साल 2020-21 के दौरान हुए किसान आंदोलन 1.0 ने नई दिल्ली को हिलाकर रख दिया था. इस आंदोलन को आर्थिक सुधार एजेंडे के खिलाफ भारत का पहला और सबसे लंबा संघर्ष कहा जा सकता है, जिसमें 700 से ज्यादा किसानों की जान गई थी. 378 दिनों के लंबे किसान आंदोलन का सामना करने के बाद भी, राज्य और केंद्र सरकारों ने असंतोष की आग को नजरअंदाज कर दिया है. सरकार ने किसानों को आश्वासन दिया था कि उनकी मांगो को पूरा किया जाएगा, इसके बाद दिसंबर, 2021 में किसानों ने अपने विरोध प्रदर्शन को खत्म कर दिया था. एमएसपी व्यवस्था को कानूनी ढांचा देने में देरी करने की वजह से किसान आंदोलन 2.0 शुरू हो गया है. यह आंदोलन संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) ने 'दिल्ली चलो मार्च' के नाम से शुरू किया है.
किसान आंदोलन 2.0 में ताकत और तेजी की कमी
दूसरी बार शुरू हुए किसान आंदोलन में पहचान की राजनीति के पहलू सामने आ रहे हैं क्योंकि जगजीत सिंह डल्लेवाल और सरवन सिंह पंढेर के नेतृत्व में केवल दो प्रमुख किसान संगठन इसका नेतृत्व कर रहे हैं. इस आंदोलन में ताकत और तीव्रता दोनों का अभाव है क्योंकि ज्यादातर किसान यूनियनों ने खुद को इससे अलग कर लिया है और एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते नजर आ रहे हैं. बकलबीर सिंह राजेवाल, राकेश टिकैत, गुरनाम सिंह चादुनी और जोगिंदर सिंह उगराहां जैसे बड़े नेताओं ने किसानों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए अलग-अलग विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है. वहीं दूसरी तरफ ये लोग 'दिल्ली चलो मार्च' में शामिल होने से कतरा रहे हैं. हरियाणा पुलिस ने इस आंदोलन को दो इंटर-स्टेट बॉर्डर्स पर रोक दिया है.
दिलचस्प बात यह है कि किसान आंदोलन 1.0 को छात्रों, कर्मचारियों, राजनेताओं, वामपंथी और दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं के अलावा गायकों और फिल्म डायरेक्टर्स से लेकर समाज के लगभग सभी वर्गों का समर्थन मिला था. लेकिन इस बार नए सिरे से शुरू हुए आंदोलन को किसान यूनियनों का भी खुला समर्थन नहीं मिल रहा है.
किसान आंदोलन ने पंजाब की राजनीति को कैसे आकार दिया?
पंजाब ने 2022 में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान और उसके बाद किसान आंदोलन के दुष्प्रभावों का प्रयोग करना शुरू कर दिया. किसान आंदोलन को बढ़ावा देने के बावजूद, सत्तारूढ़ दल कांग्रेस का दायरा घट गया और वह 2017 में 38.64 फीसदी वोट के मुकाबले केवल 23.1 प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाई. इस दौरान सबसे बुरा असर शिरोमणि अकाली दल पर हुआ, जिसने विवादास्पद कृषि कानूनों के मुद्दे पर बीजेपी से 24 साल पुराना नाता तोड़ लिया. पार्टी का वोटशेयर 2017 में 30.6 फीसदी था, जो 2022 में घटकर 18.38 फीसदी हो गया. AAP ने सूबे में फ्री बिजली देने के अलावा किसानों को एमएसपी सहित कई वादे किए और 42.01 फीसदी वोट हासिल किए.
विधानसभा चुनावों के दौरान बीजेपी के खिलाफ गुस्सा साफ तौर पर नजर आया था, जब पार्टी को ग्रामीण इलाकों में किसानों के विरोध का सामना करना पड़ा था. कैप्टन अमरिन्दर सिंह के नेतृत्व वाली पंजाब लोक कांग्रेस के साथ साझेदारी के बावजूद बीजेपी केवल दो सीटें ही जीत सकी. गौर करने वाली यह है कि इस दौरान कैप्टन खुद की सीट भी नहीं जीत सके.
पंजाब में किसान आंदोलन 2.0 पर राजनीतिक दलों क्या रवैया?
साल 2020 में कांग्रेस सरकार के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए भगवंत मान के नेतृत्व वाली AAP सरकार किसान यूनियनों को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है. किसानों को नई दिल्ली की तरफ मार्च करने की अनुमति दी गई, वहीं पंजाब सरकार ने हरियाणा पुलिस की कार्रवाई पर भी आपत्ति जताई. सीएम भगवंत मान ने केंद्र सरकार से किसानों की मांगें पूरी करने को कहा. सीएम मान ने राज्यों के बॉर्डर्स पर हरियाणा पुलिस की बैरिकेडिंग को 'भारत और पंजाब के बीच सीमा बनाने' के रूप में संदर्भित किया. आंसू गैस के गोले गिराने के लिए ड्रोन का उपयोग न करने के लिए पंजाब के द्वारा पड़ोसी राज्य हरियाणा को एक पत्र भी लिखा गया था.
