पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई शुरू हुई. अदालत ने चुनाव आयोग (ECI) से साफ पूछा कि जब किसी मतदाता को सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है तो उसके साथ बूथ लेवल एजेंट (BLA) को प्रतिनिधि के तौर पर आने से क्यों रोका जा रहा है.
मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने कहा कि प्रभावित व्यक्ति को ये अधिकार है कि वो सुनवाई के दौरान अपने साथ किसी एक व्यक्ति को रख सके चाहे वो परिवार का सदस्य हो, दोस्त हो या राजनीतिक दल से जुड़ा कोई व्यक्ति.
चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि मतदाता किसी भी प्रतिनिधि के साथ आ सकता है, लेकिन राजनीतिक दल ये जोर नहीं दे सकते कि उनका एजेंट ही मौजूद रहे. इस पर कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब आयोग खुद कहता रहा है कि राजनीतिक दलों की भागीदारी जरूरी है तो अब उन्हें क्यों रोका जा रहा है.
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि SIR के तहत करीब 2.5 करोड़ मामलों की सुनवाई अभी लंबित है, जबकि सिर्फ तीन लाख दस्तावेजों का ही सत्यापन हुआ है. उन्होंने कहा कि 1900 से ज्यादा सुनवाई केंद्रों की जरूरत है, लेकिन बहुत कम जगहों को अधिसूचित किया गया है.
वहीं सिब्बल ने आरोप लगाया कि 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' के नाम पर मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, जैसे पिता और बच्चे की उम्र में 15 साल का अंतर या नामों की स्पेलिंग में फर्क (जैसे दत्ता और गांगुली). इस पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत में बाल विवाह जैसी परिस्थितियां भी हो सकती हैं, ऐसे मामलों को सीधे गलत नहीं ठहराया जा सकता.
कोर्ट ने निर्देश दिया कि 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' वाले मतदाताओं की सूची भी सार्वजनिक की जाए और पंचायत कार्यालयों में चस्पा की जाए ताकि लोग समय पर अपने दस्तावेज तैयार कर सकें.
टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने कोर्ट को बताया कि चुनाव आयोग ने नियम बदलकर राजनीतिक दलों के BLAs को सुनवाई से दूर रखने की कोशिश की है. उन्होंने ये भी दावा किया कि बंगाल में हालात तनावपूर्ण हैं और कुछ मामलों में बम मिलने की घटनाएं भी सामने आई हैं.
चुनाव आयोग ने सफाई दी कि जहां सिर्फ स्पेलिंग की गलती है, वहां नाम नहीं हटाए गए हैं और जिन मामलों में उम्र का अंतर असामान्य है, वहां सिर्फ नोटिस भेजे गए हैं, हटाने का फैसला नहीं हुआ है. हालांकि, कोर्ट ने दो टूक कहा कि ये पूरी प्रक्रिया संविधान के तहत चल रही है और जरूरी है कि हर नागरिक को पूरा और निष्पक्ष मौका मिले. अदालत ने साफ कहा कि हम नहीं चाहते कि कोई भी ये कहे कि उसे सुना नहीं गया. खबर लिखे जाने तक मामले की सुनवाई जारी थी.