राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ज़मीन, जल और हवा हर जगह प्रदूषण एक आम बात हो गई है. हालत तो यहां तक आ पहुंची है कि दिल्लीवासी इसके आदी हो गए हैं, लोगों ने मान लिया है कि दिल्ली में प्रदूषण से बचने का सिर्फ़ एक ही रास्ता है- दिल्ली से बाहर रहना. ऐसे वक़्त में पर्यावरण के नज़रिए से एक उम्मीद दिखाई दी आई है कि दिल्ली में जल्द ही एक रामसर साइट हो सकती है. प्रदेश सरकार 5.16 हेक्टेयर की नीली झील को दिल्ली की पहली रामसर साइट बनाने की तैयारी कर रही है.
सोमवार, 2 फरवरी को वर्ल्ड वेटलैंड्स डे (World Wetlands Day 2026) के मौक़े पर, दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने ऐलान किया कि असोला भट्टी वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुरी (Asola Bhatti Wildlife Sanctuary) में मौजूद नीली झील को रामसर साइट का टैग दिलाने की कोशिशें चल रही हैं. यह क़दम शहर के क़ीमती जल निकायों और बायोडायवर्सिटी को बहाल करने, उन्हें बचाकर रखने की दिल्ली की बड़ी योजना का हिस्सा है.

पीटीआई के मुताबिक़, वेटलैंड्स को ज़िंदगी और तहज़ीब दोनों के लिए अहम बताते हुए, सिरसा ने कहा, "जल निकायों का संरक्षण न सिर्फ़ एक पर्यावरण से जुड़ी ज़िम्मेदारी है, बल्कि यह हमारी परंपराओं की सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है. दिल्ली में कभी 1,000 से ज़्यादा जल निकाय थे, जिनमें से कई अतिक्रमण और अनदेखी के कारण ख़त्म हो गए. दिल्ली सरकार ने सभी जल निकायों को फिर से ज़िंदा करने का संकल्प लिया है, 2027 के आख़िर तक ज़्यादा से ज़्यादा जल निकायों को बहाल करने का टार्गेट रखा गया है." उन्होंने यह भी बताया कि नीली झील को रामसर साइट के रूप में नोटिफ़ाई करने के लिए केंद्र सरकार के साथ मिलकर कोशिशें चल रही हैं.
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्थित नीली झील को भारद्वाज झील भी कहा जाता है, जो अपने साफ़ पानी, शांत माहौल और ढेर सारे पक्षियों के लिए मशहूर है. यह झील दिल्ली के असोला भट्टी वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुरी में मौजूद है, जो इंसानों के द्वारा बनाई गई थी.

नीली झील दिल्ली की भाग-दौड़ से भरे माहौल से अलग सुकून हासिल करने वाली जगह के रूप में लोकप्रिय रही है. पुरानी माइनिंग वाली जगह पर बनी साफ़ नीले पानी की यह झील बायोडायवर्सिटी से भरपूर है और मौजूदा वक़्त में इसे इकोटूरिज़्म डेस्टिनेशन के तौर पर डेवलप किया जा रहा है.
प्रकृति प्रेमियों, बर्डवॉचर्स और इको-टूरिस्ट्स के लिए, नीली झील दिल्ली के बीचों-बीच एक ऐसी सुकून भरी जगह है, जहां प्राकृतिक सुंदरता, इकोलॉजिकल अहमियत और सांस्कृतिक विरासत का संगम है.
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रामसर साइट एक वेटलैंड होती है, जिसे 'रामसर कन्वेंशन' के तहत 'अंतरराष्ट्रीय पहचान' का दर्जा दिया जाता है. इन साइटों को ज़्यादा बायोडायवर्सिटी वैल्यू के लिए पहचाना जाता है. हालांकि, यह दर्जा अपने आप में कानूनी सुरक्षा नहीं देता, लेकिन यह साइट के इकोलॉजिकल कैरेक्टर को बनाए रखने की लगातार कोशिश को दिखाता है. ये अनोखे पेड़-पौधों और जीवों को सहारा देते हैं और पानी को साफ करने और बाढ़ को कंट्रोल करने जैसी ज़रूरी इकोसिस्टम सेवाएं देते हैं. ऐसी साइट्स खास इकोसिस्टम का हिस्सा होती हैं, जिनमें झीलें, दलदल और मैंग्रोव (विशेष झाड़ीदार वृक्ष) शामिल हैं. ये इकोलॉजिकल संतुलन बनाए रखने और जलवायु को रेगुलेट करने में अहम भूमिका निभाते हैं.