विपक्षी दल कांग्रेस भी किसान यूनियनों को लुभाने के लिए AAP से प्रतिस्पर्धा कर रही है. प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख अमरिंदर सिंह राजा वारिंग के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में मुख्य सचिव से मुलाकात की और अंतरराज्यीय सीमाओं पर प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले और रबर की गोलियों का इस्तेमाल करने के लिए हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज और पुलिस के खिलाफ एफआईआर की मांग की. इसके अलावा नेताओं ने हरियाणा पर पंजाब के इलाके में किसानों को निशाना बनाने का भी आरोप लगाया है.
अकाली दल ने बीजेपी की भावनाओं को किया नजरअंदाज
बसपा के गठबंधन तोड़ने के बाद शिरोमणि अकाली दल, खुद को फिर से मजबूत करने में लगा हुआ था. पार्टी को किसान यूनियनों द्वारा केंद्र सरकार के खिलाफ अपना आंदोलन फिर से शुरू करने के बाद एक और झटका लगा. ऐसी अटकलें आ रही थीं कि बीजेपी और अकाली दल लोकसभा चुनाव के लिए दोबारा गठबंधन करने के मूड में हैं. SAD ने 2020 में विवादास्पद (निरस्त किए गए) कृषि कानूनों के मुद्दे पर बीजेपी के साथ अपना 24 साल पुराना रिश्ता तोड़ दिया था. इसने 2021 में बीएसपी के साथ गठबंधन किया था. गठबंधन पर अकाली दल चुप है. पार्टी के करीबी सूत्रों का कहना है कि हाल ही में कोर कमेटी की बैठक के दौरान नेताओं ने किसानों की मांगें पूरी होने तक बीजेपी के साथ निर्भरता नहीं बढ़ाने का फैसला किया है. पार्टी ने किसानों के लिए पूरी तरह से समर्थन का ऐलान किया है.
बीजेपी की ग्रामीण मुहिम को झटका
नए सिरे से शुरू हुए किसान आंदोलन ने बीजेपी की ग्रामीण विस्तार योजनाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है. प्रदर्शनकारी किसानों के खिलाफ हरियाणा पुलिस की कार्रवाई ने पंजाब में बीजेपी की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं, जहां पार्टी को नुकसान उठाना पड़ रहा है. बीजेपी ने ग्रामीण इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह और पूर्व प्रदेश कांग्रेस कमेटी प्रमुख सुनील जाखड़ को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य नियुक्त किया था. जाहिर तौर पर बीजेपी का यह फैसला जाट और हिंदू मतदाताओं को लुभाने के लिए है.
'दिल्ली चलो मार्च' पर बीजेपी नेता खामोश
कृषि कानूनों के खिलाफ 2020 में राहुल गांधी के ट्रैक्टर मार्च का नेतृत्व करने वाले कांग्रेस के दलबदलू कैप्टन अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ ने किसान यूनियनों की आलोचना की है. किसान यूनियन एकता उगराहां (Ekta Ugrahan) ने कैप्टन और जाखड़ के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है, जो पंजाब में किसान आंदोलन 1.0 शुरू होने पर सूबे के मुख्यमंत्री और कांग्रेस प्रमुख पर थे.
कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सीएम खट्टर पर 2020 में अपने राज्य से दिल्ली तक मार्च कर रहे पंजाब के किसानों पर बड़ी कार्रवाई का भी आरोप लगाया था. कैप्टन अमरिंदर और जाखड़ दोनों ने किसान आंदोलन समर्थन करने के लिए मुखर रुख अपनाया था लेकिन अब नए सिरे से शुरू हुए किसान आंदोलन पर चुप हैं.
बीजेपी ने शुरू किया डैमेज कंट्रोल
एमएसपी मुद्दे फेल रहने और अब नए सिरे से किसान आंदोलन का सामना करने के बाद, बीजेपी हरकत में आ गई है और डैमेज कंट्रोल शुरू कर दिया है. किसान यूनियनों को खुश करने की कोशिश में केंद्र सरकार अब तक चंडीगढ़ में किसान यूनियनों के साथ तीन स्तरीय द्विपक्षीय वार्ता कर चुकी है. 8 फरवरी, 12 फरवरी और 15 फरवरी को हुई तीन बैठकें बेनतीजा रहने के बाद केंद्र सरकार ने अब रविवार को चौथे दौर की बातचीत की योजना बनाई है.
इस बार केंद्र सरकार ने अपनी रणनीति बदल दी है और 'दिल्ली चलो मार्च' से गायब रहने वाले बड़े लोगों को शामिल करने का फैसला किया है. आंदोलन कर रहे किसान यूनियनों द्वारा उठाई जा रही अन्य मांगों का समाधान खोजने के अलावा एमएसपी कानून की मांग को सुलझाने की कोशिश की जा रही है.
अब सबकी निगाहें रविवार की अहम बैठक पर हैं. किसान यूनियनों के करीबी सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार एमएसपी कानून पर किसानों को लिखित आश्वासन दे सकती है. हालांकि, किसानों और खेतिहर मजदूरों को मासिक पेंशन देने के अलावा उनके लोन माफ करने की मांगें पीछे रह सकती हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर किसान यूनियनों को खुश करने की रणनीति सफल रही तो पंजाब में बीजेपी की ग्रामीण विस्तार योजना को पंख लग सकते हैं.