राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के आठवें स्मृति व्याख्यान में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने साहित्य, न्याय और सामाजिक समानता को लेकर गहरी और भावनात्मक बात रखी है. सांसद और गायक मनोज तिवारी को रामधारी सिंह दिनकर संस्कृति सम्मान से अलंकृत करने के बाद उन्होंने अपने व्याख्यान में 'रश्मिरथी' के जरिए सामाजिक न्याय की व्यापक रूपरेखा को समझाया.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि 'रश्मिरथी' में साहित्य और न्याय का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है. दिनकर जी ने अपनी कविताओं के माध्यम से जीवन के संदेश, सवाल और उनके समाधान प्रस्तुत किए हैं. उन्होंने कहा कि कविता और न्याय दोनों ही मरहम देने का काम करते हैं. इंसान के भीतर छिपे व्यक्तित्व और मूल्यों को जागृत करते हैं. उन्होंने व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किए.
उन्होंने कहा कि पूरे न्यायिक करियर में अंग्रेजी में पढ़ने, लिखने और बोलने के बीच अपनी मातृभाषा में बोलने का अवसर मिलना उनके लिए खास रहा. उन्होंने बताया कि बचपन में उनके पिताजी ने उन्हें साहित्य और साहित्यकारों से परिचित कराया, जिससे उनके भीतर साहित्य के प्रति लगाव पैदा हुआ. उन्होंने कहा कि वे और उनके साहित्यकार पिताजी अक्सर साहित्य पर चर्चा करते थे.
उनके बीच कई बार मतभेद भी होते थे, लेकिन संवाद लगातार चलता रहता था. पिताजी की प्रेरणा से वे भी कभी-कभार लिखते थे. उन्होंने एक दिलचस्प प्रसंग सुनाते हुए बताया कि न्यायिक पेशे में आने के बाद एक दोस्त ने ताना मारा था, "इस तुम्हारे दस्त को क्या हो गया, इस गरम मौसम में भी बर्फ सा हो गया". इस पर उन्होंने जवाब दिया, "पोंछ दी हैं अर्थ की सब तख्तियां, अब मदरसे जाऊंगा किस वास्ते!"
इस पर सभागार तालियों से गूंज उठा. CJI सूर्यकांत ने दिनकर की प्रसिद्ध पंक्तियां भी उद्धृत करते हुए कहा...
"श्वानों को मिलते दूध वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं...
मां की हड्डी से चिपक ठिठुर जाड़े की रात बिताते हैं..."
उन्होंने कहा कि ये पंक्तियां हमारी मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देती हैं. उन्होंने रश्मिरथी को केवल कर्ण की कहानी नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की कहानी बताया जो प्रतिभा, शौर्य और योग्यता के बावजूद हाशिए पर धकेल दिया जाता है. उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 17 का जिक्र करते हुए कहा कि जाति-पाति का भेद मिटाना जरूरी है. समानता का मौलिक अधिकार सबसे बड़ा अधिकार है.
उन्होंने दिनकर की पंक्तियों के जरिए संदेश दिया...
"पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर..
जाति जाति का शोर मचाते केवल कायर क्रूर!"
उन्होंने कहा कि कर्ण की कहानी निष्ठा और चयन की है. उनको पता था कि वो हारने वाले पक्ष में हैं, लेकिन फिर भी अपने मित्र के प्रति निष्ठावान रहे. यह मित्रता और संबंधों की गहराई को दर्शाता है.
उन्होंने यह भी कहा...
"क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन, विषहीन, विनीत, सरल हो"
इसके साथ ही रोमन कहावत "If you want peace then prepare for war" का जिक्र करते हुए कहा कि शक्ति का वास्तविक मूल्य उसके विवेकपूर्ण उपयोग में है, न कि विनाश में.
कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और आयोजन संस्था 'रेस्पेक्ट इंडिया' के अध्यक्ष विकास सिंह ने भी मध्यस्थता को लेकर महत्वपूर्ण बात रखी. उन्होंने कहा कि मध्यस्थता केवल एक कानूनी शब्द नहीं, बल्कि एक संस्कार है. उन्होंने दिनकर की रश्मिरथी का हवाला देते हुए कहा कि भगवान भी हस्तिनापुर में पांडवों के लिए पांच गांव का संदेश लेकर गए थे.
उन्होंने कहा कि मध्यस्थता न्याय, शांति और संतुष्टि के बीच एक पुल का काम करती है. CJI सूर्यकांत ने कहा कि स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यिक सेनानी, दोनों ही संविधान और स्वतंत्रता के लिए एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. उन्होंने चिंता जताई कि तमाम संवैधानिक संरक्षण के बावजूद आज भी जातिगत भेदभाव के मामले सामने आते हैं. मानवीय गरिमा से जुड़े कई सवाल अब भी अनसुलझे हैं.
अंत में उन्होंने कहा कि रश्मिरथी जैसे ग्रंथ संविधान की तरह जीवंत हैं, जो समानता, निष्ठा और विवेक का संदेश देते हैं.