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बीट रिपोर्ट: सिर्फ जमीन नहीं, विरासत का सवाल! बेदखली के खतरे के बीच दिल्ली रेस क्लब को राहत

कभी दिल्ली की खेल विरासत का गर्व रहा दिल्ली रेस क्लब अब अस्तित्व के संकट का सामना कर रहा है, क्योंकि अचानक मिले 15 दिनों के बेदखली नोटिस ने अधिकारियों को स्तब्ध और चिंतित कर दिया है.

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दिल्ली हाई कोर्ट ने बेदखली विवाद में दिल्ली रेस क्लब को अंतरिम राहत दी. (Photo: ITG)
दिल्ली हाई कोर्ट ने बेदखली विवाद में दिल्ली रेस क्लब को अंतरिम राहत दी. (Photo: ITG)

1926 में अपनी स्थापना के 100 साल पूरे होने का जश्न मनाने के कुछ ही दिनों बाद, दिल्ली रेस क्लब को 12 मार्च 2026 को आवास और शहरी कार्य मंत्रालय के भूमि और विकास कार्यालय द्वारा 15 दिनों के भीतर खाली करने का नोटिस जारी किया गया. दिल्ली की खेल विरासत का एक अभिन्न अंग रहा दिल्ली रेस क्लब अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है.

भूमि एवं विकास कार्यालय द्वारा 15 दिनों के भीतर स्थान खाली करने का अचानक नोटिस मिलने के बाद क्लब के अधिकारी हैरान हैं. दिल्ली रेस क्लब ने प्रधानमंत्री आवास और वायुसेना स्टेशन से सटी 53.4 एकड़ जमीन पर अपना स्वामित्व सुरक्षित करने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है.

गुरुवार को एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने चल रहे बेदखली विवाद में दिल्ली रेस क्लब को अंतरिम राहत प्रदान की, सरकार ने अदालत को आश्वासन दिया था कि वह कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना क्लब को बेदखल नहीं करेगी.

दिल्ली रेस क्लब का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने बताया कि सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह कानूनी प्रक्रिया के अनुसार ही बेदखली की कार्रवाई करेगी.

पिछली सुनवाई में, अदालत ने अधिकारियों को जबरदस्ती कार्रवाई करने से रोक दिया था और विशेष रूप से सरकार से पूछा था कि क्या वह उचित प्रक्रिया के बिना क्लब को बेदखल न करने के लिए प्रतिबद्ध होगी.

भूमि एवं विकास कार्यालय (एल एंड डीओ) ने 12 मार्च 2026 को दिल्ली के दो सबसे ऐतिहासिक खेल स्थलों, दिल्ली रेस क्लब और भारतीय पोलो एसोसिएशन को बेदखली नोटिस जारी किए.

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ये दोनों इकाइयां लोक कल्याण मार्ग के पास स्थित लगभग 68 एकड़ की प्रमुख भूमि पर फैली हुई हैं, जो प्रधानमंत्री के आवास के ठीक बगल में है.

बेदखली के नोटिसों ने एक कानूनी विवाद को जन्म दिया है, जिसकी जांच अब दिल्ली उच्च न्यायालय कर रहा है. उच्च न्यायालय ने 25 मार्च, 2026 के अपने आदेश में फिलहाल किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है. दोनों संस्थाओं को दिए गए नोटिस दो अलग-अलग मामलों से संबंधित हैं.

दिल्ली रेस क्लब के सचिव और सीईओ, कर्नल एस.के. बख्शी (सेवानिवृत्त) ने कहा, “हमारी स्थापना 8 मार्च, 1926 को हुई थी और हमने हाल ही में अपने 100 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाया है. घुड़दौड़ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त खेल है. हम 1926 से रेस आयोजित कर रहे हैं. हम जॉकी, ग्रूमर और ट्रेनर समेत करीब 5,000 परिवारों को सपोर्ट करते हैं. हमारे पास 250 थॉरोब्रेड घोड़े हैं और हर घोड़े की कीमत लगभग 50 लाख रुपये है."

उन्होंने आगे कहा कि “हमारे पास इतना बड़ा ढांचा है, और हमने सरकार से वैकल्पिक स्थान देने और व्यवस्था तैयार करने का अनुरोध किया है. इसमें काफी समय लगेगा. बुनियादी ढांचे और निर्माण के अलावा, पटरियों का सावधानीपूर्वक रखरखाव भी करना होगा.हम सरकार के साथ हैं. हमारी बैठकें हुईं, लेकिन अचानक स्थानांतरण संभव नहीं है.” 

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कर्नल बक्शी ने कहा, “1994 में हमारी शुरुआती लीज समाप्त होने के बाद 1999 में एक नोटिस दिया गया था. हम कोर्ट गए और 2012 में आदेश आया. 2011 में लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (एल एंड डीओ) ने हमसे करीब 4 करोड़ रुपये मांगे, जिसे हमने चुका दिया. 2013 में हमने 25 साल की लीज के लिए आवेदन किया, जिसके बाद सरकार ने 3.48 करोड़ रुपये मांगे, जो हमने दे दिए और हम मास्टर प्लान के अनुरूप चलते रहे.”

