
तमिलनाडु में कावेरी नदी के किनारे बसा एक क्षेत्र अब कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से निकलकर तेजी से औद्योगिक हब में बदल रहा है. लेकिन इस बदलाव के साथ गंभीर पर्यावरणीय समस्याएं भी सामने आई हैं. पेरुंदुरई क्षेत्र के ग्रामीणों का आरोप है कि SIPCOT क्षेत्र की फैक्ट्रियों की अनैतिक गतिविधियों के कारण भूजल, तालाब और झीलें दूषित हो गई हैं, जिससे कई लोग गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं.
इस गांव के कुएं अब बंद हो चुके हैं, उनपर बोर्ड लगाया गया है कि इस गांव का पानी पीने योग्य नहीं है. इस स्थिति के लिए SIPCOT की रेड कैटेगरी फैक्ट्रियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जो कथित तौर पर बिना ट्रीट किया हुआ पानी मुख्य एक्विफर में छोड़ रही हैं. बताया जा रहा है कि पिछले एक दशक से ‘टोटल डिसॉल्व्ड सॉलिड्स’ (TDS) का स्तर बेहद बढ़ गया है.
वाइपडी गांव के निवासी दिनेश कुमार का कहना है कि उनकी मां को सांस लेने में गंभीर दिक्कत होती है, जिसका कारण SIPCOT क्षेत्र की फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं है. उन्होंने बताया कि SIPCOT से बिना ट्रीट किया हुआ पानी ‘नल्ला ओडई’ नामक नाले में छोड़ा जा रहा है, जिससे उनके गांव का तालाब पूरी तरह बर्बाद हो गया है.
दिनेश कुमार ने कहा कि “कन्नाई काडू तालाब किसानों के लिए पानी का अहम स्रोत था. लेकिन अब फैक्ट्रियां अवैध रूप से इसमें गंदा पानी छोड़ रही हैं, जिससे तालाब प्रदूषित हो गया है. पहले यहां टैनरी थीं, अब डाई उद्योग है. टैनरियों के खिलाफ विरोध के बाद वे बंद हुईं, लेकिन अब डाई इंडस्ट्री बड़ी समस्या बन गई हैं.”

एक अन्य ग्रामीण, चंद्रशेखर ने पालाथोलावु झील की हालत दिखाई, जो 200 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैली है, लेकिन पूरी तरह पीने लायक नहीं रही.
चंद्रशेखर ने बताया कि “यह झील पेरुंदुरई SIPCOT से करीब 13 किमी दूर है. 30 साल पहले यह किसानों के लिए उपयोगी थी, लेकिन अब पूरी तरह प्रदूषित हो चुकी है. पिछले 30 सालों से हम न तो खेती कर पा रहे हैं और न ही इसका पानी पी सकते हैं. तीन गांवों के लिए यह प्रमुख जल स्रोत थी. अब पानी के लिए काफी दिक्कत हो रही है. कावेरी नदी का पानी 60 किमी दूर से लाया जाता है. डाई इंडस्ट्री के केमिकल्स से प्रदूषण हुआ है, जिससे कैंसर, अस्थमा और त्वचा रोग जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं”
गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोग
प्रसांतन, जो प्रदूषण के खिलाफ लड़ रहे एक स्वयंसेवी समूह का हिस्सा हैं, वो बताते हैं कि SIPCOT की फैक्ट्रियां लगातार बिना ट्रीट किया हुआ पानी छोड़ रही हैं.
प्रसांतन ने कहा कि “1990 के दशक में इंडस्ट्रियल पार्क शुरू हुआ था. यह इलाका बारिश पर निर्भर था और भूजल 500 फीट से नीचे था, इसलिए हम नकदी फसलें नहीं उगा सकते थे. हमें लगा कि उद्योग हमारी जिंदगी सुधारेंगे."
प्रसांतन ने आगे बताया कि हमारे पास ट्रीटमेंट प्लांट हैं, लेकिन ‘ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ नहीं दिया जा रहा. 2000 TDS तक पानी ट्रीट कर जमीन में छोड़ा जा सकता है, लेकिन बार-बार ऐसा करने से जमीन बीमार हो गई. उद्योगों ने 2,00,000 TDS तक का बिना ट्रीट पानी छोड़ा, जिससे यह स्थिति बनी.

अरुकनियम्मल, जिन्होंने अपने पति चेन्नियप्पन को कैंसर के कारण खो दिया, वो बताती है कि “मैंने 1994 में SIPCOT के लिए जमीन दी थी. कहा गया था कि यहां आईटी कॉरिडोर बनेगा. हम 2010 तक वहीं थे. मेरे पति खेत में काम करते हुए वहीं का पानी पीते थे. बाद में उन्हें पेट में दर्द शुरू हुआ और जांच में कैंसर निकला. इलाज के बाद भी वे सिर्फ तीन साल ही जीवित रह सके. यह सब SIPCOT के पानी की वजह से हुआ. यहां से 5 किमी दूर भी TDS का स्तर 6000 से 8000 तक पहुंच गया है.”
कमलम नाम की एक महिला ने बताया, “मेरे पति को 25 साल पहले, जब SIPCOT शुरू हुआ, तब किडनी में पथरी की समस्या हुई. ऑपरेशन के बाद यह फिर हुआ और तीसरी बार ट्यूमर बन गया. अब उन्हें पेशाब करने में भी दिक्कत होती है. एक किडनी निकालनी पड़ी और अब दूसरी को बचाने के लिए हर तीन महीने में अस्पताल जाना पड़ता है. शुरुआत में ही डॉक्टरों ने कहा था कि इसकी वजह पानी है”
SIPCOT पेरुंदुरई के आसपास के गांवों के लोगों का कहना है कि उनकी जमीन और हवा को पहले ही भारी नुकसान हो चुका है, और अगर इसे अब नहीं रोका गया, तो यह नुकसान और बढ़ जाएगा.