
भारत की सिलिकॉन वैली कहे जाने वाला बेंगलुरु अब देश का सबसे ज्यादा जाम वाला शहर बन गया है. टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स के मुताबिक, बेंगलुरु में औसत ट्रैफिक कंजेशन लेवल 74.4 है. इसका मतलब यह है कि जब सड़कें खाली हों, उस समय की तुलना में यहां यात्रा करने में औसतन 74.4 प्रतिशत ज्यादा समय लग रहा है.
बेंगलुरु में लोग हर साल औसतन 168 घंटे सिर्फ पीक आवर्स यानी व्यस्त समय में ट्रैफिक में बर्बाद कर देते हैं. यह पूरे एक हफ्ते के बराबर है. अगर इसे पैसों में समझें, तो तस्वीर और साफ हो जाती है. बेंगलुरु शहरी क्षेत्र में एक व्यक्ति की औसत सालाना कमाई करीब 8.93 लाख रुपये है. यानी हफ्ते की कमाई लगभग 17,000 रुपये होती है. इसका मतलब यह हुआ कि एक आम बेंगलुरु निवासी हर साल ट्रैफिक में फंसकर करीब 17,000 रुपये के बराबर समय गंवा देता है, जो एक एंट्री-लेवल स्मार्टफोन की कीमत के बराबर है.
दूसरे शहरों की स्थिति
मुंबई में औसत ट्रैफिक कंजेशन लेवल 63.2 है और वहां लोग हर साल करीब 126 घंटे ट्रैफिक में फंसे रहते हैं. नई दिल्ली में कंजेशन लेवल 60.2 प्रतिशत है और यहां सालाना 104 घंटे ट्रैफिक में बर्बाद होते हैं. कोलकाता में कंजेशन लेवल 58.9 प्रतिशत है, लेकिन यहां ट्रैफिक में बर्बाद होने वाला समय ज्यादा है- करीब 150 घंटे प्रति वर्ष.

नम्बेओ के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 में बेंगलुरु में 15 मिनट में सिर्फ 4.2 किलोमीटर की दूरी तय हो पाती है. यानी औसत रफ्तार 16.6 किलोमीटर प्रति घंटा है. इस सूची में कोलकाता दूसरे नंबर पर है, जहां 15 मिनट में 4.3 किलोमीटर की दूरी तय होती है और औसत स्पीड 17 किलोमीटर प्रति घंटा है. पुणे में 15 मिनट में 4.5 किलोमीटर की दूरी तय होती है, जहां औसत रफ्तार 18 किलोमीटर प्रति घंटा है.

बेंगलुरु में हालात इतने खराब क्यों हैं?
विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे कई कारण हैं. लंबे समय तक सही योजना का अभाव, पिछले कुछ दशकों में तेजी से हुआ निर्माण कार्य, निजी वाहनों की संख्या में भारी बढ़ोतरी — ये सभी वजहें ट्रैफिक को और खराब बना रही हैं. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मौजूदा सड़कों का विस्तार नहीं होना, सड़क नेटवर्क का ठहरा रहना और कई निर्माण परियोजनाओं का अधूरा रह जाना भी बेंगलुरु के ट्रैफिक संकट के बड़े कारण हैं.