महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर 'पावर गेम' देखने को मिल रहा है. राज्य की 7 राज्यसभा सीटों पर इस बार मुकाबला होने की संभावना नहीं है, क्योंकि सभी प्रमुख दलों के बीच सहमति बन गई है और चुनाव निर्विरोध होने की स्थिति बन गई है. सातवीं सीट के लिए शरद पवार के मैदान में उतरने के बाद बाकी दावेदार पीछे हट गए. यानी इन सीटों पर चुनाव निर्विरोध होना तय माना जा रहा है. लेकिन इस फैसले ने महाविकास अघाड़ी (MVA) के भीतर, खासकर शिवसेना में नई कलह को जन्म दे दिया है. खबर है कि पवार को सीट दिए जाने से आदित्य ठाकरे का खेमा काफी नाराज है.
आदित्य ठाकरे क्यों हैं नाराज?
86 साल के शरद पवार राज्यसभा जा रहे हैं, लेकिन शिवसेना के युवा नेतृत्व को यह बात रास नहीं आ रही है. सूत्रों की मानें तो आदित्य ठाकरे अपनी पार्टी की सीट पवार के लिए छोड़ने के बिल्कुल पक्ष में नहीं थे. शुरुआत में उद्धव ठाकरे भी आदित्य की बात से सहमत थे, लेकिन बाद में समीकरण बदल गए.
आदित्य ठाकरे का तर्क बहुत सीधा था. उनका कहना था कि शरद पवार की पार्टी पर कितना भरोसा किया जा सकता है? पिछले एक साल से उनके और अजित पवार के बीच फिर से साथ आने की खबरें चल रही हैं. ऐसे में आदित्य का सवाल था कि अगर आज हम अपनी सीट उन्हें दे देते हैं, तो क्या गारंटी है कि वह अगले चुनाव तक हमारे साथ रहेंगे?
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रोटेशन फॉर्मूले का फंसा पेंच
नाराजगी की एक और बड़ी वजह 2028 का गणित है. गठबंधन के रोटेशन फॉर्मूले के हिसाब से अगर शिवसेना अभी यह सीट पवार को देती है, तो 2028 में इस पर कांग्रेस अपना दावा ठोकेगी. आदित्य का मानना है कि इस चक्कर में शिवसेना को अभी भी सीट गंवानी पड़ी और 2028 में भी हाथ कुछ नहीं आएगा. यही वजह थी कि जब शरद पवार नामांकन भरने पहुंचे, तो आदित्य ठाकरे वहां नजर नहीं आए. उनकी यह गैरमौजूदगी उनकी नाराजगी का साफ इशारा मानी जा रही है.
संजय राउत की जिद के पीछे क्या है?
दिलचस्प बात यह है कि शरद पवार का नाम खुद उनकी अपनी पार्टी ने नहीं, बल्कि संजय राउत ने सबसे पहले आगे बढ़ाया था. राजनीतिक जानकार इसे राउत का मास्टर स्ट्रोक मान रहे हैं. दरअसल, संजय राउत का खुद का कार्यकाल 2028 में खत्म हो रहा है. अगर अभी शिवसेना चुनाव लड़ती तो अगली बार मौका कांग्रेस को मिलता. लेकिन अभी सीट छोड़कर राउत ने 2028 में शिवसेना और अपने लिए रास्ता साफ कर लिया है.
कांग्रेस भी नहीं है पूरी तरह खुश
सिर्फ शिवसेना ही नहीं, महाराष्ट्र कांग्रेस के नेता भी इस फैसले से बहुत खुश नहीं हैं. उन्हें डर है कि पवार की भविष्य की रणनीति क्या होगी, किसी को नहीं पता. कांग्रेस के कुछ नेता चाहते थे कि राज्यसभा में कोई ऐसा युवा और तेजतर्रार नेता जाए जो भाजपा और पीएम मोदी को मजबूती से टक्कर दे सके. हालांकि, दिल्ली में मल्लिकार्जुन खड़गे और गांधी परिवार से पवार के पुराने रिश्तों ने उनकी राह आसान कर दी.
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86 की उम्र में भी पवार का जलवा
शरद पवार पिछले करीब छह दशक से सक्रिय राजनीति का केंद्र रहे हैं. उन्होंने 1967 में महज 27 साल की उम्र में अपना पहला चुनाव जीता था और बाद में महाराष्ट्र के सबसे युवा मुख्यमंत्री बनकर सबको चौंका दिया था. साल 1999 में कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने अपनी नई पार्टी (NCP) बनाई और तब से लेकर आज तक वे राज्य और देश की राजनीति में एक 'पावर सेंटर' बने हुए हैं. 2019 में भी उन्होंने ही महाविकास अघाड़ी का ताना-बाना बुना और बीजेपी के पास 105 विधायक होने के बावजूद उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनवाकर सत्ता से बाहर कर दिया था. यही वजह है कि शरद पवार को भारतीय राजनीति का 'चाणक्य' कहा जाता है. हालिया विधानसभा चुनाव में पवार के गुट के पास भले ही कम विधायक बचे हों, लेकिन राज्यसभा की इस राजनीतिक बाजी में एक बार फिर उनका अनुभव और प्रभाव साफ दिखाई दे रहा है.