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महाराष्ट्र में फंसा पेच... राज्यपाल या स्पीकर किसकी चलेगी? 5 राज्यों में विवाद पर कोर्ट का ये रहा था फैसला

महाराष्ट्र के पावर टसल में फिलहाल एकनाथ शिंदे खेमा विधायकों को अपने पाले में करके अपनी ताकत दिखा रहा है तो दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे इमोशनल पॉलिटिक्स से सबकुछ ठीक करने की कवायद में हैं.

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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (फाइल फोटो) महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • महाराष्ट्र में उद्धव सरकार पर सियासी संकट के बादल छाए
  • एकनाथ शिंदे के बगावती तेवर के चलते बिगड़ा खेल
  • विधानसभा भंग करने की मांग की चल चुकी है चर्चा

महाराष्ट्र में उद्धव सरकार पर सियासी संकट के बादल छाए हैं. महा विकास अघाड़ी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुके एकनाथ शिंदे ने 40 विधायकों के समर्थन का दावा किया है. वहीं, मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे भी कह चुके हैं कि वो पद छोड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन पहले जो बागी हुए हैं वो सामने आकर बात करें. इस सियासी उथल-पुथल के बीच ये चर्चा भी चली है कि विधानसभा भंग की जा सकती है, लेकिन अभी ऐसा नहीं हुआ है. 

फिलहाल के पावर टसल में एकनाथ शिंदे खेमा विधायकों को अपने पाले में करके अपनी ताकत दिखा रहा है तो दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे इमोशनल पॉलिटिक्स से सबकुछ ठीक करने की कवायद में हैं. वहीं, कई राज्यों में ऐसी सियासी संकट वाली स्थिति पहले आ चुकी है. इन सबके बीच अगर सरकार का खेला हो जाता है तो राज्यपाल और स्पीकर का किरदार भी अहम हो जाता है.

स्पीकर की होगी अग्नि परीक्षा

बागी विधायकों का क्या करना है, ये तय करना स्पीकर का काम होगा. हालांकि, स्पीकर के पद पर कोई नेता नहीं है, जिसके चलते सारा कार्यभार डिप्टी स्पीकर के कंधों पर है. मौजूदा समय विधानसभा में  डिप्टी स्पीकर नरहरि झिरवाल हैं, जो  एनसीपी के विधायक हैं. बागी विधायक दल-बदल कानून के तहत आते हैं. उनकी दलीलें स्वीकार करना या ठुकराते हुए अपने विवेक से निर्णय लेते हुए उनकी योग्यता-अयोग्यता पर फैसला लेना अब डिप्टी स्पीकर की जिम्मेदारी होगी. सरकार के साथ-साथ डिप्टी स्पीकर की भी अग्निपरीक्षा होगी.  

राष्ट्रपति शासन की संभावना भी प्रबल

राष्ट्रपति शासन की संभावना भी प्रबल है, क्योंकि विधानसभा भंग करने का सीधा असर राष्ट्रपति चुनाव पर पड़ेगा. विधानसभा के लंबित रखते हुए राज्यपाल राष्ट्रपति शासन हो तो विधायक और बागी विधायक भी वोट डाल सकेंगे. वहीं, स्पीकर ने बागवत करने वाले विधायकों को अयोग्य घोषित कर देते तो उनकी सदस्यता खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसी स्थिति में अयोग्य घोषित विधायक हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं.

बागी विधायकों के अदालत अगर जाते हैं तो कोर्ट स्पीकर के आदेश पर रोक लगा देता है तो ऐसी स्थिति में विधायक राष्ट्रपति के चुनाव में  वोट कर पाएंगे. हालांकि, यह सब तभी होगा जब विधायक स्पीकर के फैसले के खिलाफ कोर्ट जाते हैं और कोर्ट इस तरह का अपना फैसला देता है तब. 

राज्यों में विवाद पर कोर्ट का ये रहा था फैसला

उत्तर प्रदेश 

1998 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल ने यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को उनके पद से हटा दिया था और कांग्रेस नेता जगदंबिका पाल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था. सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि यह निर्धारित करने के लिए कि कौन सत्ता पर काबिज होगा, तत्काल फ्लोर टेस्ट कराया जाना चाहिए. यह मुद्दा तब और बढ़ गया जब 12 विधायकों ने अपनी पार्टी के समर्थन के फैसले के खिलाफ सत्तारूढ़ भाजपा से समर्थन वापस ले लिया. ऐसे में कोर्ट ने दल-बदल विरोधी कानून के तहत कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने फ्लोर टेस्ट आयोजित करने से एक दिन पहले फ्लोर टेस्ट आयोजित करने के आदेश के बाद भी विधायकों की अयोग्यता बरकार रहेगी. इस तरह से कल्याण सिंह ने 215 विधायकों के साथ बहुमत साबित करने सफल रहे जबकि जगदंबिका पाल के पक्ष में 196 वोट मिले थे. 

झारखंड

सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में झारखंड में तत्काल फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया था. उस वक्त सुप्रीम कोर्ट में भाजपा की ओर से एक याचिका दायर की गई थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि तत्कालीन राज्यपाल ने झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री के रूप में बैठा दिया था, भले ही भाजपा ने बहुमत का दावा किया था.

