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World Alzheimer Day 2022: इस बीमारी से दो साल के बच्चे जैसे हो जाते हैं बुजुर्ग, आपकी केयर जरूरी

अक्सर 60 वर्ष की उम्र के आसपास होने वाली इस बीमारी का फिलहाल कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन अर्ली स्टेज में अगर इसका पता लग जाए तो इसे बढ़ने से रोका जा सकता है. इससे बचाव का सबसे आसान तरीका यही है कि 35 साल की उम्र से ही हम अपनी लाइफस्टाइल में जरूरी बदलाव ले आएं.

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प्रतीकात्मक फोटो (Getty) प्रतीकात्मक फोटो (Getty)

World Alzheimer Day 2022: बचपन का एक वो दौर होता है जब हमारे पेरेंट्स हमें उंगली पकड़कर चलना सिखाते हैं. वो हमें शब्द उनके मायने सिखाते हैं. वो हमें हर वो बात सिखाते हैं जो हमें बेहतर इंसान बनाती है, लेकिन एक उम्र के बाद उन्हें हमारी जरूरत होती है जब हम उन्हें वही प्यार दें जो उन्होंने हमें बिना किसी खीझ के दिया. वहीं अगर बुढ़ापे में पेरेंट्स में से किसी को डिमेंश‍िया जैसी भूलने की बीमारी हो गई तो हमारी ये जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है. 

डिमेंशिया का एक हिस्सा है अल्जाइमर रोग, जो कि बढ़ती उम्र के साथ कई बार भूलने के गंभीर लक्षणों के साथ सामने आता है. आज वर्ल्ड अल्जाइमर डे पर एम्स में न्यूरोलॉजी प्रोफेसर व अल्जाइमर सोसायटी ऑफ इंडिया दिल्ली चेप्टर की प्रेसीडेंट प्रो. मंजरी त्रिपाठी से जानते हैं कि कैसे अल्जाइमर की समस्या से 35 की उम्र से ही बच सकते हैं. यदि घर में किसी बुजुर्ग को अल्जाइमर हो जाए तो कैसे देखभाल करनी चाहिए. 

क्या है अल्जाइमर रोग, कैसे पड़ा नाम? 

अल्जाइमर रोग का नाम अलोइस अल्जाइमर के नाम पर रखा गया है, उन्होंने ही सबसे पहले इसकी पहचान की थी. अगर अल्जाइमर के लक्षणों की बात करें तो शुरुआती चरण में इसे छोटी-छोटी चीजें भूलने से पहचाना जा सकता है. कई बार बढ़ती उम्र के साथ छोटी छोटी चीजें भूलना जैसे कि चेक, पैसे, कार की चाभी कहां रखी हैं, दवाएं रखकर भूल जाना, क्या पढ़ते हैं, वो भूलने लगते हैं, शब्द भूलने लगते हैं. मंदिर या रिश्तेदारों के घर के रास्ते भूलने लगते हैं. कैलकुलेशन भूलने लगते हैं. इसके अलावा डिसिजन मेकिंग से लेकर बोलने में दिक्कत आने लगती है. कई बार इसकी वजह से सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं की गंभीर स्थिति हो जाती है. इसकी लास्ट स्टेज में पेशेंट बेड रिडेन हो जाता है.

अर्ली स्टेज में पता लगने पर रोकना है आसान

डॉ मंजरी कहती हैं कि अक्सर 60 वर्ष की उम्र के आसपास होने वाली इस बीमारी का फिलहाल कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन अर्ली स्टेज में अगर इसका पता लग जाए तो इसे बढ़ने से रोका जा सकता है. इससे बचाव का सबसे आसान तरीका यही है कि 35 साल की उम्र से ही हम अपनी लाइफस्टाइल में बदलाव लाएं. जैसे कि 35 की उम्र के बाद समय समय पर ब्लड प्रेशर चेक करना, मोटापे से बचना, स्मोकिंग या एल्कोहलिक होने से बचाव और डायबिटीज पर चेक रखें. 

