महाराष्ट्र के सतारा में नाबालिग रेप पीड़िता के मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) मामले में लापरवाही और अमानवीय व्यवहार की बात सामने आई है. पीड़िता के आरोपों ने न्यायपालिका को भी झकझोर दिया है. बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए राज्य के जन स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं.
कोर्ट ने निर्देश दिया है कि 25 मार्च 2026 तक इस पूरे मामले की रिपोर्ट पेश की जाए. जस्टिस माधव जे. जामदार और जस्टिस प्रवीण एस. पाटिल की बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जो तथ्य सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं. कोर्ट के संज्ञान में आया कि 16 मार्च 2026 को सतारा के सिविल अस्पताल में की गई MTP प्रक्रिया विफल रही.
आरोप है कि इसके बाद नवजात शिशु को DNA सैंपलिंग के नाम पर भूखा रखकर मार दिया गया. पीड़िता और परिजनों की गुहार का भी असर नहीं हुआ. बताया गया कि रात करीब 9:30 से 10:00 बजे के बीच यह घटना हुई. पीड़िता, उसकी मां और बाल कल्याण अधिकारी ने बच्चे को बचाने की गुहार लगाई थी. 17 मार्च की सुबह तक नवजात का शव पड़ा रहा.
POCSO और BNS के तहत दर्ज है केस
पीड़िता ने कोर्ट को बताया था कि उसके साथ लगातार यौन उत्पीड़न हुआ. इस मामले में पॉक्सो एक्ट की धारा 4 और 6 और भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 351(3) और 64(2)(M) के तहत मामला दर्ज किया गया था. पहले सतारा में जीरो FIR दर्ज हुई. इसे बाद में कर्नाटक के विजयपुरा के चडचन थाने ट्रांसफर कर दिया गया. आरोपी गिरफ्तार हो चुका है.
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के बाद अनुमति
पीड़िता 24 हफ्ते से अधिक की गर्भवती थी. मेडिकल जांच के बाद बोर्ड ने उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति को देखते हुए MTP की अनुमति दी थी. इसी आधार पर कोर्ट ने भी प्रक्रिया को मंजूरी दी थी. हालांकि, बाद में अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए. इस मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने सख्ती दिखाई है.
पीड़िता की सुरक्षा पर भी जताई चिंता
कोर्ट ने सतारा के जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारी और मेडिकल बोर्ड के सदस्यों को हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए हैं. कलेक्टर को 16 मार्च का सिविल अस्पताल का CCTV फुटेज सुरक्षित रखने को कहा गया है. पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया है कि पीड़िता और उसके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए. उन्हें कथित तौर पर धमकियां मिल रही हैं.