राज्यपाल ने एक जूनियर विधायक को प्रोटेम स्पीकर के रूप में भी नियुक्त किया था, जिसका याचिकाकर्ताओं ने भी विरोध किया था. बीजेपी के अर्जुन मुंडा और अजय कुमार झा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. अदालत के आदेश पर झारखंड विधानसभा का सत्र 10 मार्च को बुलाया गया था, जहां विधायकों के शपथ दिलाने और 11 मार्च को फ्लोर टेस्ट कराया जाने की बात कही. 

कर्नाटक

2018 में कर्नाटक में भी इसी तरह की स्थिति पैदा हुई थी. तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष  ने भाजपा के बीएस येदियुरप्पा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था और उन्हें बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों का समय दिया था. कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें दावा किया गया कि फ्लोर टेस्ट में देरी से खरीद-फरोख्त और भ्रष्टाचार होगा.इस मुद्दे पर विचार करने के लिए आधी रात को सुनवाई हुई थी, जिसके बाद तीन जजों की बेंच ने तत्काल फ्लोर टेस्ट कराने को कहा था. हालांकि, उस समय येदियुरप्पा ने फ्लोर टेस्ट से पहले मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन 2019 में कांग्रेस और जेडीएस विधायकों के बगावत के बाद वो मुख्यमंत्री बन गए थे. 

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश की सियासत में भी ऐसी राजनीतिक घटना से गुजरना पड़ा है. अप्रैल 2020 में कोरोना महामारी की शुरुआत के दौरान कांग्रेस के 22 विधायकों ने बागी रुख अपनाते हुए इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद राज्यपाल ने शिवराज सिंह चौहान को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था. राज्यपाल के इस फैसले को लेक कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में दावा किया गया था कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 174 और 175 के तहत मध्य प्रदेश के राज्यपाल को मुख्यमंत्री शपथ के लिए बुलाना असंवैधानिक है. 

कांग्रेस नेता की याचिका में दावा किया गया था कि भाजपा ने आठ मार्च 2020 को 19 विधायकों को बेंगलुरु ले जाने के लिए तीन चार्टर्ड विमानों की व्यवस्था की थी. कांग्रेस ने आगे आरोप लगाया कि 19 विधायकों में से छह कैबिनेट मंत्री हैं जिन्हें भाजपा ने बेंगलुरु के इकंपनीडो रिसॉर्ट में रखा है. कांग्रेस ने यह भी तर्क दिया कि राज्यपाल कैबिनेट की सिफारिश के बिना फ्लोर टेस्ट के लिए नहीं बुला सकते थे, खासकर तब जब विधायकों के इस्तीफे को स्पीकर ने स्वीकार नहीं किया था.

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इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक में विधायक दलबदल मामले का हवाला दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को फ्लोर टेस्ट का आदेश देने की शक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है. हालांकि कोर्ट ने चेताया कि राज्यपाल के अधिकार का प्रयोग उस राजनीतिक व्यवस्था की सहायता के लिए नहीं किया जाना चाहिए जो उस समय की चुनी हुई सरकार को राजनीतिक विरोधी मानती है.

गोवा

2017 के गोवा विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने के राज्यपाल के फैसले को चुनौती देते हुए कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. कांग्रेस का तर्क था कि भाजपा छोटे दलों के समर्थन का दावा कर रही थी लेकिन वे भाजपा का समर्थन नहीं कर रहे थे. कांग्रेस की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 24 घंटे के भीतर फ्लोर टेस्ट कराने का निर्देश दिया था.

क्या कहता है दलबदल कानून

2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना के 56 विधायक जीतकर आए थे, जिनमें से एक विधायक का निधन हो चुका है. इसके चलते 55 विधायक फिलहाल शिवसेना के हैं. एकनाथ शिंदे का दावा है कि उनके साथ 40 विधायक हैं. ऐसे में ये सभी 40 विधायक अगर शिवसेना के हैं तो फिर उद्वव ठाकरे लिए संकट काफी बड़ा है. इस तरह से एकनाथ शिंदे अगर कोई कदम उठाते हैं तो दलबदल कानून के तहत कार्रवाई भी नहीं होगी. 

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दरअसल, दलबदल कानून कहता है कि अगर किसी पार्टी के कुल विधायकों में से दो-तिहाई के कम विधायक बगावत करते हैं तो उन्हें अयोग्य करार दिया जा सकता है. इस लिहाज से शिवसेना के पास इस समय विधानसभा में 55 विधायक हैं. ऐसे में दलबदल कानून से बचने के लिए बागी गुट को कम के कम 37 विधायकों (55 में से दो-तिहाई) की जरूरत होगी जबकि शिंदे अपने साथ 40 विधायकों का दावा कर रहे हैं. ऐसे में उद्धव ठाकरे के साथ 15 विधायक ही बच रहे हैं. इस तरह उद्धव से ज्यादा शिंदे के साथ शिवसेना के विधायक खड़े नजर आ रहे हैं. 

क्या सवाल उठ रहे हैं? 

इस सियासी हलचल के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर एकनाथ शिंदे चाहते क्या हैं? वो लगातार जरूरत से ज्यादा शिवसेना के बागी विधायकों को क्यों जुटा रहे हैं? वहीं, BJP ने अब तक विधानसभा सत्र बुलाने की मांग क्यों नहीं की है? उद्धव से खुली बगावत के बावजूद एकनाथ शिंदे लगातर क्यों कह रहे हैं कि वो बाला साहेब के सच्चे शिवसैनिक हैं और उन्होंने शिवसेना नहीं छोड़ी है...


 

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