कर्नल बक्शी ने आगे बताया कि क्लब अब तक लगभग 7.5 करोड़ रुपये दे चुका है और आगे भी वार्षिक किराया देता रहेगा. उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर जरूरत पड़ी तो वे स्थानांतरण के लिए तैयार हैं, लेकिन इसके लिए वैकल्पिक जमीन और 250 घोड़ों को रखने के लिए पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का समय चाहिए होगा.

क्या है मामला?

12 मार्च 2026 को आवास और शहरी कार्य मंत्रालय के तहत आने वाले एल एंड डीओ ने दोनों संस्थाओं को उनके-उनके परिसरों को खाली करने के लिए कहा. इसमें रेस क्लब द्वारा उपयोग की जा रही लगभग 53 एकड़ जमीन और जयपुर पोलो ग्राउंड की लगभग 15 एकड़ जमीन शामिल है. दोनों को 15 दिनों के भीतर खाली करने का निर्देश दिया गया.

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नोटिस में कहा गया कि 1994 से चली आ रही लीज समाप्त हो चुकी है और इस जमीन की जरूरत बड़े स्तर की योजना और विकास के लिए है.

यह 2017 के बाद दूसरी बार ऐसा प्रयास किया गया है. हालांकि, कानून के अनुसार इन नोटिसों को उचित प्रक्रिया के बिना दिल्ली रेस क्लब को बेदखल करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया है.

दिल्ली रेस कोर्स और जयपुर पोलो ग्राउंड का इतिहास

दिल्ली रेस कोर्स और जयपुर पोलो ग्राउंड, दिल्ली के औपनिवेशिक दौर के विकास से गहराई से जुड़े हुए हैं, जब खेल न केवल मनोरंजन बल्कि सत्ता के प्रतीक भी हुआ करते थे.

जयपुर पोलो ग्राउंड का नाम जयपुर के अंतिम महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय के नाम पर रखा गया है, जो विश्व स्तर पर प्रसिद्ध पोलो खिलाड़ी थे और इस खेल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही.

इस मैदान पर कई हाई-प्रोफाइल मैच आयोजित हुए हैं, जिनमें 1975 में भारत यात्रा के दौरान प्रिंस चार्ल्स द्वारा देखा गया एक प्रमुख मैच भी शामिल है. इस आयोजन में राजनयिक, सैन्य अधिकारी और दिल्ली के उच्च वर्ग के लोग शामिल हुए थे.

ब्रिटिश काल में जयपुर पोलो ग्राउंड एक प्रमुख स्थल के रूप में विकसित हुआ, जहां घुड़सवार रेजिमेंट, रियासतों के शासक और विदेशी गणमान्य व्यक्ति पोलो मैचों का संरक्षण करते थे. ये मैच सामाजिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण आयोजन हुआ करते थे.

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इसी तरह, दिल्ली रेस कोर्स की शुरुआत 1911 के दिल्ली दरबार के बाद मानी जाती है, जब ब्रिटिशों ने राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित किया और नए शाही शहर का निर्माण शुरू किया.

1930 के दशक में रेस ट्रैक बनाया गया और 1940 तक दिल्ली रेस क्लब ने आधुनिक सुविधाओं, अस्तबल और दर्शक दीर्घाओं के साथ अपनी औपचारिक गतिविधियां शुरू कर दीं. इसके बाद यह भारत के प्रमुख रेसिंग स्थलों में शामिल हो गया.

समय के साथ, यह लुटियंस दिल्ली के संस्थागत परिदृश्य का हिस्सा बन गया और 2016 में इसका नाम लोक कल्याण मार्ग किया गया.

30 साल तक संचालन जारी रहा

1994 में लीज समाप्त होने के बावजूद, दोनों संस्थाएं तीन दशकों से अधिक समय तक वहां संचालित होती रहीं. उनका तर्क होल्डिंग ओवर के कानूनी सिद्धांत पर आधारित है, जिसके अनुसार किराया स्वीकार किए जाने और निर्बाध कब्जे ने कानूनी सुरक्षा का निर्माण किया.

हालांकि, सरकारी अधिकारियों का कहना है कि कोई औपचारिक नवीनीकरण नहीं हुआ और 1995 के बाद से यह कब्जा वैध लीज के बिना है.

दिल्ली रेस क्लब ने अदालत में किराया रसीदें और लीज विस्तार शुल्क के प्रमाण प्रस्तुत किए हैं, जिससे वे जमीन पर अपने अधिकार का दावा करते हैं.

लाइसेंस बनाए रखने के लिए क्या जरूरी है?

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विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि क्या क्लब बिना नई लीज के अपने अधिकार जारी रख सकते हैं. जमीन पर कानूनी रूप से बने रहने के लिए उन्हें L&DO से या तो औपचारिक लीज नवीनीकरण या नई लाइसेंस शर्तें प्राप्त करनी होंगी.

