केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि आयकर अधिनियम की धारा 150 में और संशोधन लाने की प्रक्रिया जारी है. सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने कहा कि संशोधित कानून 1 अप्रैल से लागू होगा और इसके बाद कई लंबित आकलन मामलों पर असर पड़ेगा.
सुनवाई के दौरान आयकर विभाग के वकील ने अदालत को बताया कि Ashish Aggarwal फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट में करीब 2000 और देशभर के हाई कोर्ट में लगभग 18,000 मामले लंबित हैं. विभाग के मुताबिक 16.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की री-असेसमेंट कार्यवाही अटकी हुई है. विभाग की ओर से कहा गया कि इतनी बड़ी रकम किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है. अनंतकाल तक आकलन और चुनौती की प्रक्रिया नहीं चल सकती.
अदालत की अहम टिप्पणियां
चीफ जस्टिस ने संकेत दिया कि प्रस्तावित संशोधन संभवतः स्पष्टीकरणात्मक प्रकृति का होगा, जिसमें यह भी स्पष्ट किया जा सकता है कि फेसलेस री-असेसमेंट की वैधता क्या है. उन्होंने कहा कि कानून लागू होने के बाद उसकी वैधता को चुनौती दी जा सकती है और उस स्थिति में अदालत तीन महीने का ‘मोराटोरियम’ देने पर विचार कर सकती है ताकि पक्षकार संशोधन को चुनौती दे सकें.
न्यायमूर्ति जे. नागरत्ना ने कहा कि यदि संसद कोई संशोधन लाती है जो मौजूदा हालात को प्रभावित करता है तो अदालत को यह देखना होगा कि उसका प्रभाव क्या होगा और क्या वह पूर्व के फैसलों के आधार को बदल देता है.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, यह उसका विकल्प है. हालांकि, अगर मामले पहले हाई कोर्ट में जाएं तो सुप्रीम कोर्ट को वहां के दृष्टिकोण का लाभ मिलेगा.
सरकार बनाम याचिकाकर्ता
ASG ने दलील दी कि संशोधन के बाद सभी नोटिस और आकलन कार्यवाही फिर से जीवित हो जाएंगी और आदेश पारित करने के लिए समयसीमा तय की जाएगी. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि लगातार याचिकाएं दाखिल कर आकलन प्रक्रिया को रोका जा रहा है.
वहीं, याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि वे पहले ही पांच साल गंवा चुके हैं. उनका सवाल था कि संशोधन की वैधता, उसके उद्देश्य और फेसलेस मैकेनिज्म से टकराव जैसे मुद्दों पर फैसला किस मंच पर और किस तरह होगा. इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि कानून लागू होने के बाद ही उसकी वैधता पर सवाल उठाया जा सकता है. बता दें कि मामले की सुनवाई 6 अप्रैल तक के लिए स्थगित कर दी गई है. अब निगाहें इस बात पर हैं कि 1 अप्रैल से लागू होने वाले संशोधन का लंबित मामलों और फेसलेस री-असेसमेंट व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है.