सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने हरियाणा सरकार के फंड से जुड़े करीब 590 करोड़ रुपये के कथित घोटाले की जांच अपने हाथों में ले ली है. केंद्रीय एजेंसी ने 8 अप्रैल को इस मामले में एफआईआर दर्ज कर व्यापक जांच शुरू कर दी है. यह मामला हरियाणा के पंचकूला स्थित आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (IDFC First Bank) और एयू स्माल फाइनेंस बैंक (AU Small Finance Bank) के खातों से सरकारी धन के कथित गबन से जुड़ा है.
जांच के दायरे में आए इस घोटाले में फर्जी दस्तावेजों, अनधिकृत लेनदेन और आपराधिक साजिश के जरिए सरकारी पैसे की हेराफेरी का आरोप है. इस मामले में दो आईएएस अधिकारियों- आरके सिंह और प्रदीप कुमार को सस्पेंड कर दिया गया है, जबकि कई अन्य अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में है. एफआईआर के अनुसार, यह कथित घोटाला 26 सितंबर 2025 से 23 फरवरी 2026 के बीच करीब पांच महीनों तक चला.
मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना 2.0 समेत विकास एवं पंचायत विभाग की योजनाओं से जुड़े फंड को बिना अनुमति के डायवर्ट किया गया. करीब 50 करोड़ रुपये आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और 25 करोड़ रुपये एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक के खातों में जमा किए गए, जिन्हें बाद में संदिग्ध लेनदेन के जरिए निकाल लिया गया.
जांच में सामने आया है कि फर्जी डेबिट मेमो, फेक परमिशन लेटर और फाइनेंशियल रिकॉर्ड में हेरफेर कर इस घोटाले को अंजाम दिया गया. एक मामले में चेक पर 2.5 करोड़ रुपये अंकों में लिखा था, जबकि शब्दों में 25 करोड़ रुपये दर्ज था, जिसे बैंक ने प्रोसेस कर दिया. पूर्व डीजी डीके बेहेरा के फर्जी हस्ताक्षर इस्तेमाल होने की भी बात सामने आई है.
एफआईआर में बैंकों की प्रक्रियात्मक खामियों की ओर भी इशारा किया गया है. खाता खोलने के दस्तावेज अधूरे पाए गए और बड़े लेनदेन के अलर्ट एक अनधिकृत मोबाइल नंबर से जुड़े थे. साथ ही, एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक पर जांच में पूरा सहयोग न करने के आरोप भी लगे हैं. घोटाले में शामिल पैसों को कई शेल कंपनियों- Swastik Desh Project, SRR Planning Gurus Pvt Ltd, Cap Co Fintech Services और R S Traders के जरिए घुमाया गया. इन कंपनियों के जरिए फर्जी एंट्री और लेनदेन दिखाकर मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका जताई गई है.
फरवरी 2026 में गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इन फंड्स के उपयोग का कोई वैध रिकॉर्ड नहीं मिला और पूरी प्रक्रिया को फर्जी करार दिया. इस मामले की शुरुआत राज्य विजिलेंस और एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच से हुई थी, जिसके बाद हरियाणा सरकार ने 25 मार्च को CBI जांच की सिफारिश की. केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद 8 अप्रैल को CBI ने आधिकारिक रूप से जांच अपने हाथ में ले ली. CBI ने इस मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया है. अब तक करीब 15 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है, जबकि कई अन्य संदिग्धों से पूछताछ जारी है.