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मुंबई: कल्याण-डोंबिवली में शिंदे सेना का बड़ा दांव, बीजेपी को झटका देकर MNS से किया गठबंधन

कल्याण-डोंबिवली नगर निगम (KDMC) में मेयर पद को लेकर महाराष्ट्र की राजनीति में नया मोड़ आ गया है. एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने बीजेपी को दरकिनार करते हुए राज ठाकरे की मनसे (MNS) के साथ हाथ मिला लिया है, जिससे महायुति गठबंधन में दरार के संकेत मिल रहे हैं.

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शिंदे सेना ने एमएनएस से मिलाया हाथ (Photo: ITG)
शिंदे सेना ने एमएनएस से मिलाया हाथ (Photo: ITG)

एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में अपनी सहयोगी बीजेपी को बड़ा झटका देते हुए राज ठाकरे की एमएनएस के साथ गठबंधन कर लिया है. 15 जनवरी के चुनावों में बीजेपी ने 50 सीटें जीतकर शानदार प्रदर्शन किया था, लेकिन अब वह अलग-थलग पड़ती दिख रही है. 53 सीटों वाली शिंदे सेना को मनसे के 5 पार्षदों का महत्वपूर्ण समर्थन मिल गया है. कोंकण भवन में हुई एक हाई लेवल मीटिंग के बाद सांसद श्रीकांत शिंदे ने मनसे के साथ गठबंधन की पुष्टि की है. इस गठबंधन के बाद उनकी कुल संख्या 58 हो गई है, जो 62 सीटों के बहुमत के आंकड़े के बेहद करीब है. 

शिंदे गुट अब उद्धव ठाकरे गुट (UBT) के उन 4 लापता पार्षदों को भी अपने साथ जोड़ने का संकेत दे रहा है, जिससे उन्हें बीजेपी के साथ सत्ता साझा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. 

बीजेपी ढाई-ढाई साल के मेयर पद के बंटवारे की मांग कर रही थी, लेकिन शिंदे सेना अब अकेले शीर्ष पद पर दावा ठोक रही है.

मनसे का साथ और बीजेपी की घेराबंदी

सांसद श्रीकांत शिंदे ने कोंकण भवन की बैठक के बाद साफ कर दिया कि मेयर पद के लिए उन्होंने एमएनएस का समर्थन हासिल कर लिया है. बीजेपी की 50 सीटों के बावजूद शिंदे सेना की आक्रामक रणनीति ने उसे बैकफुट पर धकेल दिया है. अब मनसे के 5 वोट जुड़ने से शिंदे गुट बहुमत के करीब है और वह गठबंधन में अपनी शर्तें मनवाने की स्थिति में आ गया है.

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यह भी पढ़ें: BMC चुनाव: उंगली से मिट जा रही वोटिंग स्याही, MNS ने लगाया चुनाव पर लगाया आरोप

ठाकरे गुट के पार्षदों पर नजर...

महायुति गठबंधन में खींचतान तब और बढ़ गई, जब श्रीकांत शिंदे ने उद्धव गुट के 4 पार्षदों को अपने पाले में लाने का इशारा किया. अगर ये पार्षद साथ आते हैं, तो शिंदे सेना को बीजेपी की शर्तों पर झुकने की जरूरत नहीं होगी. बीजेपी के ढाई साल के मेयर पद के फॉर्मूले को ठुकराकर शिवसेना का यह रुख सूबे की सियासत में बड़े बदलाव के संकेत दे रहा है.

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