फर्जीवाड़ा, धोखाधड़ी और गबन के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता और उसके वकील को राहत देने के साथ साथ क्लास भी ली. क्योंकि याचिकाकर्ता ने अर्जी का सारांश काफी लंबा चौड़ा और पेचीदा बनाया था. इस ड्राफ्टिंग डिफिकल्टी की वजह से किसी को भी मुकदमे को समझने में अच्छी खासी मशक्कत करनी पड़ी.
याचिका में लंबे चौड़े सिनॉप्सिस यानी मुकदमे का सारांश, वजह और आधार को काफी घुमा-फिरा कर लिखने पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता संदीप कुमार गर्ग को काफी सुनाया. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अभय एस. ओक और जस्टिस पंकज मित्तल की पीठ ने याचिकाकर्ता संदीप पर 25 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया.
इसके साथ ही आदेश दिया कि ये रकम किसी चैरिटेबल संस्था में बतौर चंदा जमा कर रसीद सुप्रीम कोर्ट को रजिस्ट्री में दाखिल की जाए. याचिकाकर्ता संदीप कुमार गर्ग पर अपनी कंपनी के साथ आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी और दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा कर लाखों रुपये गबन करने का आरोप है.
इस संबंध में कानपुर के स्वरूप नगर थाने में FIR भी दर्ज कराई गई है. संदीप गर्ग ने अग्रिम जमानत के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में अर्जी लगाई थी.मगर, वहां से उसे निराशा हाथ लगी. फिर सुप्रीम कोर्ट से उसे राहत तो मिली लेकिन डांट फटकार और जुर्माने के साथ.
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को राहत देते हुए उसकी गिरफ्तारी पर रोक लगाने का आदेश दिया. पीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार याचिकाकर्ता की मेडिकल जांच किसी भी सरकारी अस्पताल में कराकर रिपोर्ट पीठ के सामने पेश करे. अदालत सिर्फ स्वास्थ्य के आधार पर ही याचिकाकर्ता की जमानत अर्जी पर विचार करेगी.
सुनवाई के दौरान जस्टिस अभय एस. ओक और जस्टिस पंकज की पीठ ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज करने का आदेश सिर्फ पांच पेज में लिखवाया था. याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी में उस आदेश का सारांश 60 पेज का कर दिया.
पीठ ने इस पर नाराज होते हुए नसीहत दी कि इतना लंबा चौड़ा सार देने की जरूरत ही नहीं थी. हालांकि अदालत ने अगली सुनवाई 6 नवंबर तय करते हुए आरोपी को गिरफ्तारी से राहत दे दी.