अल्जाइमर को अगर अर्ली स्टेज में ही बढ़ने से रोक दिया जाए तो इससे बचाव हो सकता है. लेकिन ये डिजीज एडवांस होने पर बुजुर्ग दो साल के बच्चे की तरह हो जाते हैं. उनके देखभाल के लिए घर में 24x7 केयर की जरूरत होती है. उन्हें टॉयलेट ट्रेनिंग से लेकर खाना खिलाने तक बच्चे की तरह ही डील करना होता है. ऐसे हाल में दिनभर उन्हें देखरेख चाहिए. न्यूक्ल‍ियर फैमिली में ऐसे बुजुर्गों की देखभाल काफी मुश्क‍िल हो जाती है. उन्हें शुरुआती दौर से ही अगर म्यूजिक थेरेपी, पेट थेरेपी, फिश पॉट, गार्डेनिंग और सामान्य इनडोर गेम में बिजी रखा जाए तो काफी फायदेमंद होता है. 

क्या है बेस्ट डाइट 

प्रो. मंजरी का कहना है कि डिमेंश‍िया पेशेंट के लिए बेस्ट डायट इंडियन डायट मानी जाती है. इंडियन डायट में रोटी दाल सब्जी और सलाद, खीरा, अंकुरित दालें शामिल होती हैं जोकि ब्रेन के लिए बहुत अच्छी मानी जाती हैं. डिमेंश‍िया पेशेंट को  रेड मीट से बचना चाहिए. उनके लिए ब्रोकोली बहुत अच्छी होती है. इसके अलावा हेल्दी आयल्स  जैसे कि वेजिटेब‍िल आयल मस्टर्ड, ऑलिव आयल आदि देना चाहिए. उन्हें जंक फूड से बचना चाहिए खासकर मैदा की चीजें नहीं देनी चाहिए ये ब्रेन के लिए टॉक्स‍िक का काम करती हैं. उन्हें शुगर भी नहीं देना चाहिए. देखा जाए तो बचपन से ही इस तरह की डायट की आदत डालनी चाहिए. 

ये लक्षण अध‍िक होने पर डॉक्टर से मिलें

याददाश्त में कमी
सामान्य कामकाज में कठिनाई
जरूरत की चीजों और लोगों के नाम भूलना 
निर्णय लेने में कठिनाई या गलत निर्णय लेना 
चीजों को रखकर हमेशा भूल जाना
मूड-स्वभाव या पूरे व्यक्तित्व में बदलाव
बहुत अधिक सोना और काम में अन‍िच्छा 

यदि आप खुद में या अपने किसी परिजन में लगातार इस तरह के बदलाव देखें तो उन्हें डॉक्टर से मिलना चाहिए. 

रियल वर्ल्ड के दोस्तों से मिलें, समय से सोएं 

एक्सरसाइज, योग म्यूजिक, पॉजिट‍िव थ‍िंकिंग, सोशल मीडिया से इतर रियल वर्ल्ड के दोस्तों के साथ मिलना जुलना जारी रखना चाहिए. इसके अलावा अच्छी नींद का भी इसमें बड़ा रोल होता है. हमारी आम जिंदगी में नींद बहुत जरूरी है, जब आप सोना शुरू करते हैं तो वह अवस्था नॉन-आरईएम स्लीप कही जाती है और आप अपने आराम का ज्यादातर वक्त इसी में गुजारते हैं. यह स्लीम दिमाग को हेल्दी रखने में मदद करती है. आजकल लोगों को देर रात तक जागने, सोशल मीडिया, टीवी में वक्त देना बहुत बढ़ा है. यह कई बार धीरे धीरे इंसोमेनिया का रूप ले लेते हैं. इसका अल्जाइमर में बड़ा रोल होता है. हमें समय से सोना बहुत जरूरी है.

 

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