अदालत में दोनों संस्थाओं ने तर्क दिया है कि उन्होंने अपनी वित्तीय जिम्मेदारियां पूरी की हैं और उन्हें बिना उचित प्रक्रिया के अवैध कब्जाधारी नहीं माना जा सकता. फिलहाल उच्च न्यायालय  ने सरकार को बलपूर्वक कब्जा लेने से रोका है और स्पष्ट किया है कि बेदखली कानूनी प्रक्रिया के तहत ही होनी चाहिए.

दिल्ली में केंद्र सरकार की जमीन का प्रबंधन करने वाला L&DO इस बेदखली प्रक्रिया का मुख्य प्राधिकरण है. अधिकारियों का कहना है कि राजधानी के बेहद संवेदनशील और उच्च मूल्य वाले क्षेत्र में स्थित इस जमीन की जरूरत पुनर्विकास के लिए है, जो व्यापक शहरी योजना के अनुरूप होगा.

हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक सार्वजनिक योजना सामने नहीं आई है, लेकिन सूत्रों के अनुसार इस जमीन को भविष्य में सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर या सेंट्रल विस्टा क्षेत्र से जुड़े विकास में शामिल किया जा सकता है.

अधिकारियों ने इसे बड़े स्तर की योजना का हिस्सा बताया है, लेकिन इसके अंतिम उपयोग के बारे में अभी सार्वजनिक रूप से कुछ स्पष्ट नहीं किया गया है. प्रधानमंत्री आवास के सामने और लुटियंस दिल्ली में स्थित होने के कारण यह जमीन रणनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, जिसकी कीमत हजारों करोड़ रुपये आंकी जा रही है.

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किसी भी पुनर्विकास को केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं के अनुरूप सख्ती से नियंत्रित किया जाएगा.

इन मैदानों का संचालन कौन करता है?

दिल्ली रेस कोर्स का संचालन दिल्ली रेस क्लब द्वारा किया जाता है, जो एक निजी संस्था है और ऐतिहासिक रूप से घुड़दौड़, इंफ्रास्ट्रक्चर और आयोजनों का प्रबंधन करती रही है.

दूसरी ओर, जयपुर पोलो ग्राउंड का संचालन इंडियन पोलो एसोसिएशन द्वारा किया जाता है, जो भारत में पोलो का सर्वोच्च निकाय है और खेल के नियमन व आयोजनों के लिए जिम्मेदार है.

दोनों संगठनों ने बेदखली का कड़ा विरोध किया है. रेस क्लब ने घोड़ों, इंफ्रास्ट्रक्चर और कर्मचारियों के स्थानांतरण से जुड़ी चुनौतियों का हवाला देते हुए कहा है कि ऐसा कदम कुछ हफ्तों में संभव नहीं है.

इंडियन पोलो एसोसिएशन ने इस मैदान की विरासत महत्व पर जोर देते हुए कहा है कि यह भारत में पोलो की पहचान का अहम हिस्सा है.

इन मैदानों का प्रबंधन और इनके समर्थक विरासत और व्यावहारिक कठिनाइयों का हवाला देते हुए बेदखली के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं.

दिल्ली रेस क्लब (DRC)

एस.के. बक्शी ने 15 दिन के नोटिस पर हैरानी जताते हुए इसे अव्यावहारिक समयसीमा बताया.

उन्होंने कहा कि 250 से अधिक एलीट घोड़े संवेदनशील खिलाड़ी होते हैं, जिन्हें विशेष देखभाल की जरूरत होती है और उन्हें यूं ही कहीं और शिफ्ट नहीं किया जा सकता.

उन्होंने यह भी बताया कि एक नया प्रोफेशनल रेसिंग ट्रैक बनाने में कम से कम दो साल लगेंगे.

साथ ही, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि क्लब करीब 5,000 परिवारों की आजीविका से जुड़ा हुआ है.

इंडियन पोलो एसोसिएशन (IPA)

प्रभारी नवीन जिंदल (वाइस प्रेसिडेंट और सांसद) ने हाल ही में कहा, “जयपुर पोलो ग्राउंड भारतीय पोलो का दिल है और यह उस खेल की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है, जिसे भारत ने दुनिया को दिया है.” उन्होंने यह भी कहा कि जयपुर पोलो ग्राउंड के बिना दिल्ली पहले जैसी नहीं रह सकती.

जयपुर रॉयल फैमिली

जयपुर रॉयल फैमिली के सदस्य और पोलो खिलाड़ी सवाई पद्मनाभ सिंह ने भी समुदाय से इस मैदान को बचाने की अपील की है. यह मैदान महाराजा सवाई मान सिंह द्वारा स्थापित किया गया था.

उन्होंने इसे एक ऐतिहासिक खेल स्थल के साथ-साथ दिल्ली का एक अहम हरित क्षेत्र बताया, जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखना जरूरी है.

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