महाराष्ट्र के नासिक की एक कोर्ट ने टीसीएस की साइट हेड और पॉश कमेटी की सदस्य अश्विनी चैनानी को ज़मानत देने से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि उन्होंने यौन उत्पीड़न और धर्मांतरण के मामले में पीड़ित की शिकायत को 'नज़रअंदाज़' किया. ऐसा करके उन्होंने इस तरह अपराध को 'उकसाया' (abet) है.
कोर्ट ने इन आरोपियों को भी जमानत देने से किया इनकार
चैनानी के अलावा कोर्ट ने शुक्रवार को इस मामले में तौसीफ़ अत्तार, रज़ा मेमन, शाहरुख़ कुरैशी और आसिफ़ अंसारी को भी ज़मानत देने से मना कर दिया. शनिवार को उपलब्ध हुए अपने विस्तृत आदेश में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वी.वी. कथारे ने कहा कि चैनानी की "चुप्पी और असंवेदनशीलता ने असल में काम की जगह के ज़हरीले माहौल को बढ़ावा दिया."
चैनानी कंपनी की आंतरिक समिति (Internal Committee) की सदस्य थीं. यह समिति 'कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013' के तहत बनाई गई थी, जिसे आम तौर पर POSH (यौन उत्पीड़न की रोकथाम) अधिनियम के नाम से जाना जाता है. इसके बावजूद उन्होंने पीड़ित महिला की शिकायत को लिखित रूप में दर्ज करवाने में कोई मदद नहीं की, जबकि अधिनियम के तहत ऐसा करना ज़रूरी था.
जज ने कहा कि इसके विपरीत आवेदक (चैनानी) के काम से यह पता चलता है कि उन्होंने शिकायत करने वाली महिला पर ही आरोप लगाया कि वह बेवजह सुर्खियों में आना चाहती है. साथ ही उससे कहा कि वह आरोपी को माफ़ कर दे. आपको बता दें कि चैनानी को इस मामले में 10 अप्रैल को 'भारतीय न्याय संहिता' के तहत अपराध को उकसाने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. पीड़ित महिला के अनुसार उसने कई बार चैनानी से मिलकर मौखिक रूप से उत्पीड़न की शिकायत की थी, लेकिन चैनानी ने इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया.
बचाव पक्ष के वकीलों ने दी थी ये दलील
बचाव पक्ष के वकीलों ने दलील दी कि चैनानी मुख्य रूप से TCS की पुणे ब्रांच से काम करती थीं और नासिक में होने वाले रोज़मर्रा के कामों की सीधी निगरानी नहीं करती थीं. उन्होंने कहा कि पीड़ित महिला ने कोई लिखित शिकायत नहीं दी थी, इसलिए कोई औपचारिक प्रक्रिया शुरू नहीं की गई थी. बचाव पक्ष ने शिकायत दर्ज करवाने में हुई देरी का मुद्दा भी उठाया था. हालांकि कोर्ट ने यह माना कि "शिकायत दर्ज करवाने में हुई देरी के लिए पीड़ित महिला को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उसने POSH कमेटी/आंतरिक समिति की सदस्य होने के नाते, घटना से जुड़ी परिस्थितियों के बारे में तुरंत चैनानी को जानकारी दे दी थी.
FIR के अनुसार कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी बताया कि रज़ा मेमन और शाहरुख़ कुरेशी ने पीड़ित महिला को एक 'वर्ड पज़ल' (शब्दों की पहेली) हल करने के लिए देकर उससे नज़दीकी बढ़ाने की कोशिश की थी. इसके अलावा उन्होंने महिला से निजी, दखल देने वाले और शर्मिंदा करने वाले सवाल पूछे थे. साथ ही अक्सर उस पर अश्लील टिप्पणियां भी की थीं. इसमें कहा गया है कि ऑफिस का माहौल इतना खराब हो गया था कि पीड़ित ने मार्च 2026 में FIR दर्ज होने से ठीक पहले इस्तीफा दे दिया.
जमानत देंगे तो प्रभावित हो सकती है जांच: कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि यह साफ़ था कि चैननी पॉश कमेटी की सदस्य होने के बावजूद पीड़ित द्वारा की गई मौखिक शिकायतों के प्रति असंवेदनशीलता दिखाई. ऐसा करके उसने न केवल आरोपी को बचाया, बल्कि उन्हें यौन उत्पीड़न के अपने कामों को जारी रखने के लिए उकसाया.
इसमें कहा गया कि "आवेदक द्वारा उकसाने का साफ़ सबूत था." इसके अलावा जांच शुरुआती चरण में थी और "आवेदक और सह-आरोपी के प्रभावशाली स्वभाव" को देखते हुए कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अगर उन्हें ज़मानत पर रिहा किया जाता है, तो गवाहों के प्रभावित होने और सबूतों के साथ छेड़छाड़ होने की पूरी संभावना है.
नासिक पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) IT कंपनी की नासिक यूनिट में कथित उत्पीड़न के 9 मामलों की जांच कर रही है. कुछ पीड़ितों ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें इस्लामिक तौर-तरीके अपनाने के लिए मजबूर किया गया. जिसमें नमाज़ पढ़ना, खाने-पीने की आदतें बदलना और धार्मिक प्रतीक अपनाना शामिल था.