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Maharashtra Political Crisis: कैसी थी बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना जो उद्धव राज में वैसी नहीं रही?

Uddhav Thackeray shiv sena: बाला साहेब कहते थे कि उन्हें सहिष्णु हिंदू नहीं चाहिए क्योंकि सहिष्णुता महंगी पड़ी है. वो हमेशा आक्रामक मोड में रहते थे. उत्तर भारतीय हों या दक्षिण भारतीय, सब मुंबई में शिवसैनिकों के टारगेट पर रहते थे.

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उद्धव ठाकरे और बाल ठाकरे (फाइल फोटो) उद्धव ठाकरे और बाल ठाकरे (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • महाराष्ट्र में उद्धव सरकार पर संकट के बादल
  • एकनाथ शिंदे के बागी तेवर से बिगड़ा समीकरण

राजनीतिक शब्दकोश का सबसे मशहूर मुहावरा ये है कि यहां न कोई स्थायी दुश्मन होता है, न कोई स्थायी दोस्त...हकीकत में ऐसा नजर भी आता है. कौन नेता और दल कब किस खेमे के साथ चला जाए, कोई अनुमान नहीं लगा पाता. अगर सियासत इतनी अनप्रेडिक्टिबल है तो फिर इसका तरीका हमेशा एक जैसा ही क्यों रहे? 

ये सवाल इसलिए क्योंकि महाराष्ट्र में चल रहे मौजूदा सियासी संकट का असल केंद्र यही है. मंत्री एकनाथ शिंदे ने विधायकों की भारी-भरकम फौज के साथ शिवसेना से बगावत का बिगुल फूंक दिया है. शिंदे ने अपने दांव से उद्धव ठाकरे का मुख्यमंत्री आवास से बोरिया-बिस्तर बंधवा दिया है. शिंदे और उनके समर्थकों का कहना है कि वो बाला साहेब ठाकरे के अनुयायी शिवसैनिक हैं और अब जो शिवसेना है वो वैसी नहीं रही. 

कैसी थी पुरानी शिवसेना?

तो बाला साहेब ठाकरे वाली शिवसेना कैसी थी? उस शिवसेना में ऐसा क्या था जो अब उद्धव राज में नहीं है. जबकि उद्धव तो कह रहे हैं कि वर्तमान शिवसेना भी बाला साहेब वाली ही है और उन्हीं के विचारों से प्रेरित है जो हिंदुत्व पर कोई समझौता नहीं करती. 

यही बात बाला साहेब भी कहते थे. हिंदुत्व की उनकी अवधारणा में राष्ट्रीयता थी. उनका कहना था कि देश के आगे कुछ भी स्वीकार नहीं. अपने इस एजेंडे पर चलते हुए बाला साहेब ने वो तमाम काम भी कर दिए जिन्हें विवादित माना गया. 

बाला साहेब एक कार्टूनिस्ट थे. फिल्मी दुनिया से उनका कनेक्शन था. लेकिन मराठा अस्मिता की आवाज उठाते हुए उन्होंने रास्ता बदल लिया. 1966 में शिवसेना का गठन किया. राजनीति में उतर आए लेकिन कभी चुनाव नहीं लड़ा. न कभी सरकार में कोई पद लिया. मगर, महाराष्ट्र और खासकर मुंबई को अपने रिमोट से चलाते रहे. 2012 में अपने निधन तक बाल ठाकरे शिवसेना के सर्वेसर्वा रहे.

बाला साहेब ने मराठा अस्मिता पर उग्र रुख अपनाया...

मराठा अस्मिता की बात जब भी आई बाला साहेब और उनके शिवसैनिकों ने उग्र रुख अपनाया. उत्तर भारतीयों के खिलाफ वो हिंसक होने से भी नहीं माने. मुंबई में रहने वाले दक्षिण भारतीय भी शिवसैनिकों के गुस्से से नहीं बच पाए. यहां तक कि लुंगी हटाओ, पुंगी बजाओ जैसे अभियान चलाए गए.

अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढहाया गया तो बाला साहेब ने सार्वजनिक मंचों से इसे अपनी कामयाबी करार दिया. जब एक बार उनसे कोर्ट के आदेश को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मैं कोर्ट को नहीं मानता और सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कंस्ट्रक्शन नहीं होना चाहिए, इसलिए हमने कंस्ट्रक्शन नहीं किया, डिस्ट्रक्शन किया. 

डिस्ट्रक्शन के बाद अब कंस्ट्रक्शन भी हो रहा है. कोर्ट के आदेश से अयोध्या में राम मंदिर बन रहा है. इस पर शिवसेना कह रही है कि ऐसा हमारे प्रयासों से सफल हो सका है.

हाल ही में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेटे और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री आदित्य ठाकरे अयोध्या गए थे. अयोध्या में उन्होंने कहा था कि हमने 2018 में नारा दिया था- पहले मंदिर फिर सरकार...इस नारे के बाद ही मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ. आदित्य ने तो अयोध्या में महाराष्ट्र सदन स्थापित करने की भी घोषणा की.

राम मंदिर की बात उठाते हैं उद्धव 

उद्धव परिवार के इस तरह के प्रयास इस बात की कवायद के तौर पर देखे जाते हैं कि शिवसेना आज भी हिंदुत्व के एजेंडे को लेकर बाला साहेब की राह पर है. जबकि लंबे समय तक शिवसेना की सहयोगी रही बीजेपी आरोप लगाती है कि उद्धव बाला साहेब का एजेंडा भूल गए हैं. 