रामसर कन्वेंशन साल 1971 में ईरान के रामसर शहर में साइन की गई एक इंटरनेशनल संधि है. इस संधि से इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर, वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर और दूसरी एनवायरनमेंटल एजेंसियां जुड़ी हुई हैं. इस कन्वेंशन का मक़सद दुनिया भर में वेटलैंड्स के संरक्षण और सस्टेनेबल इस्तेमाल को बढ़ावा देना है और बायोडायवर्सिटी को सपोर्ट करने, वॉटर साइकिल को रेगुलेट करने और इंसानी ज़िंदगी को बेहतर बनाए रखने में उनकी भूमिका को पहचानना है. भारत 1982 में इस कन्वेंशन का हिस्सा बना था.
रामसर साइट्स का सिलेक्शन कन्वेंशन के तहत तय किए गए अलग-अलग क्राइटेरिया पर आधारित होता है. जैसे, "किसी वेटलैंड को इंटरनेशनल लेवल पर अहम तब माना जाना चाहिए, जब वह पौधों और/या जानवरों की प्रजातियों को उनके लाइफ साइकिल के एक महत्वपूर्ण स्टेज पर सपोर्ट करता हो, या खराब हालात के दौरान उन्हें पनाह देता हो." इसमें साइट्स की मछलियों और पानी के पक्षियों को सपोर्ट करने की क्षमता को भी देखा जाता है.
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किसी जगह को रामसर साइट के तौर पर नामित करने से वेटलैंड्स का संरक्षण और समझदारी से इस्तेमाल होता है, खासकर उन वेटलैंड्स का, जो पानी में रहने वाले पक्षियों के लिए ज़रूरी आवास का काम करते हैं. रामसर लिस्ट में शामिल होने से वेटलैंड्स के इकोसिस्टम के घटकों, प्रक्रियाओं और फायदों को बनाए रखने में मदद मिलती है, जिससे इंटरनेशनल पहचान और सुरक्षा तय होती है. यह वेटलैंड्स और उनके संसाधनों के संरक्षण और सही इस्तेमाल के लिए राष्ट्रीय कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए एक फ्रेमवर्क देता है.
अगर दिल्ली स्थित नीली झील को रामसर टैग मिलता है, तो यह राष्ट्रीय राजधानी की पहली रामसर साइट बन जाएगी, जो अपनी इकोलॉजिकल और सांस्कृतिक अहमियत के लिए पहचानी जाने वाली वेटलैंड्स के ग्लोबल नेटवर्क में शामिल हो जाएगी. रामसर डेज़िग्नेशन न सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचता है, बल्कि मज़बूत संरक्षण प्रयासों को भी पक्का करता है, जो दिल्ली की बायोडायवर्सिटी और क्लाइमेट लचीलेपन के लिए बहुत ज़रूरी हैं.
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हाल ही में, उत्तर प्रदेश के एटा जिले में 'पटना बर्ड सैंक्चुरी' और गुजरात के कच्छ जिले में 'छारी-ढांड' को ग्लोबल रामसर कन्वेंशन के तहत रामसर साइट्स लिस्ट में अंतरराष्ट्रीय महत्व की वेटलैंड्स के रूप में शामिल किया गया. 'पटना बर्ड सैंक्चुरी' और 'छारी-ढांड' के शामिल होने के बाद भारत में रामसर नेटवर्क 98 साइट्स तक पहुंच गया है. अगर दिल्ली की नीली झील को इसके लिए सेलेक्ट किया जाता है, तो यह तादाद 99 हो जाएगी.
'पटना बर्ड सैंक्चुरी' और 'छारी-ढांड' के सिलेक्शन का ऐलान करते हुए केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, "यह अंतरराष्ट्रीय पहचान पर्यावरण की रक्षा करने और अपनी वेटलैंड्स को बचाने के लिए भारत की मजबूत और लगातार कोशिश को दिखाती है."
रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु में सबसे ज़्यादा 20 रामसर साइट्स हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में सुंदरबन वेटलैंड सबसे बड़ी है और हिमाचल प्रदेश में रेणुका वेटलैंड सबसे छोटी साइट है. भारत की पहली रामसर साइट्स- ओडिशा में चिल्का झील और राजस्थान में केवलादेव नेशनल पार्क हैं, जिनको 1981 में नॉमिनेट किया गया था. एशिया के अंदर भारत एक ऐसा देश है, जिसके पास सबसे ज़्यादा रामसर साइट्स हैं.