scorecardresearch
 

धर्म की 'जरूरी प्रथा' कौन तय करेगा? सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट में होगा बड़ा संवैधानिक मंथन

सबरीमाला से शुरू होकर दाऊदी बोहरा, पारसी महिलाओं और मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद प्रवेश तक फैले धर्म बनाम समानता विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ा संवैधानिक मंथन होने जा रहा है. 9 जजों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू करेगी. अनुच्छेद 25-26 की सीमा, 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' की परिभाषा और धार्मिक परंपराओं की न्यायिक समीक्षा जैसे अहम सवालों पर ऐतिहासिक बहस होगी.

Advertisement
X
Article 25-26 की नई व्याख्या की तैयारी? धर्म बनाम कानून पर SC में होगी निर्णायक बहस
Article 25-26 की नई व्याख्या की तैयारी? धर्म बनाम कानून पर SC में होगी निर्णायक बहस

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला रिव्यू और उससे जुड़े धर्म बनाम समानता के मामलों पर सुनवाई शुरू कर दी है. कोर्ट ने साफ किया है कि इन मामलों की सुनवाई 9 जजों की संविधान पीठ (कॉन्स्टिट्यूशन बेंच) करेगी और बहस खुली अदालत में होगी.

पहले सबरीमाला मामला, फिर बाकी जुड़े केस

मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने कहा कि पहले सबरीमाला से जुड़े मामलों की सुनवाई की जाएगी, उसके बाद उससे जुड़े अन्य मामलों पर बहस होगी, जब तक कि पक्षकार यह न कहें कि मुद्दे अलग-अलग हैं. सीनियर वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि सभी मामलों में कानूनी सवाल एक जैसे और आपस में जुड़े हुए हैं.

CJI ने बताया कि 2019 में कोर्ट ने जिन सवालों को तय किया था, उन्हीं पर अब 9 जजों की पीठ सुनवाई करेगी. उन्होंने यह भी कहा कि रिव्यू याचिका की सुनवाई की वैधता पहले ही तय की जा चुकी है.

10 फरवरी 2020 के आदेश का जिक्र

CJI ने कहा कि 10 फरवरी 2020 को कोर्ट ने जिन कानूनी सवालों को तय किया था, अब उन्हीं पर अंतिम फैसला करने का समय है ताकि लंबे समय से लंबित कानूनी विवादों को खत्म किया जा सके.

Advertisement

उन्होंने बताया कि 9 जजों की पीठ ने 10 फरवरी 2020 को इस मामले पर सुनवाई की थी. उस पीठ के अब सिर्फ वही एक जज बचे हैं, बाकी सभी रिटायर हो चुके हैं.

सॉलिसिटर जनरल (SG) ने कहा कि उस समय सुनवाई के दौरान एक जज को स्वाइन फ्लू हो गया था और बाद में कोविड महामारी के कारण 9 जजों की एक साथ बैठकर सुनवाई संभव नहीं हो पाई थी.

लिखित दलीलें 14 मार्च 2026 तक दाखिल करें 

सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को निर्देश दिया है कि वे 14 मार्च 2026 तक अपनी लिखित दलीलें दाखिल करें. सुनवाई 7 अप्रैल 2026 से होगी जिसमें 9 जजों की संविधान पीठ 7 अप्रैल 2026 से सुनवाई शुरू करेगी. कोर्ट ने दो नोडल वकीलों को दोनों पक्षों के लिए नामित किया है ताकि सुनवाई व्यवस्थित तरीके से हो सके.

किन बड़े मुद्दों पर होगी सुनवाई?

इन मामलों में धर्म और समानता से जुड़े कई अहम सवालों पर फैसला होना है, जैसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की सीमा क्या है? आवश्यक धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice) को परिभाषित करने का अधिकार किसके पास है? धार्मिक संप्रदाय (Religious Denomination) की परिभाषा क्या होगी? क्या प्रचलित धार्मिक प्रथाओं को अदालत में चुनौती दी जा सकती है? धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की सीमा क्या है?

Advertisement

अन्य जुड़े मामले भी शामिल

सबरीमाला के साथ दाऊदी बोहरा समुदाय, पारसी महिलाओं की धार्मिक स्थिति, और मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश जैसे मामलों पर भी सुनवाई होगी.

पारसी पंचायत के वकील ने कहा कि पारसी महिला के धर्म से बाहर शादी करने पर उसकी धार्मिक स्थिति से जुड़ा सवाल अभी तय नहीं किया गया है. इस पर CJI ने कहा कि सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सवाल भी उठाए जा सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का टाइम टेबल तय

7–9 अप्रैल: सबरीमाला मामले के रिव्यू याचिकाकर्ताओं की दलीलें
14–16 अप्रैल: विरोधी पक्ष की दलीलें
21 अप्रैल: जवाबी दलील (Rejoinder)
21–22 अप्रैल: अमीकस क्यूरी की दलीलें

सीनियर वकील के. परमेश्वर और सी.यू. सिंह को अमीकस क्यूरी नियुक्त किया गया है जो कोर्ट की मदद करेंगे. CJI ने साफ कहा कि सभी पक्षों को तय समय-सारणी का सख्ती से पालन करना होगा.

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सबरीमाला मामले में तय कानूनी सवालों पर पहले सुनवाई होगी, उसके बाद अन्य जुड़े मामलों में उठने वाले अतिरिक्त मुद्दों पर विचार किया जाएगा.

केरल चुनाव से पहले सियासी राहत?

सबरीमाला रिव्यू याचिका की सुनवाई अब 9 अप्रैल से शुरू होगी. माना जा रहा है कि इससे केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाले एलडीएफ (LDF) को फिलहाल राहत मिल सकती है.

Advertisement

संभावना है कि तब तक राज्य में चुनाव की घोषणा हो जाएगी और आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू हो जाएगी. ऐसे में सरकार को महिलाओं के सबरीमाला मंदिर प्रवेश के मुद्दे पर चुनाव से पहले अपना स्पष्ट रुख अदालत में हलफनामा देकर रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

बताया जा रहा है कि विपक्षी कांग्रेस इस मुद्दे को चुनावी अभियान में उठाएगी, लेकिन सरकार को चुनाव से पहले कोर्ट में अपना पक्ष दर्ज कराने की बाध्यता नहीं होगी.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement