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22 साल केे बेटे की हो गई मौत, लाश ऑटो में लादकर पोस्टमार्टम कराने पहुंचे पिता, झकझोर देगी ये कहानी

छत्तीसगढ़ से झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है. 22 साल के बेटे की मौत के बाद एक पिता को उसका शव ऑटो के पायदान पर रखकर जिला अस्पताल ले जाना पड़ा. पोस्टमार्टम के बाद भी सरकारी तंत्र ने कोई मदद नहीं की और परिजन उसी हालत में शव को वापस गांव ले जाने को मजबूर हुए.

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पोस्टमार्टम के बाद भी शव ले जाने के लिए नहीं मिला वाहन. (Photo: Screengrab)
पोस्टमार्टम के बाद भी शव ले जाने के लिए नहीं मिला वाहन. (Photo: Screengrab)

झकझोर देने वाली ये कहानी छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले की है. यहां से आई तस्वीर सिस्टम पर सवाल खड़े करती है. 22 साल के बेटे की मौत के बाद एक बेबस पिता शव को ऑटो के पायदान पर रखकर अस्पताल ले गया. जब पोस्टमार्टम हो गया, इसके बाद भी कोई सरकारी वाहन नहीं मिला. पिता उसी ऑटो में बेटे की लाश लेकर गांव लौट गया. रास्तेभर पायदान से बाहर झूलता बेटे का शव और सिर झुकाए बैठा पिता, यह दृश्य जिसने देखा उसकी आंखें नम हो गईं.

दरअसल, पेंड्रा क्षेत्र के विशेषरा गांव में रहने वाला 22 साल का युवक लंबे समय से मानसिक बीमारी से जूझ रहा था. ग्रामीण इलाके में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और जागरूकता के अभाव के कारण परिवार उसे अस्पताल नहीं ले जा पाया. परिजन उम्मीद में उसे झाड़-फूंक कराने के लिए पास के माटी कछार गांव ले गए थे. लेकिन वहां जो हुआ, उसने पूरे परिवार की दुनिया उजाड़ दी. युवक ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली.

बेटे की मौत से टूट चुके पिता के सामने इसके बाद एक और मुसीबत थी. पुलिस कार्रवाई और पोस्टमार्टम के लिए शव को जिला अस्पताल ले जाना था. लेकिन गांव से अस्पताल तक ले जाने के लिए कोई एंबुलेंस, शव वाहन या सरकारी मदद नहीं मिली. पिता ने गांव-गांव भटककर मदद मांगी, लेकिन कोई साधन नहीं मिला.

यह भी पढ़ें: झारखंड में मानवता शर्मसार! नहीं मिली एंबुलेंस तो 4 साल के बच्चे का शव झोले में भरकर लौटा बेबस पिता

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आखिरकार लाचार पिता ने एक ऑटो रिक्शा किराए पर किया. ऑटो में शव रखने की जगह नहीं थी, इसलिए बेटे के शव को पायदान पर रखा गया. पिता खुद पीछे बैठा रहा और करीब 20 किलोमीटर तक उसी हालत में अस्पताल पहुंचा. रास्ते भर लोगों की नजरें इस दृश्य पर टिक गईं. एक ओर पायदान पर बेटे का निर्जीव शरीर, दूसरी ओर उसके पास बैठा पिता- यह दृश्य जिसने भी देखा, उसकी आंखें नम हो गईं.

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अस्पताल पहुंचने के बाद परिजनों को उम्मीद थी कि कम से कम पोस्टमार्टम के बाद प्रशासन कुछ मदद करेगा. लेकिन कथित तौर पर वहां भी संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई. पोस्टमार्टम के बाद परिवार ने शव वाहन की मांग की, ताकि बेटे को सम्मानपूर्वक घर ले जाया जा सके. लेकिन नहीं मिला. कोई व्यवस्था नहीं की गई.

मजबूरी में पिता को फिर उसी ऑटो चालक से कहना पड़ा कि वह शव को गांव तक छोड़ दे. इस बार करीब 15 किलोमीटर दूर गांव लौटते वक्त भी शव उसी तरह पायदान पर रखा गया. रास्ते भर शव का एक हिस्सा ऑटो से बाहर लटका रहा. पीछे बैठे पिता का सिर झुका था और आंखों से आंसू थम नहीं रहे थे. यह सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं था, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता की तस्वीर बन गया.

मृतक के पिता ने कहा- पोस्टमार्टम के बाद भी मदद नहीं मिली

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​पिता ने कहा कि बेटा बीमार था. इलाज के लिए ले गए थे, पर उसने फांसी लगा ली. पुलिस कार्रवाई के लिए शव को अस्पताल लाना था, लेकिन कोई गाड़ी नहीं मिली. मजबूरी में ऑटो किया और पायदान पर रखकर लाए. पोस्टमार्टम के बाद भी किसी ने मदद नहीं की, फिर उसी ऑटो से बेटे को घर ले जाना पड़ा. ऑटो चालक ने कहा कि परिजन परेशान थे, उनके पास कोई साधन नहीं था. शव को ऑटो में रखने की जगह नहीं थी, इसलिए उसे पायदान पर सुरक्षित रखकर अस्पताल लाया और फिर वापस गांव छोड़ने गया.

परिवार को ऑटो चालक को 2000 रुपये देने पड़े. बेटे के अंतिम संस्कार के लिए उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था. स्थानीय लोगों में इस घटना को लेकर आक्रोश है. लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब सरकार हर जिले में एंबुलेंस और शव वाहन की बात करती है, तो एक गरीब आदिवासी परिवार को बेटे का शव ऑटो के पायदान पर क्यों ढोना पड़ा?

गौरेला पेंड्रा मरवाही के मुख्य चिकित्सा अधिकारी रामेश्वर शर्मा ने कहा कि इस मामले में 1099 के जिला प्रभारी को नोटिस जारी किया है और पूरे मामले में स्पष्टीकरण मांगा है. स्पष्टीकरण नहीं दिए जाने पर कार्रवाई की जाएगी.

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