
जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ बढ़ते तापमान या चरम मौसम की घटनाओं तक सीमित नहीं रह गया है. यह इस बात का भी सवाल है कि दुनिया का पैसा आखिर जा कहां रहा है. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक साल 2023 में ऐसी वैश्विक फाइनेंसिंग जो प्रकृति को नुकसान पहुंचाती है और पर्यावरण पर गंभीर असर डालती है, 7.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई.
इसमें से 4.9 ट्रिलियन डॉलर निजी निवेश के जरिए आए जैसे कर्ज, बॉन्ड और इक्विटी जबकि 2.4 ट्रिलियन डॉलर सार्वजनिक धन के रूप में थे जो पर्यावरण के लिए हानिकारक सब्सिडी के तौर पर दिए गए. इसके ठीक उलट, जंगलों की रक्षा, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और मिट्टी व जल संसाधनों को मजबूत करने जैसी नेचर-बेस्ड सॉल्यूशंस पर वैश्विक खर्च महज 220 अरब डॉलर रहा.
इसका मतलब साफ है कि प्रकृति को बचाने और जलवायु संकट से निपटने पर खर्च किए गए हर एक डॉलर के मुकाबले, 33 डॉलर ऐसे कामों में खर्च हुए जो उसके असर को उलट देते हैं.
सेक्टर-वाइज तस्वीर क्या कहती है
जब इस पैसे को अलग-अलग सेक्टरों में ट्रैक किया जाता है, तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है. स्वास्थ्य और टेक्नोलॉजी जैसे उद्योग इस सूची में सबसे ऊपर हैं, जहाँ से 1.38 ट्रिलियन डॉलर की प्रकृति-विरोधी फाइनेंसिंग हुई.
इसके बाद आता है कि फॉसिल फ्यूल सेक्टर: 1.13 ट्रिलियन डॉलर, एनर्जी सेक्टर: 0.79 ट्रिलियन डॉलर, बेसिक मटीरियल्स (केमिकल्स, मेटल्स, कंस्ट्रक्शन): 0.74 ट्रिलियन डॉलर. यहां तक कि रोजमर्रा के उपभोक्ता उत्पाद और कृषि सेक्टर को मिलाकर भी 0.8 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की ऐसी फाइनेंसिंग दर्ज की गई, जो जलवायु को नुकसान पहुंचाती है.

वैश्विक तस्वीर, भारतीय हकीकत
दुनिया भर में जिस तरह पैसा आज बह रहा है, वह जलवायु संकट को और गहरा कर रहा है और इसकी कीमत भारत पहले ही चुका रहा है. भारत ने महज नौ महीनों में साल के करीब 99 प्रतिशत दिनों तक किसी न किसी रूप में चरम मौसम का सामना किया. हिमालय से लेकर जम्मू-कश्मीर और तमिलनाडु के दक्षिणी तट तक, देश का शायद ही कोई हिस्सा इससे अछूता रहा.
के मुताबिक हिमाचल प्रदेश सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य रहा जहां 217 दिन चरम मौसम दर्ज किया गया.
राज्य में सर्दियों की बाढ़, प्री-मानसून भूस्खलन और मानसून के दौरान बादल फटने जैसी घटनाओं ने भारी तबाही मचाई. इन आपदाओं में 380 लोगों की मौत हुई और बड़े पैमाने पर नुकसान दर्ज किया गया.
देशभर में देखें तो चरम मौसम की घटनाओं के कारण 4,064 लोगों की मौत, लगभग 59,000 पशुओं की जान, 99,000 से अधिक घरों को नुकसान और बड़े पैमाने पर फसलें बर्बाद हुईं. यह आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि जलवायु संकट अब भविष्य की नहीं, बल्कि वर्तमान की त्रासदी बन चुका है और जब तक वैश्विक फाइनेंस की दिशा नहीं बदलेगी, इसका खामियाजा सबसे ज्यादा उन देशों को भुगतना पड़ेगा जो सबसे कम जिम्मेदार हैं.