तो फिर अब शिवसेना ऐसा क्या नहीं कर रही जो बाला साहेब करते थे? दरअसल, बाला साहेब के पुराने बयानों और शिवसैनिकों के एक्शन को देखें तो उनमें उग्रता उजागर होती है. बाला साहेब जिसे अपने विचार के खिलाफ मानते थे, उसकी आलोचना करते थे, विरोध करते थे और कई बार तो ऐसे लोगों या संगठनों को शिवसैनिकों की हिंसा भी झेलनी पड़ती थी. 

जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस हुआ तो 90 के दशक में देश के कई इलाकों में दंगे-फसाद हुए. मुंबई में बम धमाके भी हुए. उसके बाद भड़की हिंसा में शिवसैनिकों का रोल भी सामने आया. एक बार इंटरव्यू में जब बाला साहेब से हिंसा को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि अगर दंगे-फसाद में हम नहीं उतरते तो हिंदू मारे जाते. 

सहिष्णुता महंगी पड़ी है...

बाला साहेब कहते थे कि उन्हें सहिष्णु हिंदू नहीं चाहिए क्योंकि सहिष्णुता महंगी पड़ी है. वो मिलिटेंट हिंदू की बात करते थे. वो बांग्लादेशी मुसलमानों को बॉर्डर तक छोड़कर आने की बात करते थे. वो कहते थे कि जैसे हिंदुओं को पाकिस्तान, बांग्लादेश या अरब मुल्कों में हक नहीं मिलता है, वैसा ही भारत में भी मुसलमानों को नहीं मिलना चाहिए.

बाला साहेब ने बॉलीवुड इंडस्ट्री को भी निशाने पर लिया. शाहरुख खान की फिल्म माइ नेम इज खान का विरोध किया और उनके खिलाफ विवादित टिप्पणी भी की. कई और सितारों से भी उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा. जो फिल्म अपने विचार के खिलाफ लगे उसका वो पुरजोर विरोध करते थे. बाला साहेब के राज में मीडिया को भी टारगेट किया गया. चैनलों के दफ्तरों पर तोड़फोड़ की गई. पत्रकारों पर हमले के भी आरोप लगे. 

जब कोई उनसे सवाल करता था कि आपके नाम पर लोग कांपते हैं तो वे इस पर खुश होते थे. वो खुले मंच से कहते थे कि करप्शन के बिना इलेक्शन नहीं है. वो कहते थे कि करप्शन से लड़ने के लिए डिक्टेटर की तरह काम करने वाली क्रूर सरकार की जरूरत होती है. वो कहते थे कि पार्टी में लोकतंत्र जैसी कोई चीज नहीं होती, और जब तक मैं हूं मैं ही शिवसेना को संभालूंगा. 

ये बाला साहेब थे. आज उनकी जगह उद्धव ठाकरे शिवसेना को संभाल रहे हैं. बाला साहेब कभी सरकार में नहीं रहे लेकिन उद्धव 2019 से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हैं. उद्धव ने सीएम पद को लेकर ही बीजेपी से पुराना गठबंधन तोड़ा और कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई.

ठाकरे परिवार से पहली बार किसी ने सीएम की कुर्सी संभाली. ऐसा कम ही देखा गया है जब उद्धव ठाकरे के भाषण विवाद का हिस्सा बने हों. बाहरी बनाम लोकल का जो मुद्दा बाला साहेब के दौर में हमेशा सुलगता रहा, उसकी गूंज भी उद्धव राज में न के बराबर ही सुनाई दी. पैगंबर पर टिप्पणी विवाद में जब बीजेपी नेता घिरे तो शिवसेना ने इस मुद्दे पर भी पर बीजेपी की आलोचना की. हालांकि, बीजेपी राज में मुसलमानों से जुड़े बड़े मुद्दों पर शिवसेना ने भले ही कोई क्लियर स्टैंड न लिया हो लेकिन मुस्लिम समुदाय से जुड़े मसलों पर उसका रुख कड़ा भी नजर नहीं आया है.

बाला साहेब का विवादों से भी बड़ा नाता रहा...

एक शांत स्वभाव वाले उद्धव पर घर से सरकार चलाने के आरोप लगते रहे. मुख्य विपक्षी दल बीजेपी गठबंधन टूटने के बाद से ही लगातार उन्हें बाला साहेब के जमाने की शिवसेना की याद दिलाती रही और उनपर बाला साहेब के हिंदुत्व के एजेंडे से समझौता करने के आरोप लगाती रही. जबकि ये एक बड़ा सच है कि बाला साहेब का विवादों से भी बड़ा नाता रहा है. ऐसे विवाद कि बाला साहेब पर 6 साल तक वोट न डालने का प्रतिबंध तक लग गया था.

अब बाला साहेब नहीं हैं और पार्टी विवादों से भी दूर है. उद्धव को पूरे देश के सामने ये कहना पड़ा कि अगर किसी शिवसैनिक को लगता है कि मैं सक्षम नहीं हूं तो वो आए और मेरा इस्तीफा खुद राज्यपाल को सौंप आए. यहां तक कि उद्धव ने शिवसेना प्रमुख का पद छोड़ने तक का ऑफर दे दिया. वही, शिवसेना जिसे लेकर बाला साहेब कहते थे कि जब तक मैं हूं, पार्टी में मैं ही रहूंगा. 

यानी...पार्टी में बहुत कुछ बदल तो गया है...लेकिन वक्त के साथ ये बदलाव सकारात्मक है या नकारात्मक, इस पर विमर्श किया जा सकता है.

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