दाख में सभी ने सही फैसले लिए, लेकिन फिर भी इस पूरे घटनाक्रम को अक्सर सफलता के बजाय असफलता की तरह पेश किया जाता है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement