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बीजेपी को क्‍यों चाह‍िए एक ताकतवर NCP, अज‍ित पवार ने कैसे बनाया था एनडीए में बैलेंस

महाराष्ट्र की राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले अजित पवार का बुधवार को निधन हो गया. अजित पवार के अचानक चले जाने से सीएम देवेंद्र फडणवीस ने अपना अच्छा दोस्त ही नहीं खोया बल्कि महायुति में पावर बैलेंस बनाए रखने वाले नेता को भी खो दिया है. ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी को एक एनसीपी जैसी ताकतवर पार्टी की जरूरत होगी?

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महाराष्ट्र की सियासत में डिप्टी सीएम अजित पवार और सीएम देवेंद्र फडणवीस की केमिस्ट्री (Photo-PTI)
महाराष्ट्र की सियासत में डिप्टी सीएम अजित पवार और सीएम देवेंद्र फडणवीस की केमिस्ट्री (Photo-PTI)

महाराष्ट्र की राजनीति के सियासी धुरी माने जाने वाले डिप्टी सीएम अजित पवार की बुधवार को एक विशेष विमान हादसे में मौत हो गई. गुरुवार को अजित पवार के गांव में अंतिम संस्कार कर दिया गया है. अजित पवार का निधन सिर्फ पवार परिवार ही नहीं बल्कि बीजेपी के लिए भी राजनीतिक तौर पर बड़ा झटका माना जा रहा है. 

अजित पवार और देवेंद्र फडणवीस की सियासी केमिस्ट्री गजब की थी. फडणवीस के लिए छोटे पवार किसी सियासी ढाल से कम नहीं थे. ऐसे में बुधवार को अचानक डिप्टी सीएम अजीत पवार की हुई मौत से महाराष्ट्र की सियासत 360 डिग्री घूम गई हैं और अब बीजेपी के अगुवाई वाले महायुति के राजनीतिक समीकरणों में बदलाव होने की संभावना है. 

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ डिप्टी सीएम अजित पवार की सियासी जोड़ी महायुति में डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को कंट्रोल में रखने का काम करती थी. अब अजित पवार के निधन के बाद महायुति का पावर बैलेंस बिगड़ गया है. ऐसे में महायुति के सियासी समीकरण को बनाए रखने के लिए बीजेपी को अजित पवार जैसे ताकतवर एनसीपी नेता की जरूरत होगी? 

फडणवीस और अजित पवार की सियासी केमिस्ट्री
महाराष्ट्र की सियासत मेंएनसीपी वैचारिक रूप से भले ही बीजेपी से अलग थी, लेकिन अजित पवार के साथ सीएम फडणवीस के अच्छे संबंध थे. इसी का नतीजा था कि 2019 में जब उद्धव ठाकरे ने बीजेपी से गठबंधन तोड़कर कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने की कवायद कर रहे थे तो अजित पवार को फडणवीस ने अपने साथ मिलाकर सारा गेम पलट दिया था, लेकिन शरद पवार के एक्टिव हो जाने के चलते उसे पूरी तरह अमलीजामा नहीं पहना सके थे.

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वहीं, महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की शिवसेना से 2022 में हाथ मिलाया तो बीजेपी को मुख्यमंत्री पद से समझौता करना पड़ा था. एकनाथ शिंदे के साथ सियासी बैलेंस बनाए रखने के लिए ही देवेंद्र फडणवीस ने अजित पवार को अपने साथ मिलाया था. अजित पवार ने एनसीपी के 40 विधायक के साथ महायुति सरकार में शामिल हो गए थे. बीजेपी ने उन्हें शिंदे की सरकार में डिप्टी सीएम का पद दिया था. 

फडणवीस के लिए सियासी ढाल थे अजित पवार
बीजेपी ने एकनाथ शिंदे की प्रेशर पॉलिटिक्स को सिर्फ कंट्रोल ही नहीं किया था बल्कि 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी भी अपने कब्जे में ले ली.बीजेपी ये सबकुछ अजित पवार के जरिए ही कर सकी थी, क्योंकि एनसीपी के पास 41 विधायक थे. शिंदे के महायुति से अलग होने पर बीजेपी अजित पवार के जरिए सत्ता में बनी रहने का नंबर गेम जुटा रखा था.

बता दें कि 2024 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने महाराष्ट्र की 288 में से 132 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. एकनाथ शिंदे ने डिप्टी सीएम का पद स्वीकार करने और एक पायदान नीचे आने के लिए कई शर्तें रखकर बीजेपी को मुश्किल में डाल दिया था. तभी अजीत पवार ने गठबंधन को स्थिर रखने के लिए बीजेपी को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान कर दिया था. 

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अजित पवार के तेवर को देखते हुए शिंदे ने अपने सियासी हथियार डाल दिए थे.  इस तरह बीजेपी ने शिंदे पर सियासी कन्ट्रोल बनाए रखा था.अजित पवार का निधन बीजेपी के लिए सियासी तौर पर बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि महाराष्ट्र की राजनीति में पवार बीजेपी और देवेंद्र फडणवीस के लिए किसी सियासी ढाल से कम नहीं थे. ऐसे में अब अजित पवार के निधन से महायुति की राजनीति अलग रंग दिखा सकती है. 

बीजेपी के लिए एनसीपी की जरूरत क्यों है? 
महाराष्ट्र की 288 विधानसभा सीटों में से बीजेपी के 132 और शिंदे की शिवसेना के 57  विधायकों के दम पर बहुमत से ज्यादा नंबर महायुति के पास है. ऐसे में अजित पवार की पार्टी के 40 विधायक महायुति से अलग भी हो जाते हैं तो फडणवीस सरकार के लिए किसी तरह का खतरा नहीं होगा. इसके बावजूद बीजेपी को एनसीपी की जरूरत क्यों है? क्या अजित पवार के निधन से महाराष्ट्र में बीजेपी का पावर बैलैंस गड़बड़ाने की संभावना है? 

महाराष्ट्र में गठबंधन की सरकार चलाने की जटिलता को देवेंद्र फडणवीस और बीजेपी अच्छे से समझते हैं. अजित पवार सिर्फ फडणवीस के दोस्त ही नहीं थे बल्कि शिंदे की प्रेशर पॉलिटिक्स को नियंत्रण रखने का सियासी हथियार थे. बीजेपी अभी तक अजित पवार के दम पर शिंदे के साथ बैलेंस बनाए हुए हैं, लेकिन अब अजित पवार के निधन के बाद फडणवीस को महाराष्ट्र की राजनीति में नई वास्तविकताओं से सावधानी से निपटना होगा.

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बता दें कि अजित पवार 2023 में महाविकास अघाड़ी से अलग होकर महायुति में शामिल हुए थे तो बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने खुले दिल से गले लगाया था. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उस समय अजित पवार से कहा था, 'यह आपकी सही जगह है, लेकिन यहां आने में आपने बहुत समय लगा दिया.' इससे समझा जा सकता है कि अजित पवार की सियासी अहमियत बीजेपी के लिए क्या थी. 

महाराष्ट्र में बीजेपी कैसे बनाएगी सियासी बैलेंस
महाराष्ट्र में इस समय 'ट्रिपल इंजन' सरकार चल रही है. अजित दादा के रूप में उसका एक इंजन पटरी से उतर गया है. अजित पवार का निधन बीजेपी के लिए जरूर झटका है, लेकिन शिंदे की सियासी ताकत को नया रंग दे सकती है. अजित पवार का सियासी और प्रशासनिक अनुभव फडणवीस को सरकार चलाने में काम आ रहा था तो शिंदे के साथ बैलेंस बनाए रखने में अहम किरदार अदा कर रहे थे. एकनाथ शिंदे 2024 के बाद से जिस तरह समय-समय पर सियासी दांव चलते रहते हैं, उसमें अब और भी इजाफा हो सकता है. 

वित्त राज्य मंत्री आशीष जायसवाल कहते हैं कि अजित पवार की जगह भर पाना संभव नहीं है, क्योंकि वह बीजेपी के सिर्फ अपने राजनीतिक अनुभव का लाभ नहीं दे रहे थे बल्कि महायुति के सियासी ताकत थे. उनके अब नहीं होने से महाराष्ट्र की राजनीति को बड़ा झटका लगा है. इतना ही नहीं बीजेपी ने महाराष्ट्र के तमाम अखबारों में अजित पवार को श्रद्धांजलि देने वाले विज्ञापन दिए गए हैं. अजित पवार के अंतिम संस्कार में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से लेकर फडणवीस सहित बीजेपी के तमाम बड़े नेता पहुंचे हैं. 

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 2024 में महायुति की शानदार जीत के बाद से बीजेपी और शिवसेना (शिंदे गुट) के बीच खींचतान तेज हो गई थी. नगर पंचायत चुनाव के बाद नगर निगम चुनाव में बीजेपी ने अपनी ताकत बढ़ाने के बाद से एकनाथ शिंदे ने सियासी टेंशन बढ़ा रहे हैं. महाराष्ट्र के नगर निगम चुनाव के दो सप्ताह के बाद बीजेपी अगर मुंबई में अपना मेयर नहीं चुन पा रही है तो उसमें सबसे बड़ी बाधा एकनाथ शिंदे हैं. कल्याण-डोंबिवली में शिवसेना और बीजेपी आमने-सामने है. 

मुंबई में एकनाथ शिंदे अपना मेयर बनाने की शर्त रख रहे हैं तो कल्याण और डोंबिवली पर नजर गढ़ा हैं. इतना ही नहीं सोलापुर में अपना मेयर बनाने के लिए शिंदे ने उद्धव ठाकरे के साथ हाथ मिला लिया है तो राज ठाकरे के संग भी उनकी सियासी केमिस्ट्री दिख रही है. इस तरह से शिंदे बीजेपी को सियासी तौर पर उलझाकर रखे हुए हैं. अब अजित पवार के दुनिया में न होने के बाद शिंदे अपना सियासी रंग और भी दिखा सकते हैं. ऐसे में बीजेपी के लिए अजित पवार जैसे नेता की जरूरत बन रही है. 

अजित पवार जैसा ताकतवर दोस्त क्यों चाहिए
महाराष्ट्र की सियासत में बीजेपी गुजरात और मध्य प्रदेश जैसी अपनी जड़े जमाए रखने के लिए सियासी बैलेंस बनाए रखने की है. राज्य में मराठा समुदाय बीजेपी का कोर वोटबैंक नहीं रहा, बीजेपी उसमें अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अजित पवार के चेहरे को इस्तेमाल करती रही है. हालांकि, बीजेपी के पास अशोक चव्हाण गुट और पद्मसिंह पाटील गुट बीजेपी के साथ जुड़े है. माना जाता है कि अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा, पद्मसिंह पाटील घराने से ही हैं. इसके कारण ही अजित दादा बीजेपी के करीब आए थे. 

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अजित पवार के चलते फडणवीस मराठा आरक्षण आंदोलन पर अंकुश लगाए रखे थे, लेकिन अब वह जोर पकड़ सकता है. राज्य में करीब 27 फीसदी मराठा वोट है,जिस पर बनाए रखने और शिंदे के साथ सियासी पावर बैलेंस को बरकरार रखने के लिए बीजेपी को अजित पवार जैसे ताकतवर मराठा नेता की जरूरत है. ऐसे में अब अजित पवार के बाद एनसीपी की कमान कौन संभालता है, उससे बहुत कुछ तस्वीर साफ हो जाएगी. शरद पवार के अगुवाई में एनसीपी फिर से एकजुट होती है तो फिर क्या फडणवीस शरद पवार को अपने साथ मिलकर रख पाएंगे, ये भी देखना होगा.  

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